फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Gone Red, Now Who Will Take In Old Age ...

चला गया लाल, अब कौन लेगा बुढ़ापे में हाल...

Mon, 28 Aug 2017 12:55 AM IST
मुनेंद्र बाजपेयी, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
मुनेंद्र बाजपेयी, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Mon, 28 Aug 2017 12:55 AM IST
विज्ञापन
Gone Red, Now Who Will Take In Old Age ...
इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
इकलौते जवान होनहार बेटे की मौत से टूट से गए डॉ. संजय पांडेय खुद को संयत रखने का प्रयास तो करते लेकिन संवेदना जताने वालों की तरफ देखते ही उनकी आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगते। कभी भर्राई आवाज में भैया, भैया...कहां हो..बुदबुदाते और लैपटॉप पर बेटे शाश्वत की फोटो देख जड़ हो जाते। पहाड़ जैसे दुख को चेहरे के भाव से छिपाने का प्रयास करते। डॉ. संजय बोले, प्यार से हम सब उसे भैया ही कहते थे। हर परीक्षा का टॉपर, गोल्ड मेडलिस्ट और चिकित्सा क्षेत्र की नवीनतम जानकारी रखने वाले होनहार को एक सिरफिरे की करतूत ने हमसे दूर कर दिया। हर मोड़ पर हमें वह याद आएगा।
विज्ञापन


चर्च लेन स्थित आवास के अहाते में बेंत के दीवान पर टेक लगाकर बैठे डॉ. संजय के पास व्हील चेयर पर बैठीं उनकी बुजुर्ग मां सरस्वती देवी के भी आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। बेटी, बहन, रिश्तेदार और शाश्वत के दोस्त डॉ. संजय के पास आते और बेटे की याद कर असंयत होने पर उन्हें संभालते। बोलते, हीरो था मेरा बेटा, कभी का किसी का नुकसान नहीं किया, उसका कोई दुश्मन नहीं था। जिसने उसका कत्ल किया, बेरहमी से उसका गला रेतकर शरीर पर 20 से अधिक घाव किए, उसे भी शाश्वत ने पढ़ाया। इस समय वह उसकी थीसिस लिख रहा था।
विज्ञापन

डॉ. शाश्वत बचपन में कैसा था।

संत जोसेफ में पढ़ाई के समय कितने मेडल और प्रमाण पत्र पाए, पहली बार में ही एमबीबीएस की परीक्षा में 100 वीं रैंक हासिल की, जैसी तमाम बातों का जिक्र करते समय डॉ. संजय पांडेय का गला रुंध जाता। कभी रोते, कभी सुबकते तो कभी सिर पकड़ कर बैठ जाते। लोग संवेदना जताते और चले जाते। दोपहर बाद करीब तीन बजे लोगों का आना जाना कुछ देर के लिए थमा तो परिवारीजनों के बीच खुद को अकेला पाकर डॉ. संजय बोले, शालिनी को संभालना है। सोचा था.. भैया बुढ़ापे की लाठी बनेगा। मेरी तबीयत खराब होगी तो अब कौन संभालेगा। बेटा होता इसीलिए है कि पिता कमजोर-बूढ़ा हो तो वह उन्हें संभाले। चला गया लाल, अब बुढ़ापे में कौन लेगा मेरा हाल...।
विज्ञापन
विज्ञापन


डॉ. शाश्वत जब इलाहाबाद आता अपना ज्यादातर समय घर पर ही व्यतीत करता। शाम को माता डॉ. शालिनी, पिता डॉ. संजय को जल्दी घर आने को कहता और बहन के साथ खाने की तैयारी कराता। डॉ. संजय पांडेय ने यह बताते हुए रो पड़े, बोले.. यहां वह जितने दिन रहता, खाना खाकर मेरे पैर तब तक दबाता, जब तक मैं सो न जाऊं। इस बीच वह गीता के प्रसंगों पर बात करता। गीता के सभी अध्याय के बारे में उसे गहरी जानकारी थी। किसी भी प्रसंग पर वह अध्याय के बारे में तुरंत जानकारी देता था। आखिरी बार 11 अप्रैल को अपने जन्म दिन पर शाश्वत आया था।

