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रामकुमार वर्मा की जयंती पर विशेष : अपनें चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह

Mon, 15 Sep 2025 04:18 PM IST
विनोद सिंह योगेश नारायण दीक्षित, प्रयागराज
योगेश नारायण दीक्षित, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 15 Sep 2025 04:18 PM IST
सार

Dr. Ram Kumar Verma : डॉ.रामकुमार वर्मा की कर्मभूमि प्रयागराज थी। उनका जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले में 15 सितंबर 1905 को हुआ, लेकिन 1925 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में बीए में दाखिला लेने के बाद वह यहीं के होकर रह गए। कई वर्षों तक रामकुमार वर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक और बाद में अध्यक्ष बने। कविता और दूसरे लेखन के साथ 150 से ज्यादा एकांकी लिखकर उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली थी। उन्होंने प्रयागराज में आवास बनाया। इस समय उनकी साहित्यिक विरासत उनकी बेटी डॉ.राजलक्ष्मी संभाल रही हैं।

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Dr. Ramkumar Verma showed society in a one-act play, he kept Ram in his mind
डॉ. राम कुमार वर्मा, साहित्यकार और नाटककार। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

डॉ.रामकुमार वर्मा की कर्मभूमि प्रयागराज थी। उनका जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले में 15 सितंबर 1905 को हुआ, लेकिन 1925 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में बीए में दाखिला लेने के बाद वह यहीं के होकर रह गए। कई वर्षों तक रामकुमार वर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक और बाद में अध्यक्ष बने। कविता और दूसरे लेखन के साथ 150 से ज्यादा एकांकी लिखकर उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली थी। उन्होंने प्रयागराज में आवास बनाया। इस समय उनकी साहित्यिक विरासत उनकी बेटी डॉ.राजलक्ष्मी संभाल रही हैं।

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मुख्य आलेख

 

 

डॉ.रामकुमार वर्मा का साहित्य जितना आकर्षित करता था, उससे ज्यादा उनका व्यक्तित्व और व्यवहार अपनी ओर खींचता था। उनके एकांकी में जहां आम आदमी का दर्द और समाज का चेहरा दिखता था, वहीं उनके मन में प्रभु राम बसते थे। प्रयागराज में महान साहित्यकार के निकट रह चुके लोगों को पता है कि डॉक्टर वर्मा अपनी व्यथा सिर्फ अपने आराध्य प्रभु से कहते थे।

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डॉक्टर वर्मा से जुड़ीं तमाम यादों को संजोकर रखा है उनकी बेटी डॉ.राजलक्ष्मी वर्मा ने। साहित्य लेखन और अपने शिष्यों को हरदम कुछ देने में व्यस्त रहने वाले एकांकीकार अपना दर्द और मन की बात किससे कहते थे? इस सवाल पर डॉ.राजलक्ष्मी ने बताया कि उनके पिता जी अपनी व्यथा सिर्फ प्रभु राम से कहते थे। जब भी उनके सामने कोई ऐसी बात होती थी जो तनाव दे सकती है तो वह गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस के अयोध्याकांड के एक दोहे की पहली पंक्ति गुनगुनाने लगते थे, ‘अपनें चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।’

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Dr. Ramkumar Verma showed society in a one-act play, he kept Ram in his mind
डॉ रामकुमार वर्मा की वह मेज जिस पर बैठकर वह नियमित लेखन करते थे। - फोटो : अमर उजाला।

बाल साहित्यकारों को प्रेरित करते थे डॉ. वर्मा

इसका भावार्थ है कि जहां तक मेरा वश चला, मैंने आज तक कभी किसी का बुरा नहीं किया। डॉ. राजलक्ष्मी का कहना है कि पढ़ाने और लिखने से लेकर सामान्य व्यवहार में भी वह न किसी की आलोचना करते थे और सुनना पसंद करते थे। बाल साहित्यकारों को वह प्रेरित करने के लिए अपने पास से धनराशि तक दे देते थे।

‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक रविनंदन सिंह ने बड़े लेखकों के डॉ.रामकुमार वर्मा के साहित्य को लेकर की गईं टिप्पणियों को संग्रहीत किया है। उनके मुताबिक जीवन में प्रारंभ से ही प्रतिभा के स्पष्ट चिह्न दिखाई देते थे बालक रामकुमार में। अपनी कक्षा में सदैव प्रथम स्थान पर आया करते थे। उन्होंने अभिनेता बनने की बड़ी इच्छा जताई थी। इसीलिए अपने विद्यार्थी जीवन में कई नाटकों में एक सफल अभिनेता का कार्य किया है। बाद में एकांकी नाटक लेखन के वह सूत्रधार बन गए।

Dr. Ramkumar Verma showed society in a one-act play, he kept Ram in his mind
रामकुमार वर्मा जी की वत्सल छांव में, यश मालवीय और उनका बेटा सौम्य। फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।

डॉ.रामकुमार वर्मा ने देश ही नहीं, विदेशों में भी हिंदी का परचम लहराया। 1957 में वे मास्को विश्वविद्यालय के अध्यक्ष के रूप में सोवियत संघ की यात्रा पर गए। 1963 में उन्हें नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय ने शिक्षा सहायक के रूप में आमंत्रित किया। 1967 में वे श्रीलंका में भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष के रूप में भेजे गए। ‘चित्ररेखा’ काव्य-संग्रह पर इन्हें हिंदी का सर्वश्रेष्ठ देव पुरस्कार..मिला है। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से नवाजा था।

अपनी भाषा पर गर्व करें, जूठन की ओर क्यों ताकें

डॉ.रामकुमार वर्मा ने एक बार कहा था कि ‘जिस देश के पास हिंदी जैसी मधुर भाषा है वह देश अंग्रेजी के पीछे दीवाना क्यों है? स्वतंत्र देश के नागरिकों को अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए। हमारी भावभूमि भारतीय होनी चाहिए। हमें जूठन की ओर नहीं ताकना चाहिए।’

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