आंसू निकाल देने के लिए काफी हैं यूपी के हालात
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हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के डेढ़ सौंवे स्थापना दिवस पर मुख्य न्यायाधीश डा.डीवाई चंद्रचूड ने कहा था कि बीते दो वर्षों में हाईकोर्ट में आठ लाख मुकदमों का निस्तारण हुआ है। जाहिर है निस्तारण की दर में तेजी आई है। इसके बावजूद एक अप्रैल 2016 को 9,13,036 लाख मुकदमे हाईकोर्ट में लंबित थे। इसमें 7,00427 इलाहाबाद और 2,12609 लाख मुकदमे लखनऊ बेंच के हैं। लंबित मुकदमों में करीब पांच लाख 59 हजार सिविल और तीन लाख 59 मुकदमे क्रिमिनल के हैं।
जिला अदालतों में भी मुकदमों की संख्या बेशुमार है।ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के आंकड़ों के अनुसार सूबे की 71 जिला अदालतों में 50,92,609 मुक दमे लंबित हैं। इसमें सिविल के 12,76,229 और क्रिमिनल के 38,16,380 मुकदमे हैं। अदालतों में 6,55611 मुकदमे दस वर्ष से ज्यादा समय से लंबित हैं जो कि कुल मुकदमों का 12.8 प्रतिशत है। कानून के जानकार मानते हैं, मौजूदा हालात में मुकदमों का निस्तारण होने में दशकों लग जाएंगे, इस ओर सरकार और न्यायपालिका दोनों को ध्यान देना होगा। जजों के रिक्त पद भरने के अलावा नए पदों का सृजन और बेवजह के मुकदमों पर रोक लगाने के तरीके भी तलाश करने होंगे।
0 लोकतंत्र पर आ सकता है खतरा- जस्टिस रवींद्र सिंह
इलाहाबाद हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त जस्टिस रवींद्र सिंह न्याय मिलने में देरी को लोकतंत्र के भविष्य से जोड़ कर देखते हैं। उनका कहना है कि देश की न्यायपालिका पर इस कदर मुकदमों का बोझ है कि सीजेआई का दर्द स्वत: ही आंसू बनकर छलक गया। अगर देश में लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाना और बचाना है तो न्यायपालिका की ओर विशेष ध्यान देना होगा। जजों की कमी अतिशीघ्र पूरी करनी होगी। साथ ही नए पद भी सृजित करने होंगे, वरना मुकदमों के निस्तारण में हो रही देरी से लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और पूर्व महाधिवक्ता वीसी मिश्र का मानना है कि सरकारी अधिकारियों के मनमाने फैसलों से मुकदमों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अधिकारी जानबूझकर ऐसा आदेश करते हैं कि जनता को अदालत की शरण में जाना पड़ता है। देश के मुख्य न्यायाधीश का दर्द झलकना स्वाभाविक है। इससे पूरा अधिवक्ता समाज और जनता दोनों दुखी है। जजों के रिक्त पद भरने के अलावा काम के घंटे भी बढ़ाना जरूरी है। सरकार अफसरों पर अंकुश लगाएं तो मुकदमों में कमी आ सकती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राधाकांत ओझा का कहना है कि हालात पर हताशा जताने से बेहतर है कि न्यायपालिका स्वयं के लिए पारदर्शी नियुक्ति की व्यवस्था अपनाए ताकि सच्चे, ईमानदार और योग्य न्यायाधीशों की नियुक्ति हो। ऐसे नियम-कानून बनाए जाएं जो सभी कि लिए एक समान और बाध्यकारी हों। भारत में लोकतंत्र अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ है कि नियुक्ति में राजनीतिक दखल से नियुक्तियां साफ-सुथरी हो सकें। ऐसे में न्यायपालिका को स्वयं के लिए समुचित नियम-कानून बनाने चाहिए।
हाईकोर्ट बार के पूर्व अध्यक्ष राकेश पांडेय का मानना है कि मुकदमों की संख्या में कमी लाने के लिए बेवजह की मुकदमेबाजी पर रोक लगानी होगी। वैकल्पिक न्याय प्रणाली को और विकसित करना तथा विवादों का अदालत आने से पूर्व निस्तारण एक बेहतर उपाय हो सकता है। अलग राजस्व कैडर के गठन से निचले स्तर पर वादों में कमी आएगी। सरकार स्वयं सबसे बड़ी पक्षकार है, मुकदमों में कमी लाने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
00 इलाहाबाद हाईकोर्ट में वादों की स्थिति
1 जनवरी 2014 9,70,579
1 जनवरी 2015 8,98,924
1 जनवरी 2016 9,12,138
1 अप्रैल 2016 9,13,036
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हाईकोर्ट में रिक्त पदों की स्थिति
कुल पद 160
कार्यरत जज 78
रिक्त पद 82
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लोअर कोर्ट में लंबित केस
सिविल 1276229
क्रिमिनल 3816380
कुल 5092609
10 साल से अधिक लंबित केस
सिविल 217149
क्रिमिनल 438462
कुल 655611
5 से 10 साल तक लंबित केस
सिविल 376705
क्रिमिनल 1265809
कुल 1642514
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निचली अदालतों में जजों के स्वीकृत पद 2072
मौजूदा कार्यरत जजों की संख्या 1849