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Prayagraj News: सतत विकास के लिए मानसिकता में बदलाव पर दिया जोर

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 09 Mar 2025 01:55 AM IST
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Emphasis on change in mindset for sustainable development
डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की ओर से ‘कानून, प्रौद्योगिकी और सतत विकास’ पर आयोजित सम्मेलन के दूसरे दिन भविष्य में सतत प्रगति और तकनीकी परिवर्तन को आगे बढ़ाने में कानून की भूमिका पर व्यावहारिक चर्चा हुई।
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सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने सतत विकास की बात करते हुए मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता पर व्याख्यान दिया।उन्होंने कहा कि सतत विकास की योजना बनाना महत्वपूर्ण है लेकिन इन योजनाओं का कार्यान्वयन एक कमजोर कड़ी है।
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उन्होंने बताया कि कैसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देकर और महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी करके पर्यावरण संरक्षण को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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ऑकलैंड विश्वविद्यालय के प्रो. क्लाउस बोसेलमैन ने डिजिटल साक्षरता प्लेटफॉर्म का संदर्भ देते हुए कार्बन फुटप्रिंट, न्यायिक जवाबदेही, साइबर सुरक्षा की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के बीच घनिष्ठ संबंध को समझाया।
तकनीकी स्थिरता के उद्देश्य को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि शांति, न्याय और मजबूत संस्थानों के बिना सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्रो. अंबर पंत ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को लागू करने में नेपाल की प्रगति पर चर्चा की। पर्यावरण और मानवीय दृष्टिकोण पर जोर देते हुए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि कानून और प्रौद्योगिकी मानव जाति की भलाई और खुशी के प्रत्यक्ष लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की अध्यक्षता में दूसरे तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया।

तीसरा तकनीकी सत्र इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजय भनोट की अध्यक्षता में हुआ। वार्ता के बाद पांच शिक्षाविदों और प्रख्यात प्रोफेसरों के पेपर प्रस्तुतीकरण और चर्चा हुई। कोरिया के सूंगसिल विश्वविद्यालय के प्रो. मून-ह्यून कोह ने कार्बन कैप्चर और ईएसजी कार्यान्वयन पर व्याख्यान दिया। कोरियाई सीसीयूएस अधिनियम का उदाहरण देते हुए उन्होंने नीति निर्माण में सार्वजनिक समझ के महत्व को निर्धारित किया।
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