अपने बीच शाश्वत नहीं है, यह मनहूस खबर डॉ. शालिनी को दिल्ली में ही मिली। उन्हें दिल का दौरा पड़ा। डॉक्टरों ने उन्हें संभाला। डॉक्टर के साथ वह बेटे के शव लेकर दिल्ली से लखनऊ फिर वहां से इलाहाबाद आईं। यहां भी उनकी स्थिति ठीक नहीं थी। शव यात्रा घाट को गई तो परिजनों ने डॉक्टरों की मदद से उन्हें दवा देकर सुला दिया। बीच-बीच में वह उठतीं तो शाश्वत के बारे में ही पूछतीं। बेटी श्रेया और अन्य घर वाले उन्हें संभालते।

डॉ. संजय पांडेय बेटे की मौत से दुखी थे लेकिन अपने स्वाभाव के मुताबिक वह शाश्वत के दोस्तों को ढांढस बंधा रहे थे। कभी वह शाश्वत के रूम मेट हिमांशु को बुलाते तो कभी डॉ. अंकित को, एक के बाद एक सभी को बुलाया और कुछ खाकर आराम करने को कहा। बोले कि जिसने सुना, वह दो-चार घंटे में दिल्ली पहुंच गया। ऐसे दोस्त भगवान सबको दे, सभी तीन दिन से सोए नहीं हैं। डॉ. संजय ने कहा, एक बेटा गया तो क्या, ये सब मेरे बेटे हैं।

डॉ. शाश्वत के साथ मनिपाल कर्नाटक में एमबीबीएस करने वाले दोस्त डॉ. समर्थ, डॉ. अंकित, डॉ. रौनक, डॉ. अदित, डॉ. मयंक, डॉ, अमित, डॉ, इशांक आदि यहां उसका शव लेकर यहां आए। किसी को सूचना ई पेपर से मिली तो किसी को व्हाट्स एप से, जैसे ही यह खबर वायरल हुई शाश्वत के दोस्तों ने आपस में बात की और जिसे जो साधन मिला, दिल्ली पहुंच गए। कोई पुणे से आया तो कोई अन्य राज्यों से। यहां दोस्तों ने बताया कि उसकी प्रतिभा के बारे में जताने की कोई जरूरत नहीं है। वह होनहार और दोस्तों का मददगार था। पहले साल से ही वह दिक्कत होने पर उन्हें खुद पढ़ाता और फिर अपनी तैयारी करता। उसे मेडिकल कॉलेज के बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिला तो हम सब ने मिलकर खुशियां मनाई थीं। शाश्वत के दुखी दोस्तों ने कहा, आज वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसे हम भुला नहीं पाएंगे। दोपहर बाद कुछ दोस्त लखनऊ फ्लाइट पकड़ने गए तो कुछ रात में दुरंतों से दिल्ली के लिए निकले। शाश्वत का रूम पार्टनर हिमांशु और साथी इशांत भी दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

भाई डॉ. शाश्वत की मौत से दुखी उसकी बहन श्रेया उर्फ मीठी (घर में प्यार से उसे सब मीठी बुलाते हैं) के आंसू तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। दिल्ली से इलाहाबाद तक जब वह आंखें खोलती आंसू बहने लगते। कभी बीमार मां डॉ. शालिनी को संभालती और मौका पाती तो सुबकने लगती। घर में भाई का शव देखकर मीठी रोते हुए बोली, भैया अब किसे बांधेंगे राखी...


बेटे की चिता को आग लगाकर लोगों के बीच बैठे डॉ. संजय पांडेय ने रसूलाबाद घाट पर भी अपने चिकित्सकीय धर्म का निर्वहन किया। पास ही जल रही चिता के पास एक युवक बेहोश होकर गिर पड़ा। शोरगुल मचा तो पता चला कि उसे चक्कर आ गया। वहां तुरंत पहुंचे डॉ. संजय ने युवक की नब्ज देखी, मर्ज का आकलन कर उसके पैर ऊपर उठाए और मुंह में पानी के छींटे मारे। थोड़ी ही देर में उसे होश आ गया। डॉ. संजय पर पड़ी विपत्ति के बारे में जानकारी होने पर युवक के परिवारीजनों ने दुख को सहन करने की आशीष दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें हर राज्य और शहर से जुड़ी क्राइम समाचार की
ब्रेकिंग अपडेट।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed