{"_id":"597a42b24f1c1bf42c8b45bc","slug":"ban-on-teachers-adjustment-in-political-schools","type":"story","status":"publish","title_hn":"राजकीय विद्यालयों में शिक्षकों के समायोजन पर रोक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
राजकीय विद्यालयों में शिक्षकों के समायोजन पर रोक
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 28 Jul 2017 01:31 AM IST
विज्ञापन
शिक्षक
- फोटो : demo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने प्रदेश के राजकीय विद्यालयों में शिक्षकों के समायोजन पर रोक लगा दी है। समायोजन करने संबंधी 29 जून 2017 के शासनादेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने शासनादेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। अदालत ने इस मामले में प्रदेश सरकार और माध्यमिक शिक्षा परिषद से जवाब मांगा है। शासनादेश केतहत राजकीय विद्यालयों में कार्यरत 686 शिक्षकों का समायोजन किया जाना था।
शैलेंद्र कुमार सिंह सहित 107 अध्यापकों ने याचिका दाखिल कर समायोजन को चुनौती दी है। याचिका पर न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल ने सुनवाई की। प्रदेश सरकार ने एक नीति के तहत राजकीय इंटर मीडिएट कालेजों के शिक्षकों को छात्र संख्या के आधार पर सरप्लस बताकर सहायक अध्यापक के तौर पर दूसरे स्कूलों में समायोजन प्रारंभ किया है। उनसे ऑन लाइन आवेदन मांगे जा रहे हैं। याचीगण का कहना था कि उनकी नियुक्ति प्रवक्ता केपद पर विषयवार हुई है। जूनियर हाईस्कूल में पढ़ाने का उन्होंने प्रशिक्षण नहीं लिया है।
बाल मनोविज्ञान और छोटे बच्चों को पढ़ाने की तकनीक की जानकारी उनको नहीं है इसलिए जूनियर हाईस्कूल में समायोजन उचित नहीं है क्योंकि वह अध्यापन की निर्धारित योग्यता नहीं रखते हैं।
विज्ञापन
सरकार ने छात्र संख्या का मानक 1976 के शासनादेश केआधार पर बनाया है। जबकि अनिवार्य शिक्षा का कानून के तहत 35 छात्र पर एक शिक्षक होना चाहिए। प्रत्येक कक्षा में विज्ञान, गणित और भाषा का एक अध्यापक होना चाहिए। सरकार ने इन मानकोें को रद किनार कर शासनादेश जारी किया है। इसमें समायोजन की जिम्मेदारी मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक और डीआईओएस को सौंपी गई है। कोर्ट ने शासनादेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए जवाब तलब किया है।
विज्ञापन
शैलेंद्र कुमार सिंह सहित 107 अध्यापकों ने याचिका दाखिल कर समायोजन को चुनौती दी है। याचिका पर न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल ने सुनवाई की। प्रदेश सरकार ने एक नीति के तहत राजकीय इंटर मीडिएट कालेजों के शिक्षकों को छात्र संख्या के आधार पर सरप्लस बताकर सहायक अध्यापक के तौर पर दूसरे स्कूलों में समायोजन प्रारंभ किया है। उनसे ऑन लाइन आवेदन मांगे जा रहे हैं। याचीगण का कहना था कि उनकी नियुक्ति प्रवक्ता केपद पर विषयवार हुई है। जूनियर हाईस्कूल में पढ़ाने का उन्होंने प्रशिक्षण नहीं लिया है।
विज्ञापन
बाल मनोविज्ञान और छोटे बच्चों को पढ़ाने की तकनीक की जानकारी उनको नहीं है इसलिए जूनियर हाईस्कूल में समायोजन उचित नहीं है क्योंकि वह अध्यापन की निर्धारित योग्यता नहीं रखते हैं।
विज्ञापन
सरकार ने छात्र संख्या का मानक 1976 के शासनादेश केआधार पर बनाया है। जबकि अनिवार्य शिक्षा का कानून के तहत 35 छात्र पर एक शिक्षक होना चाहिए। प्रत्येक कक्षा में विज्ञान, गणित और भाषा का एक अध्यापक होना चाहिए। सरकार ने इन मानकोें को रद किनार कर शासनादेश जारी किया है। इसमें समायोजन की जिम्मेदारी मंडलीय संयुक्त शिक्षा निदेशक और डीआईओएस को सौंपी गई है। कोर्ट ने शासनादेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए जवाब तलब किया है।