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नेहरू की सीट पर 34 सालों से कांग्रेस को जीत का इंतजार
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 25 Feb 2018 01:45 AM IST
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जवाहरलाल नेहरू
- फोटो : SELF
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नेहरू परिवार की परंपरागत फूलपुर संसदीय सीट पर कांग्रेस को 34 सालों से जीत का इंतजार है। आखिरी बार 1984 में रामपूजन पटेल यहां से कांग्रेस के टिकट पर विजयी हुए थे उसके बाद से कांग्रेस ने जीत का स्वाद नहीं चखा है। उप चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी जेएन मिश्र के बेटे मनीष मिश्र मैदान में हैं।
देश को पहला कांग्रेसी प्रधानमंत्री देने वाली फूलपुर सीट हमेशा चर्चा में रही है। नेहरू परिवार के अलावा भी कई दिग्गज इस सीट से जीतकर संसद पहुंचे हैं। वर्ष 1952, 1957 एवं 1962 में पंडित जवाहर लाल नेहरू जीतकर संसद पहुंचे। उनके निधन के बाद 1964 में हुए लोकसभा के उपचुनाव और 1967 में हुए आम चुनाव में पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित दो बार संसद पहुंची। 1967 में विजय लक्ष्मी पंडित के संयुक्त राष्ट्र संघ चले जाने के बाद हुए 1969 में उपचुनाव में कांग्रेस का गढ़ टूटा और पहली बार इस सीट से छोटे लोहिया कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में पहली बार संसद पहुंचे।
जनेश्वर मिश्र के बाद 1971 में हुए आम चुनाव में इस सीट से पहली बार जीतकर विश्वनाथ प्रताप सिंह संसद पहुंचे। 1977 के आम चुनाव में भारतीय लोकदल की प्रत्याशी के तौर पर कमला बहुगुणा जीतीं तो 1980 में जनता पार्टी के प्रत्याशी बीडी सिंह संसद पहुंचे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर में 1984 में कांग्रेस ने यहां फिर वापसी की राम पूजन पटेल यहां से जीते। इसके बाद कांग्रेस को कभी भी इस सीट से जीत हासिल नहीं हुई है। बाद में रामपूजन पटेल कांग्रेस छोड़कर जनता दल में शामिल हो गए। जनता दल में शामिल होने के बाद रामपूजन पटेल 1989 और 1991 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
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रामपूजन पटेल के बाद फूलपुर संसदीय सीट 1996 से 2004 तक लगातार चार बार समाजवादी पार्टी के कब्जे में रही। 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी छोड़ समाजवादी पार्टी में शामिल हुए जंग बहादुर पटेल ने अपने राजनीतिक गुरु एवं बसपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम को पराजित कर संसद में पहुंचे। दो वर्ष के अंतराल पर 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में जंगबहादुर पटेल ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। लगातार दो लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद समाजवादी पार्टी ने जंगबहादुर की जगह स्थानीय धर्मराज पटेल को मैदान में उतारा और वह जीतकर संसद पहुंचे।
1999 में जीतकर संसद पहुंचे धर्मराज के बदले समाजवादी पार्टी ने 2004 में शहर पश्चिमी के बाहुबली नेता अतीक अहमद पर दांव लगाया, वह रिकार्ड जीत के साथ संसद पहुंचे। नए परिसीमन के आधार पर हुए 2009 के लोकसभा चुनाव में लगातार चार बार से इस सीट पर जीत हासिल कर रही सपा को पराजित कर बसपा के कपिलमुनि करवरिया पहलीबार जीतकर संसद पहुंचे। 2014 के लोकसभा चुनाव में पूरे देश में चली मोदी की लहर में भाजपा प्रत्याशी केशव प्रसाद मौर्य रिकार्ड तीन लाख मतों के साथ जीतकर संसद पहुंचे। अब प्रदेश सरकार में उप मुख्यमंत्री बन जाने के बाद केशव मौर्य की खाली की गई सीट पर उपचुनाव हो रहा है। इस सीट पर एक बार फिर से कांग्रेस के मनीष मिश्र दांव आजमा रहे हैं।
