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स्वास्थ्य : कोरोना काल में 40 फीसदी बढ़े डिप्रेशन के मरीज, मनोचिकित्सकों ने की उपचार पर चर्चा

Sun, 31 Oct 2021 11:11 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 31 Oct 2021 11:11 PM IST
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Depression patients increased by 40% during the Corona period, psychiatrists discussed treatment
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आर्थिक तंगी, पारिवारिक दिक्कत, बीमारी, कॅरियर, काम का बोझ, तमाम तरह की चिंता समेत अन्य समस्याओं केेे साथ कोरोना से उबरे लोग भी अब डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। मनोचिकित्सकों के मुताबिक करीब 40 प्रतिशत लोग डिप्रेशन का शिकार हैं। डिप्रेशन के मरीज इसलिए बढ़ रहे हैं, क्योंकि वह खुद को मानसिक रोगी मानने को तैयार नहीं हैं। इससे बदल रहा व्यवहार, लोगों के दिमाग पर भारी पड़ रहा है।

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ऐसे तमाम मुद्दों पर चर्चा के बाद रविवार को इंडियन साइकेट्रिक सोसाइटी के तीन दिनी वार्षिक सम्मेलन सिपकॉन का को समापन हो गया। पीजीआई चंडीगढ़ की डॉ.सविता मेहरोत्रा, सतना की डॉ. संगीता जैन, लखनऊ के डॉ. विवेक अग्रवाल, बीएचयू के जय सिंह यादव, डॉ. एपी पांडेय, जबलपुर के डॉ. पीके ज्वैल समेत अन्य विशेषज्ञों ने कोरोना काल में बढ़े डिप्रेशन के मरीजों के उपचार पर चर्चा की।
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पटना के डॉ. विनय कुमार ने रचनात्मकता और मनोरोग पर जानकारी दी। विशेषज्ञों ने बताया कि कोरोना काल में आया ठहराव और वर्तमान की कार्यशैली के बीच तालमेल का न बैठ पाना भी डिप्रेशन का कारण बन रहा है। लोगों को उपने भीतर आए बदलावों पर ध्यान देकर अनुशासित होना होगा। 

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इस मौके पर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड और झारखंड के मानसिक रोग विशेषज्ञों ने दिमाग के साइक्रेट्री पक्ष को जानने, पहचानने और निदान पर अपने अनुभव साझा किए। बताया कि किस तरह डिप्रेशन के शिकार व्यक्ति से बातचीत, मनोभावों को जानने, चेहरा देखकर रोग का उपचार किया जाए। विशेषज्ञों ने व्यवहार परिवर्तन विषय पर अपने अनुभव साझा किए। 

आयोजन सचिव डॉ. सौरभ टंडन, संयोजक डॉ. विपुल मेहरोत्रा, डॉ. पुष्कर निगम के मुताबिक करीब 150 विशेषज्ञों ने अनुभव साझा किए। 50 से अधिक शोधपत्र पढ़े गए। विशेषज्ञों ने डिप्रेशन ही नहीं, नशा, गेमिंग, इंटरनेट और मोबाइल पर निर्भरता के साथ बच्चों के हाथों में मोबाइल जाने के खतरों पर भी चर्चा की। बताया गया कि बदली परिस्थितियों में बिहेवियर एडिक्शन के खतरे बताकर निदान भी सुझाए गए।

साइक्रे टिक से परहेज, अन्य विशेषज्ञों से इलाज
संयोजक डॉ. विपुल मेहरोत्रा के मुताबिक मनोरोगों का इलाज कराने से लोग कतराते हैं। कोरोना काल में लोग डरे, घर में रहे लेकिन अपनों से दूर होकर इंटरनेट की दुनिया में रमे रहे। काम से विरत रहे सो दिनचर्या अनियमित हो गई, जिससे डिप्रेशन ही नहीं बढ़ा, बीमारियों ने घेरना शुरू कर दिया।

इसमें सर्वाधिक मरीज डिप्रेशन के सामने आ रहे हैं, लेकिन मानसिक रोग के लक्षण जानते हुए भी लोग अन्य बीमारियों के विशेषज्ञ के पास पहुंचते है, लेकिन साइक्रेटिक के पास जाना नहीं चाहते। डॉ. सौरभ टंडन ने बताया कि पीड़ित इलाज न कराने से दिमाग को हल्का करने के लिए नशा करने लगते हैं, हाल के दिनों में यह नई परेशानी देखने को मिल रही है। यह दिनचर्या के साथ अनुशासनहीनता का परिणाम है।

लक्षण- तनाव, नींद न आना, नशाखोरी, बीमारी की आशंका, घबराहट, मौत का डर, समस्या के समाधान के बारे में न सोचना, मोबाइल-टीवी के साथ ज्यादा समय व्यतीत करने की आदत
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