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दोस्त बन दुनिया का सबक सिखाते बाबा-दादी
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 13 Sep 2015 01:55 AM IST
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इलाहाबाद। बच्चों के साथ खुद बच्चा बनकर लुका-छुपी खेलना, रात में पंचतंत्र, परियों की कहानियां सुनाना। टेस्ट से अच्छे नंबर आने पर टॉफी-चाकलेट्स मिलना हो या फिर कोई गलती होने पर उनके पीछे छिप जाना। सच है, बाबा-दादी का प्यार दुनिया से निराला है। गलत और सही के बीच का अंतर बताने का उनका तरीका किताबी ज्ञान से कई गुना बेहतर है। जिंदगी में हमेशा आगे बढ़ते रहने का सबक उनसे बेहतर कोई नहीं सिखा सकता, मगर बदलते वक्त के साथ यह सब कुछ धीरे-धीरे गुम हो रहा है।
रोजी रोटी की दौड़, आगे बढ़ने की होड़ में लोगों को अपना परिवार छोड़ना पड़ रहा है। वहीं जो परिवार साथ में रह रहे हैं वहां बच्चों में आधुनिकता का प्रभाव काफी हद तक हावी है। हकीकत यह है कि सीडी, डीवीडी में एनिमेटेड कहानियां देख-सुनकर या फिर स्मार्ट फोन में देश दुनिया से हर वक्त लिंक रहने के बावजूद वह संस्कार नहीं मिल सकते हैं, जो बाबा-दादी की सीख और कहानियां सुनते मिलती है।
बेसिक शिक्षा परिषद में उप निदेशक स्कंद शुक्ला कहते हैं कि जिस तरह से उन्हें अपने बाबा-दादी का साथ मिला, उसी तरह उनके दोनों बेटों शुभानन और अचित्य को भी अपने बाबा-दादी का साथ मिल रहा है। बाबा-दादी और बच्चों का रिश्ता बेहद अनोखा है। जिंदगी के बड़े से बड़े सबक और अनुशासन इनसे बेहतर कोई नहीं सिखा सकता है। उनरे अनुभव किताबों से कहीं बेहतर सीख देते हैं।
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स्टेनल रोड निवासी सरकारी कर्मचारी मनोज पांडेय अपनी नौकरी की वजह से माता-पिता संग नहीं रह पा रहे हैं, वे प्रतापग़ढ़ में रहते हैं। मनोज कहते हैं कि हम घर को काफी मिस करते हैं क्योंकि बच्चों की परवरिश में बाबा-दादी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। दरअसल जो सीख बच्चों को बाबा-दादी दे सकते हैं वह कोई और नहीं। जो प्यार, अपनापन और जिंदगी जीने का सलीका हमें अपने बाबा-दादी से मिला, वह चाहकर भी हमारे बच्चों को नहीं मिल पा रहा है। हम अपने बच्चों को भले ही चाहे जितना समझा लें, मगर दादा-दादी से मिलने वाला ‘क्वालिटी टाइम’ कोई नहीं दे सकता और न ही उनकी कमी कोई पूरा कर सकता है।
परिवार अगर बच्चों का स्कूल है तो दादी-दादा शिक्षक हैं। दादी-बाबा के होने की वजह से बच्चों में भावनात्मक सुरक्षा, व्यावहारिकता, तहजीब सभी कुछ सीखने को मिलता है। आज एकाकी परिवार के बढ़ने की वजह से बच्चों का सामाजीकरण कम होता जा रहा है। बच्चे अपनी ही एकाकी दुनिया में व्यस्त होते चले जा रहे हैं जो समाज के लिए सकारात्मक संकेत नहीं है।
0 डॉ.आशीष सक्सेना, समाजशास्त्री
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रोजी रोटी की दौड़, आगे बढ़ने की होड़ में लोगों को अपना परिवार छोड़ना पड़ रहा है। वहीं जो परिवार साथ में रह रहे हैं वहां बच्चों में आधुनिकता का प्रभाव काफी हद तक हावी है। हकीकत यह है कि सीडी, डीवीडी में एनिमेटेड कहानियां देख-सुनकर या फिर स्मार्ट फोन में देश दुनिया से हर वक्त लिंक रहने के बावजूद वह संस्कार नहीं मिल सकते हैं, जो बाबा-दादी की सीख और कहानियां सुनते मिलती है।
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बेसिक शिक्षा परिषद में उप निदेशक स्कंद शुक्ला कहते हैं कि जिस तरह से उन्हें अपने बाबा-दादी का साथ मिला, उसी तरह उनके दोनों बेटों शुभानन और अचित्य को भी अपने बाबा-दादी का साथ मिल रहा है। बाबा-दादी और बच्चों का रिश्ता बेहद अनोखा है। जिंदगी के बड़े से बड़े सबक और अनुशासन इनसे बेहतर कोई नहीं सिखा सकता है। उनरे अनुभव किताबों से कहीं बेहतर सीख देते हैं।
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स्टेनल रोड निवासी सरकारी कर्मचारी मनोज पांडेय अपनी नौकरी की वजह से माता-पिता संग नहीं रह पा रहे हैं, वे प्रतापग़ढ़ में रहते हैं। मनोज कहते हैं कि हम घर को काफी मिस करते हैं क्योंकि बच्चों की परवरिश में बाबा-दादी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। दरअसल जो सीख बच्चों को बाबा-दादी दे सकते हैं वह कोई और नहीं। जो प्यार, अपनापन और जिंदगी जीने का सलीका हमें अपने बाबा-दादी से मिला, वह चाहकर भी हमारे बच्चों को नहीं मिल पा रहा है। हम अपने बच्चों को भले ही चाहे जितना समझा लें, मगर दादा-दादी से मिलने वाला ‘क्वालिटी टाइम’ कोई नहीं दे सकता और न ही उनकी कमी कोई पूरा कर सकता है।
परिवार अगर बच्चों का स्कूल है तो दादी-दादा शिक्षक हैं। दादी-बाबा के होने की वजह से बच्चों में भावनात्मक सुरक्षा, व्यावहारिकता, तहजीब सभी कुछ सीखने को मिलता है। आज एकाकी परिवार के बढ़ने की वजह से बच्चों का सामाजीकरण कम होता जा रहा है। बच्चे अपनी ही एकाकी दुनिया में व्यस्त होते चले जा रहे हैं जो समाज के लिए सकारात्मक संकेत नहीं है।
0 डॉ.आशीष सक्सेना, समाजशास्त्री