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लाल पद्मधर के शहादत दिवस पर विशेष : 12 अगस्त को चली गोली के विरोध में डिप्टी कलक्टर ने दिया था इस्तीफा
Fri, 12 Aug 2022 07:37 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 12 Aug 2022 07:37 PM IST
सार
गांधीजी के आह्वान पर बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं आंदोलन में शामिल हुए थे। वे जुलूस बनाकर कचहरी तिरंगा फहराने के लिए निकले थे लेकिन तत्कालीन कलक्टर डिक्सन ने गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें लाल पद्मधर शहीद हो गए थे।
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Prayagraj News : लाल पद्मधर। इलाहाबाद विवि में लगी है प्रतिमा।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
स्वतंत्रता आंदोलन में प्रयागराज की भूमिका का जब भी जिक्र होगा, 1942 में 12 अगस्त को हुए गोलीकांड तथा लाल पद्मधर की शहादत को हमेशा याद किया जाएगा। इस घटना से आहत तत्कालीन डिप्टी कलक्टर अमीर रजा ने इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने लाल पद्मधर की शहादत को सरकारी हत्या करार दिया था।
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गांधीजी के आह्वान पर बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं आंदोलन में शामिल हुए थे। वे जुलूस बनाकर कचहरी तिरंगा फहराने के लिए निकले थे लेकिन तत्कालीन कलक्टर डिक्सन ने गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें लाल पद्मधर शहीद हो गए थे। इनके अलावा कई छात्राएं घायल हो गईं थीं। डिक्सन की इस बर्बर कार्रवाई ने उस समय के अफसरों को भी झकझोर दिया।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष श्याम कृष्ण पांडेय की छात्र आंदोलन पर लिखी गई पुस्तक के अनुसार कचहरी में उस समय ड्यूटी पर तैनात डिप्टी कलक्टर अमीर रजा ने बतौर प्रत्यक्षदर्शी बयान में तत्कालीन कलक्टर को हत्यारा बताया था। इसके बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में शामिल हो गए।
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अगस्त क्रांति
- फोटो : अमर उजाला
अमीर रजा का बयान (श्याम कृष्ण पांडेय की पुस्तक के अनुसार)
‘मैंने निकट से देखा था कि श्री पद्मधर सिंह की मृत्यु कानूनन गोली चलाने से नहीं हुई बल्कि, जानबूझकर उनकी हत्या की गई। निहत्थे और निरीह छात्रों पर गोली चलाना कोई युद्धभूमि का वीरतापूर्ण कार्य नहीं था। उन लोगों ने एक घंटे से अधिक समय तक गोलियों का सामना किया। इस स्थिति में लाठी और गोली की वर्षा की गई, जो सर्वथा अनुचित था। मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि पुलिस ने 10-10 मिनट पर पांच या छह बार गोली चलाई। गोली चलाने पर सभी छात्र अपने स्थान पर लेट गए। केवल एक लड़की खड़ी थे जो तनिक भी नहीं घबराई। एक छात्र भी झंडा लिए खड़ा था। कुछ घुड़सवार पुलिस की आंखों में भी आंसू आ गए थे।’
11 अगस्त सैदाबाद में चार लोगों ने दी थी शहादत
गांधीजी के आह्वान पर 11 अगस्त 1942 को सैदाबाद में किसानों और नौजवानों ने जुलूस निकाला। श्याम कृष्ण पांडेय के अनुसार पुलिस ने जुलूस को रोका और भीड़ को तितर-बितर करने का आदेश दिया लेकिन लोग शांतिपूर्वक जुलूस निकालने को अपना अधिकार बताते हुए आगे बढ़ते गए। स्थिति सामान्य थी, शांति भंग की कोई आशंका नहीं थी। इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने गोली चलाने का आदेश दिया। इसमें तीन नौजनवान दयाल (18 वर्ष), सियाम्ब्र (24 वर्ष), सुबोध (24 वर्ष) शहीद हो गए। इनके अलावा 64 वर्षीय चंद्रमा प्रसाद की भी शहादत हो गई।
‘मैंने निकट से देखा था कि श्री पद्मधर सिंह की मृत्यु कानूनन गोली चलाने से नहीं हुई बल्कि, जानबूझकर उनकी हत्या की गई। निहत्थे और निरीह छात्रों पर गोली चलाना कोई युद्धभूमि का वीरतापूर्ण कार्य नहीं था। उन लोगों ने एक घंटे से अधिक समय तक गोलियों का सामना किया। इस स्थिति में लाठी और गोली की वर्षा की गई, जो सर्वथा अनुचित था। मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि पुलिस ने 10-10 मिनट पर पांच या छह बार गोली चलाई। गोली चलाने पर सभी छात्र अपने स्थान पर लेट गए। केवल एक लड़की खड़ी थे जो तनिक भी नहीं घबराई। एक छात्र भी झंडा लिए खड़ा था। कुछ घुड़सवार पुलिस की आंखों में भी आंसू आ गए थे।’
11 अगस्त सैदाबाद में चार लोगों ने दी थी शहादत
गांधीजी के आह्वान पर 11 अगस्त 1942 को सैदाबाद में किसानों और नौजवानों ने जुलूस निकाला। श्याम कृष्ण पांडेय के अनुसार पुलिस ने जुलूस को रोका और भीड़ को तितर-बितर करने का आदेश दिया लेकिन लोग शांतिपूर्वक जुलूस निकालने को अपना अधिकार बताते हुए आगे बढ़ते गए। स्थिति सामान्य थी, शांति भंग की कोई आशंका नहीं थी। इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने गोली चलाने का आदेश दिया। इसमें तीन नौजनवान दयाल (18 वर्ष), सियाम्ब्र (24 वर्ष), सुबोध (24 वर्ष) शहीद हो गए। इनके अलावा 64 वर्षीय चंद्रमा प्रसाद की भी शहादत हो गई।