बॉडीबिल्डिंग : समाज ने शरीर और कपड़ों को लेकर मारे ताने, चित्रागंदा ने फिटनेस माडलिंग में जीता सिल्वर
गोविंदपुर की रहने वाली चित्रांगदा पांडेय कर रही हैं। चित्रांगदा बॉडीबिल्डिंग के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। बॉडीबिल्डिंग को आमतौर पर पुरुषों का खेल माना जाता है।
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कहते हैं कि सपने उन्हीं के साकार होते हैं जो उन सपनों के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं। सपनों को हकीकत में बदलने के लिए कई बार सभी आराम भूलकर मेहनत से तपना पड़ता है, जैसा कि गोविंदपुर की रहने वाली चित्रांगदा पांडेय कर रही हैं। चित्रांगदा बॉडीबिल्डिंग के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। बॉडीबिल्डिंग को आमतौर पर पुरुषों का खेल माना जाता है।
ऐसे में कोई महिला अगर बॉडीबिल्डिंग में भविष्य बनाने निकल जाए तो उसे समाज में कई तरह की बातें सुननी पड़ती है। चित्रांगदा को भी दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों से खूब ताने सुनने को मिले। लेकिन अपने सपने के प्रति अडिग रहने वाली चित्रांगदा ने राज्य स्तरीय बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता में सिल्वर पदक जीतकर उन सभी को अपना जवाब दे दिया है। लोग अब उनकी मेहनत और उनके हौसले व फैसले की सराहना कर रहे हैं।
चित्रांगदा ने शनिवार को मुरादाबाद के पंचायत भवन में आयोजित राज्य स्तरीय मार्डन फिजिक्स (फिटनेस माडलिंग) बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता में सिल्वर पदक जीता है। इससे पहले उन्होंने फरवरी में गाजियाबाद में हुई इसी राज्य स्तरीय बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता था। चित्रांगदा ने सिल्वर पदक जीतने के बाद तीन व चार जून को गोवा में आयोजित होने वाली साउथ एशिया बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता के ट्रायल के लिए भी क्वालीफाई कर लिया है।
इस ट्रायल में सफल होने के लिए उन्होंने अपने अभ्यास का समय भी बढ़ा दिया है।चित्रांगदा गोविंदपुर की रहने वाली हैं। बॉडीबिल्डिंग में आने से पहले वह पॉवरलिफ्टिंग की खिलाड़ी थी। पॉवरलिफ्टिंग करते समय ही उन्होंने जिम में दाखिला लिया। जिम करते हुए ही उन्हें इस प्रतियोगिता के बारे में जानकारी हुई। जिम ट्रेनर करण पंडित ने उन्हें सहयोग दिया। इसके बाद चित्रांगदा ने इस प्रतियोगिता में अपनी पहचान स्थापित करने का सपना देखा।
घर में मां-बाप से अपने इस फैसले के बारे में बताया तो पिता विजय नारायण और माता सुनिता पांडेय का पूरा समर्थन मिला। इसके बाद चित्रांगदा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने जिम में अधिक समय देना शुरू कर दिया और अपने शरीर को खूब मजबूत बना लिया।
चित्रांगदा के इस फैसले के बारे में जब उनके दोस्तों व करीबी रिश्तेदारों को मालूम हुआ तो अधिकतर ने चित्रांगदा पर ताने मारे। किसी ने इस खेल को लड़कों का खेल होने के ताने मारे, किसी ने खेल के कास्ट्यूम को लेकर बुरी बातें कहीं। वहीं कईयों ने चित्रांगदा के शरीर को लेकर भी उन्हें चिढ़ाया।
चित्रांगदा ने इन तमाम तानों को नजरअंदाज किया और अपने फैसले के लिए अडिग रही। चित्रांगदा कहती हैं उनके पदक जीतने के बाद लोगों का नजरिया उनके लिए बदला है। अब ताने मारने वाले लोग भी इसे एक खेल की दृष्टि से ही देख रहे हैं।
हर रोज करती हैं छह घंटे अभ्यास
चित्रांगदा का सपना है कि वह वैश्विक स्तर की स्पर्धा में हिस्सा लें और भारत के लिए पदक जीतें। इसके लिए वह हर रोज छह घंटे जिम में अभ्यास करती हैं। अपने खर्च को वहन करने के लिए वह एक जिम ट्रेनर के रूप में भी काम कर रही हैं। जिम में उनसे कई महिलाएं और पुरुष अभ्यास प्राप्त कर रहे हैं।
पसंद के खानपान को दिया त्याग
चित्रांगदा ने बताया कि उन्हें इस क्षेत्र में आने के लिए जहां खूब मेहनत करनी पड़ी है वहीं कई पसंद की चीजों को त्यागना भी पड़ा है। उन्हें मोमोज, समोसा, चाट और चाऊमीन जैसी चीजें खूब पसंद थी, लेकिन बॉडी बनाने के लिए उन्हें इन सभी पसंद की चीजों को छोड़ना पड़ा है। उन्होंने पिछले तीन सालों से इन सब चीजों को हाथ भी नहीं लगाया है। शादी में जाने के बावजूद वह बिना खाए ही वापस आ जाती हैं और घर पर बना पौष्टिक आहार ही खाती हैं। उन्होंने डायटिंग का कोर्स भी किया है और दूध, हरी सब्जी और सोयाबीन का वह खूब इस्तेमाल करती हैं।