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हाईकोर्ट की शक्तियों को कम नहीं कर सकता सशस्त्र बल न्यायाधिकरण

Wed, 09 Mar 2022 01:16 AM IST
विनोद सिंह हाईकोर्ट की शक्तियों को कम नहीं कर सकता सशस्त्र बल न्यायाधिकरण
हाईकोर्ट की शक्तियों को कम नहीं कर सकता सशस्त्र बल न्यायाधिकरण Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 09 Mar 2022 01:16 AM IST
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Armed Forces Tribunal cannot dilute the powers of the High Court
court demo - फोटो : सोशल मीडिया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कि सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम-2007 संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की न्यायिक समीक्षा की शक्ति को न तो प्रतिबंधित कर सकता है और न ही कम सकता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत क्षेत्राधिकार असाधारण और विवेकाधीन प्रकृति का है।
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अनुच्छेद 226 और 227 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां सांविधानिक शक्तियां हैं और इसे कानून द्वारा बाहर नहीं किया जा सकता है।  यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की खंडपीठ ने राम हर्ष की याचिका को निस्तारित करते हुए दी है। मामले में याची भारतीय सेना में एक पूर्व सिपाही (रसोइया) था।
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उसने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर पेंशन और सेवानिवृत्त लाभों पर ब्याज की मांग की थी। सशस्त्र बल न्यायाधिकरण लखनऊ ने उसकी मांग को खारिज कर दिया था। विपक्षी पक्ष का तर्क था कि  याची के पास 2007 अधिनियम की धारा 30 और 31 के तहत अपील दायर करने का एक वैधानिक वैकल्पिक उपाय है। इसलिए मामले का हाईकोर्ट से निस्तारण नहीं किया जा सकता है।
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हालांकि, कोर्ट ने याची की ओर से प्रस्तुत तथ्यों और परिस्थितियाें को देखते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि याची की याचिका विचार योग्य है। याची दिव्यांग है और सुप्रीम कोर्ट तक जाने में सक्षम नहीं है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट सशस्त्र बल न्यायाधिकरण अधिनियम के मद्देनजर न्यायिक समीक्षा करने की शक्ति से वंचित नहीं है।
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