Prayagraj : टीबी ठीक होने के बाद भी फेफड़े की कार्य क्षमता को करती है प्रभावित
फेफड़े की टीबी ठीक होने के बाद भी लंग्स की कार्य क्षमता को प्रभावित करती है। ऐसे में मरीजों को चाहिए कि वह ठीक होने के बाद भी लंबे समय तक चिकित्सक के संपर्क में रहें।
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फेफड़े की टीबी ठीक होने के बाद भी लंग्स की कार्य क्षमता को प्रभावित करती है। ऐसे में मरीजों को चाहिए कि वह ठीक होने के बाद भी लंबे समय तक चिकित्सक के संपर्क में रहें। इसके अलावा लगातार खांसी या सांस फूलने जैसी शिकायत होने पर तुरंत चिकित्सक से परामर्श लें। मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के पल्मोनरी विभाग और वाराणसी बीएचयू के आईएमएस के टीबी व रेस्पिरेटरी डिजीज विभाग की तरफ से पोस्ट-ट्यूबरकुलोसिस लंग डिजीज पर किए गए शोध में यह बात सामने आई है। यह शोध करीब पोस्ट टीबी के 600 मरीजों पर किया गया।
अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि फुफ्फुसीय टीबी फेफड़ों के ऊतकों व उनकी कार्य क्षमता को गंभीर और स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे में फेफड़ों की टीबी की शीघ्र पहचान और समय पर उपचार अत्यंत आवश्यक है, जिससे फेफड़ों को होने वाली स्थायी क्षति को कम किया जा सके। यह अध्ययन भारत में पोस्ट-टीबी श्वसन रोगों के बढ़ते बोझ को समझने व टीबी मरीजों के दीर्घकालिक फॉलो-अप की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
अध्ययन में पाया गया है कि फेफड़ों की टीबी (पल्मोनरी ट्यूबरकुलोसिस) के सफल उपचार के बाद भी अनेक मरीजों में फेफड़ों की कार्यक्षमता लंबे समय तक प्रभावित रहती है। इस अध्ययन को अमेरिकन थोरैसिक सोसाइटी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 2026 में प्रस्तुत किया गया। इसके अलावा 19 मई 2026 को अमेरिकन जर्नल ऑफ रेस्पिरेटरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन में अध्ययन प्रकाशित हुआ।
पोस्ट टीबी के कितने मरीजों के फेफड़े की कार्यक्षमता में मिली परेशानी
1-अवरोधक श्वसन दोष के 312 मरीजों को लिया गया, इनमें 52 फीसदी के फेफड़ों में समस्या पाई गई।
2-सीमित फेफड़े की बीमारी 192 मरीजों में 32 फीसदी मरीजों में मिली समस्या।
3-मिश्रित श्वसन दोष (ऑब्सट्रक्टिव + रिस्ट्रिक्टिव) 96 मरीजों में 16 फीसदी मरीजों में मिली परेशानी।
क्या है उपाय
1-धूम्रपान को पूरी तरह बंद करना।
2-ग्रामीण क्षेत्रों में बायोमास ईंधन (लकड़ी, उपले, धुआं आदि) के संपर्क से बचाव करना।
3-टीबी उपचार पूर्ण होने के बाद मरीजों की पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (पीएफटी) कराई जानी चाहिए ताकि फेफड़ों की वास्तविक कार्यक्षमता का आकलन किया जा सके।
4-मरीज को लगातार खांसी या सांस फूलने जैसी शिकायत हो, तो तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए।
अध्ययन का उद्देश्य टीबी के बाद फेफड़ों की कार्य क्षमता का मूल्यांकन करना और ग्रामीण व शहरी मरीजों के साथ-साथ धूम्रपान करने वाले और न करने वाले मरीजों की तुलना करना रहा। पोस्ट-ट्यूबरकुलोसिस लंग डिजीज के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि टीबी से ठीक होने के बाद भी अनेक मरीज लंबे समय तक श्वसन संबंधी समस्याओं से पीड़ित रहते हैं। - डॉ. तारिक महमूद, एमडी, विभागाध्यक्ष, श्वसन रोग विभाग, मोती लाल नेहरु मेडिकल कॉलेज।