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हाशिये पर गए सवर्णों को साधने में जुटी कांग्रेस
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 06 May 2016 02:15 AM IST
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प्रशांत किशोर
- फोटो : amar ujala
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पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के वोट बैंक की राजनीति करने वाली पार्टियों का दांव आगामी विधानसभा चुनाव में उल्टा पड़ सकता है। सवर्ण अगर एकजुट हुए तो समीकरण पलट जाएगा। भाजपा भले ही इस समीकरण से इतर केशव मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सपा और बसपा के वोट बैंक में सेंधमारी की तैयारी कर रही हो लेकिन खरगोश और कछुए की इस दौड़ में पीके (चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर) के इशारे पर धीमे-धीमे आगे बढ़ रही कांग्रेस की नजर उन सवर्णों पर है, जो ढाई दशक से हाशिये पर हैं। कांग्रेस अब सवर्णों के भरोसे यूपी में दोबारा पांव जमाने की कोशिश कर रही है।
सवर्णों में भी पार्टी की नजर उन 12 फीसदी ब्राह्मण, आठ फीसदी राजपूतों और चार से पांच फीसदी कायस्थों पर है, जिन्हें जोड़ दिया जाए तो पार्टी यूपी में अपना मजबूत सवर्ण जनाधार तैयार कर सकती है। कांग्रेस को मालूम है कि मुस्लिम मतदाता भाजपा विरोधी उस पार्टी के साथ होंगे, जो रेस में सबसे आगे होगी। ऐसे में सवर्णों, मुस्लिमों और पार्टी के परंपरागत वोटरों में कांग्रेस को संभावना नजर आने लगी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि पार्टी अगर इस समीकरण को अपने पक्ष में करने में कामयाबी मिलती है तो भले ही अपने बूते सरकार न बना सकें लेकिन कांग्रेस के बिना भी यूपी में नई सरकार नहीं बनने वाली। ढाई दशक बाद अगर यह स्थित आती है तो कांग्रेस के लिए यह बड़ी उपलब्धि होगी और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी यूपी में और मजबूती के साथ अपनी जड़ें जमा सकेगी।
‘कांग्रेस विकास के मुद्दे के साथ उन सवर्ण वोटरों को भी आने साथ लाना चाहती है, जो ढाई दशक तक हाशिये पर रहे और दूसरे दल उनकी अनदेखी करते रहे। जहां तक जनाधार का सवाल है तो पार्टी को हर वर्ग का समर्थन प्राप्त है।’ किशोर वार्ष्णेय, कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता
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‘पिछले ढाई दशक से यूपी में क्षेत्रीय दल लगातार सत्ता में रहे। कभी सपा तो कभी बसपा, सो प्रदेश की राजनीति पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही। जहां तक सवर्णों की बात है तो उन्हें एकजुट करने के लिए उनके बीच गहरी होती जा रही खाई को पाटना होगा, जो काफी चुनौतीपूर्ण काम है। इस नीति पर कांग्रेस कितना सफल होगी, यह चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ही साफ होगा।’ प्रो. एमपी दुबे, राजनीति शास्त्री
‘यूपी में पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति का उपयोग वोट बैंक की तरह किया गया। सवर्णों को डिवाइड एंड रूल के तहत बांटकर सभी दलों ने अपने-अपने तरीके से उनके वोट का इस्तेमाल किया। यह समाज के लिए खतरा है लेकिन दुर्भाग्य कि यूपी की राजनीति इसी पर आधारित है। सवर्णों को अपने पक्ष में एकजुट कर पाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।’ डॉ. इंदिरा श्रीवास्तव, समाज शास्त्री
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सवर्णों में भी पार्टी की नजर उन 12 फीसदी ब्राह्मण, आठ फीसदी राजपूतों और चार से पांच फीसदी कायस्थों पर है, जिन्हें जोड़ दिया जाए तो पार्टी यूपी में अपना मजबूत सवर्ण जनाधार तैयार कर सकती है। कांग्रेस को मालूम है कि मुस्लिम मतदाता भाजपा विरोधी उस पार्टी के साथ होंगे, जो रेस में सबसे आगे होगी। ऐसे में सवर्णों, मुस्लिमों और पार्टी के परंपरागत वोटरों में कांग्रेस को संभावना नजर आने लगी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि पार्टी अगर इस समीकरण को अपने पक्ष में करने में कामयाबी मिलती है तो भले ही अपने बूते सरकार न बना सकें लेकिन कांग्रेस के बिना भी यूपी में नई सरकार नहीं बनने वाली। ढाई दशक बाद अगर यह स्थित आती है तो कांग्रेस के लिए यह बड़ी उपलब्धि होगी और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी यूपी में और मजबूती के साथ अपनी जड़ें जमा सकेगी।
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‘कांग्रेस विकास के मुद्दे के साथ उन सवर्ण वोटरों को भी आने साथ लाना चाहती है, जो ढाई दशक तक हाशिये पर रहे और दूसरे दल उनकी अनदेखी करते रहे। जहां तक जनाधार का सवाल है तो पार्टी को हर वर्ग का समर्थन प्राप्त है।’ किशोर वार्ष्णेय, कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता
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‘पिछले ढाई दशक से यूपी में क्षेत्रीय दल लगातार सत्ता में रहे। कभी सपा तो कभी बसपा, सो प्रदेश की राजनीति पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही। जहां तक सवर्णों की बात है तो उन्हें एकजुट करने के लिए उनके बीच गहरी होती जा रही खाई को पाटना होगा, जो काफी चुनौतीपूर्ण काम है। इस नीति पर कांग्रेस कितना सफल होगी, यह चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ही साफ होगा।’ प्रो. एमपी दुबे, राजनीति शास्त्री
‘यूपी में पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति का उपयोग वोट बैंक की तरह किया गया। सवर्णों को डिवाइड एंड रूल के तहत बांटकर सभी दलों ने अपने-अपने तरीके से उनके वोट का इस्तेमाल किया। यह समाज के लिए खतरा है लेकिन दुर्भाग्य कि यूपी की राजनीति इसी पर आधारित है। सवर्णों को अपने पक्ष में एकजुट कर पाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।’ डॉ. इंदिरा श्रीवास्तव, समाज शास्त्री