High Court : आरोप पत्र व संज्ञान आदेश को रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किए बिना धारा-528 के तहत केस रद्द नहीं की जा सकता
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप पत्र और संज्ञान आदेश अदालत के रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करने के बाद ही बीएनएसएस की धारा-528 (पूर्व धारा-482 सीआरपीसी) के तहत एफआईआर रद्द करने की अर्जी विचार योग्य होगी।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप पत्र और संज्ञान आदेश अदालत के रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करने के बाद ही बीएनएसएस की धारा-528 (पूर्व धारा-482 सीआरपीसी) के तहत एफआईआर रद्द करने की अर्जी विचार योग्य होगी। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने याची विश्वबंधु की अर्जी खारिज कर दी। मेरठ के सिविल लाइंस थाने में याची पर एक सहकारी आवास समिति की शिकायत पर जून-2024 को धोखाधड़ी व अन्य आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जाली पावर ऑफ अटॉर्नी और फर्जी बिक्री विलेख तैयार कर भूमि का हस्तांतरण करने का आरोप है।
याची ने मुकदमे को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में बीएनएसएस की धारा-528 के तहत अर्जी दायर की। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि इस भूमि संबंधी विवाद में पहले वर्ष 2022 में एफआईआर दर्ज हो चुकी है और उस पर चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है। ऐसे में एक ही अपराध के लिए दोबारा एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। यह भी कहा कि सिविल प्रकृति का मामला है, जिसे गलत तरीके से आपराधिक रंग दिया गया है। वहीं, प्रतिवादी अधिवक्ता ने दलील दी कि मामले की जांच जारी है। इस स्तर पर बीएनएसएस की धारा-528 के तहत हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता।
याची ने अदालत को गुमराह किया है और जाली दस्तावेज का उपयोग किया है। इसलिए राहत का कोई आधार नहीं है।हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रदन्या प्रांजल कुलकर्णी बनाम महाराष्ट्र राज्य में दिए गए फैसले का हवाला दिया। कहा कि ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल हो चुकी हो और उस पर विचार प्रारंभ हो गया हो। इसके बाद चार्जशीट व संज्ञान आदेश हाईकोर्ट के समक्ष पेश किए जाएं, तभी एफआईआर रद्द करने की अर्जी स्वीकार्य होगी। इस मामले में आवेदक ने ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए हैं। कोर्ट ने अर्जी को पोषणीय नहीं माना और खारिज कर दी।
समन आदेश पर हाईकोर्ट की अंतरिम रोक, विरोधी पक्ष को नोटिस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुरादाबाद के ट्रायल कोर्ट की ओर से जारी समन आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। साथ ही विरोधी पक्ष को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने दिया।
मुरादाबाद के कांठ थाने में 2020 में याची दिलशाद और नौशाद पर हत्या के आरोप में प्राथमिकी दर्ज है। दोनों ने समन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के अधिवक्ता इम्तियाज हुसैन दलील दी कि पुलिस जांच के दौरान स्वतंत्र गवाहों के बयान से यह स्पष्ट हुआ था कि घटना के वक्त याचिकाकर्ता मौके पर नहीं थे। उनके खिलाफ कोई आरोप पत्र भी दाखिल नहीं हुआ। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने धारा-319 सीआरपीसी के तहत केवल गवाहों के आधार पर समन जारी कर दिया, जो कानूनन त्रुटिपूर्ण है।
वहीं, कोर्ट ने मामले को विचारणीय मानते हुए विपक्षी को तीन सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता को उसके बाद दो सप्ताह में प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने का समय दिया है। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट के 28 अक्तूबर 2025 को जारी समन आदेश के परिचालन पर अंतरिम रोक लगा दी है।