‘‘हम अपनी परंपरागत सीट एक बार फिर से हासिल करने के लिए योग्य और स्थानीय प्रत्याशी के बूते पर मैदान में हैं। हमारी रणनीति चुनाव के दौरान हर बूथ के अनुसार 15 कार्यकर्ताओं को लगाने की है। इसके लिए जिम्मेदारी तय की जा रही है। देश एवं प्रदेश की जनता भाजपा एवं सपा की रीति नीति से परिचित है। ऐसे में हम अबकी बार राजस्थान की तरह यूपी में भी लोकसभा चुनाव जीतेंगे।’’
अनिल द्विवेदी, जिलाध्यक्ष कांग्रेस
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देश को पहला कांग्रेसी प्रधानमंत्री देने वाली फूलपुर सीट हमेशा चर्चा में रही है। नेहरू परिवार के अलावा भी कई दिग्गज इस सीट से जीतकर संसद पहुंचे हैं। वर्ष 1952, 1957 एवं 1962 में पंडित जवाहर लाल नेहरू जीतकर संसद पहुंचे। उनके निधन के बाद 1964 में हुए लोकसभा के उपचुनाव और 1967 में हुए आम चुनाव में पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित दो बार संसद पहुंची। 1967 में विजय लक्ष्मी पंडित के संयुक्त राष्ट्र संघ चले जाने के बाद हुए 1969 में उपचुनाव में कांग्रेस का गढ़ टूटा और पहली बार इस सीट से छोटे लोहिया कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में पहली बार संसद पहुंचे।
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जनेश्वर मिश्र के बाद 1971 में हुए आम चुनाव में इस सीट से पहली बार जीतकर विश्वनाथ प्रताप सिंह संसद पहुंचे। 1977 के आम चुनाव में भारतीय लोकदल की प्रत्याशी के तौर पर कमला बहुगुणा जीतीं तो 1980 में जनता पार्टी के प्रत्याशी बीडी सिंह संसद पहुंचे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर में 1984 में कांग्रेस ने यहां फिर वापसी की राम पूजन पटेल यहां से जीते। इसके बाद कांग्रेस को कभी भी इस सीट से जीत हासिल नहीं हुई है। बाद में रामपूजन पटेल कांग्रेस छोड़कर जनता दल में शामिल हो गए। जनता दल में शामिल होने के बाद रामपूजन पटेल 1989 और 1991 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
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रामपूजन पटेल के बाद फूलपुर संसदीय सीट 1996 से 2004 तक लगातार चार बार समाजवादी पार्टी के कब्जे में रही। 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी छोड़ समाजवादी पार्टी में शामिल हुए जंग बहादुर पटेल ने अपने राजनीतिक गुरु एवं बसपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम को पराजित कर संसद में पहुंचे। दो वर्ष के अंतराल पर 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में जंगबहादुर पटेल ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। लगातार दो लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद समाजवादी पार्टी ने जंगबहादुर की जगह स्थानीय धर्मराज पटेल को मैदान में उतारा और वह जीतकर संसद पहुंचे।
1999 में जीतकर संसद पहुंचे धर्मराज के बदले समाजवादी पार्टी ने 2004 में शहर पश्चिमी के बाहुबली नेता अतीक अहमद पर दांव लगाया, वह रिकार्ड जीत के साथ संसद पहुंचे। नए परिसीमन के आधार पर हुए 2009 के लोकसभा चुनाव में लगातार चार बार से इस सीट पर जीत हासिल कर रही सपा को पराजित कर बसपा के कपिलमुनि करवरिया पहलीबार जीतकर संसद पहुंचे। 2014 के लोकसभा चुनाव में पूरे देश में चली मोदी की लहर में भाजपा प्रत्याशी केशव प्रसाद मौर्य रिकार्ड तीन लाख मतों के साथ जीतकर संसद पहुंचे। अब प्रदेश सरकार में उप मुख्यमंत्री बन जाने के बाद केशव मौर्य की खाली की गई सीट पर उपचुनाव हो रहा है। इस सीट पर एक बार फिर से कांग्रेस के मनीष मिश्र दांव आजमा रहे हैं।
‘‘हम अपनी परंपरागत सीट एक बार फिर से हासिल करने के लिए योग्य और स्थानीय प्रत्याशी के बूते पर मैदान में हैं। हमारी रणनीति चुनाव के दौरान हर बूथ के अनुसार 15 कार्यकर्ताओं को लगाने की है। इसके लिए जिम्मेदारी तय की जा रही है। देश एवं प्रदेश की जनता भाजपा एवं सपा की रीति नीति से परिचित है। ऐसे में हम अबकी बार राजस्थान की तरह यूपी में भी लोकसभा चुनाव जीतेंगे।’’
अनिल द्विवेदी, जिलाध्यक्ष कांग्रेस