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डीएम कर सकता है अविश्वास नोटिस का सत्यापन
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Tue, 03 Feb 2015 12:14 AM IST
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जिला पंचायत/क्षेत्र पंचायत सदस्यों द्वारा दिए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव नोटिस की वैधानिक प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय पूर्ण पीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। इसके अनुसार सदस्यों द्वारा दिए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव नोटिस पर किए गए हस्ताक्षरों को लेकर यदि कोई संदेह या फर्जीवाड़े की शिकायत है तो कलेक्टर इसकी सीमित दायरे में जांच कर सकता है। पूर्णपीठ ने यह भी साफ किया है कि, मगर ऐसे मामलों में कलेक्टर को सिविल कोर्ट की तरह साक्ष्यों का परीक्षण करने या प्रक्रिया अपनाने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने से अविश्वास प्रस्ताव का समय समाप्त हो जाएगा और उसका उद्देश्य निरर्थक हो जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश डॉ. डीवाई चंद्रचूड, न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता और न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की पूर्णपीठ ने कहा कि कलेक्टर मात्र पोस्टऑफिस की भूमिका नहीं निभा सकता है। इस विषय पर कलेक्टर के अधिकारों को लेकर दो न्यायपीठों में मतभिन्नता थी। एक न्यायपीठ का मत था कि अविश्वास प्रस्ताव मिलने के बाद डीएम को उसे मतदान के लिए भेज देना चाहिए क्योंकि मौजूदा कानून में उसे जांच करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। वहीं दूसरी पीठ का मत था कि यदि अविश्वास प्रस्ताव पर सदस्यों की फर्जी हस्ताक्षर की शिकायत है तो डीएम उसकी जांच करा सकता है। मतभिन्नता के कारण प्रकरण पूर्णपीठ को संदर्भित किया गया था। इस मामले में कई जिला पंचायत अध्यक्षों की ओर से याचिका दाखिल की गई थी।
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मुख्य न्यायाधीश डॉ. डीवाई चंद्रचूड, न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता और न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की पूर्णपीठ ने कहा कि कलेक्टर मात्र पोस्टऑफिस की भूमिका नहीं निभा सकता है। इस विषय पर कलेक्टर के अधिकारों को लेकर दो न्यायपीठों में मतभिन्नता थी। एक न्यायपीठ का मत था कि अविश्वास प्रस्ताव मिलने के बाद डीएम को उसे मतदान के लिए भेज देना चाहिए क्योंकि मौजूदा कानून में उसे जांच करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। वहीं दूसरी पीठ का मत था कि यदि अविश्वास प्रस्ताव पर सदस्यों की फर्जी हस्ताक्षर की शिकायत है तो डीएम उसकी जांच करा सकता है। मतभिन्नता के कारण प्रकरण पूर्णपीठ को संदर्भित किया गया था। इस मामले में कई जिला पंचायत अध्यक्षों की ओर से याचिका दाखिल की गई थी।
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