हाईकोर्ट ने कहा : आपराधिक इतिहास जमानत न देने का आधार नहीं, 46 आपराधिक मामलों में लिप्त अभियुक्त को मिली जमानत
कोर्ट ने कहा कि यह स्थापित सिद्धांत है कि जमानत एक नियम है और जेल अपवाद। जमानत देने का उद्देश्य है कि अभियुक्त ट्रायल के दौरान कोर्ट में उपस्थित हो। मौजूदा मामले में ऐसा कोई तथ्य नहीं कि याची भाग जाएगा, न्याय में कठिनाइयां पैदा करेगा, अपराध की पुनरावृत्ति करेगा या गवाहों व साक्ष्य को प्रभावित करेगा।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि आपराधिक इतिहास होने के आधार पर अभियुक्त को जमानत पर रिहा करने से इन्कार नहीं किया जा सकता। वह तब, जब प्रश्नगत मामले में उसके खिलाफ कोई विश्वसनीय साक्ष्य न हो। यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने कानपुर नगर के सुमित अवस्थी की जमानत अर्जी स्वीकार करते हुए दिया है।
कोर्ट ने कहा कि यह स्थापित सिद्धांत है कि जमानत एक नियम है और जेल अपवाद। जमानत देने का उद्देश्य है कि अभियुक्त ट्रायल के दौरान कोर्ट में उपस्थित हो। मौजूदा मामले में ऐसा कोई तथ्य नहीं कि याची भाग जाएगा, न्याय में कठिनाइयां पैदा करेगा, अपराध की पुनरावृत्ति करेगा या गवाहों व साक्ष्य को प्रभावित करेगा। इन तथ्यों की मौजूदगी न होने की दशा में अभियुक्त जमानत पाने का हकदार हैं। कोर्ट ने शर्तों के साथ जमानत मंजूर करते हुए याची सुमित अवस्थी को रिहा करने का आदेश दिया है।
याची का कहना था कि याची के खिलाफ 46 आपराधिक केस का इतिहास है और उसने सबका खुलासा किया है। याची 11 जून 2015 से जेल में बंद हैं। सह अभियुक्त रवि पर फायरिंग करने का आरोप है। याची को षड्यंत्र करने के आरोप में फंसाया गया है। उसके खिलाफ अपराध में लिप्त होने का कोई सबूत नहीं है। एक ही घटना को लेकर फर्जी एफआईआर दर्ज कराई गई है। यह भी कहा कि जेल में बंद होने के बावजूद याची के खिलाफ गुजैनी थाने में विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। कोर्ट ने तमाम शर्तें लगाई हैं। कहा है कि पालन न करने पर जमानत निरस्त की जा सकती है।