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डीएनए जांच सबसे विश्वसनीय साक्ष्य:  हाईकोर्ट 

Wed, 18 Nov 2020 08:16 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 18 Nov 2020 08:16 PM IST
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DNA test most reliable evidence: High Court
allahabad highcourt - फोटो : prayagraj

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार के आरोप को साबित करने के लिए डीएनए जांच सबसे विश्वसनीय साक्ष्य है। यह महिलाओं के लिए भी ऐसे आरोपों को गलत साबित करने के लिए कारगर तरीका है। कोर्ट ने कहा कि जहां संभावना के आधार पर निष्कर्ष निकालने की स्थिति हो, वहां वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित साक्ष्य को अधिक विश्वसनीय माना जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फैसलों में डीएनए जांच को सबसे विश्वसनीय और प्रमाणिक साक्ष्य मान्य है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली महिला की याचिका खारिज कर दी है।
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हमीरपुर की एक महिला की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल ने दिया है। याचिका में 21 अक्तूबर 2019 के अपर प्रधान पारिवारिक न्यायाधीश हमीरपुर के फैसले को चुनौती दी गई थी।
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सवाल उठाया गया कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक याचिका, जिसमें पति ने पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया है, के तहत सुनवाई करते हुए अदालत क्या यह निर्देश दे सकती है कि पत्नी या तो डीएन जांच कराए या ऐसा करने से इनकार कर दे।

और क्या यदि पत्नी डीएनए जांच कराना स्वीकार करती है तो टेस्ट के निष्कर्ष उस पर लगाए गए आरोपों को अंतिम रूप से सच साबित करेंगे। और यदि पत्नी डीएनए जांच कराने से इनकार करती है तो क्या अदालत पत्नी के खिलाफ धारणा बना सकती है। 

कोर्ट ने इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि सुप्रीमकोर्ट ने डीएनए टेस्ट को सबसे वैधानिक और वैज्ञानिक रूप से पुष्ट जरिया माना है। जिसका इस्तेमाल पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाने वाला पति कर सकता है।

वैज्ञानिक साक्ष्य पुख्ता होते हैं। यहां अनुमान की गुंजाइश नहीं है, इसलिए अदालतों को निष्कर्ष निकालने के लिए अनुमान पर आश्रित होने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इसे सबसे विश्वसनीय और सही माध्यम माना जा सकता है।

यह पत्नी के लिए भी पति के आरोपों को झूठा सबित करने के लिए उपयोगी है। कोर्ट ने परिवार न्यायालय के फैसले में कोई अवैधानिकता न पाते हुए याचिका खारिज कर दी है। 

यह था मामला

याची की रामआसरे से वर्ष 2004 में शादी हुई थी। दोनों से तीन बेटियां हैं। पति का कहना है कि वह 15 जनवरी 2013  से पत्नी से अलग हो गया है और इसके बाद वह दोनों कभी भी एक साथ नहीं हुए। 2014 से पति गुजारा भत्ता भी दे रहा है। इसके बाद 26 जनवरी 2016 को पत्नी ने अपने मायके में एक बेटे को जन्म दिया। इसके बाद पति ने व्यभिचार को आधार बनाते हुए तलाक याचिका दाखिल की।
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