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विवि प्रशासन का ढुलमुल रवैया बना फसाद का कारण
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 11 Feb 2017 01:31 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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परिसर में बवाल के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अफसरों के ढुलमुल रवैया को भी बड़ा कारण माना जा रहा है। विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं के अलावा अध्यापकों और कर्मचारियों से जुड़े अनेक मुद्दे वर्षों से लंबित हैं। विश्वविद्यालय में लचर कार्यशैली का आलम यह है कि हर मुद्दे पर बवाल के बाद अफसर जागते हैं। इसकी वजह से कुलपति के खिलाफ कई मोर्चे खुल गए हैं।
छात्रों के आंदोलन को ही देखें तो एक विवादित प्रोफेसर को प्रवेश की जिम्मेदारी दिया जाना ही इसका प्रमुख कारण है, लेकिन अन्य तीन मांगें अफसरों की सुस्त कार्यशैली की देन हैं। छात्रों की मांग है कि लाइब्रेरी से स्नातक के विद्यार्थियों को भी पुस्तक निर्गत की जाएं। इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने तीन साल पहले ही हामी भर दी थी लेकिन, कर्मचारियों की कमी की वजह से इस व्यवस्था को लागू नहीं किया जा सका। खास यह कि कर्मचारियों की भर्ती के लिए आवेदन लिया जा चुका है। अफसरों का कहना है कि स्क्रीनिंग भी हो गई है, लेकिन भर्ती नहीं हो पाई।
इसके अलावा रजिस्ट्रार और वित्त अधिकारी के पद भी वर्षों से खाली हैं, जिन पर स्थाई नियुक्ति छात्रों की प्रमुख मांग है। गौर करने वाली बात यह है कि बंधक बनाए जाने के बाद रजिस्ट्रार ने इन दोनों मांगों को मान लिया है तथा जल्द से जल्द नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का आश्वासन दिया। इसके अलावा अन्य दोनों मांगों पर भी सकारात्मक आश्वासन दिया।
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उधर, छात्रों के आंदोलन के अलावा कर्मचारियों और संघटक कालेज के अध्यापकों में भी नाराजगी बढ़ रही है। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों की मांगें लंबे समय से लंबित हैं। इसके अलावा कालेज के अध्यापकों को कैस के अंतर्गत प्रमोशन तो मिल गया है, लेकिन उसका लाभ अभी तक नहीं मिला है। इसकी वजह से उनमें भी नाराजगी है। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों ने तो आंदोलन की भी घोषणा भी कर दी है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रतनलाल हांगलू की चुनौती कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। अलग-अलग मोर्चे पर पहले से ही घिरे कुलपति की परेशानी छात्र के आत्मदाह करने के बाद और बढ़ गई है। पहले से नाराज चल रहे अध्यापकों और सियासी नेताओं को उनके खिलाफ एक और आधार मिल गया है तो छात्रों का आंदोलन भी तेज होने की आशंका है। ऐसे में कुलपति के लिए आगे की पारी आसान नहीं दिख रही।
कुलपति को वापस बुलाए जाने के लिए अध्यापकों का एक वर्ग लंबे से समय से सक्रिय है। इनके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भी सक्रिय हैं। पूर्व में हुए आंदोलनों को इसी कवायद का हिस्सा माना जा रहा है। इनकी शिकायतों का प्रभाव भी दिखा तथा राष्ट्रपति ने जांच शुरू करा दी है। हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कई विवादित फैसले वापस लिए जाने तथा भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता के हस्तक्षेप के बाद माना जाने लगा था कि कुलपति की राह कुछ आसान हो गई है। अब वह शेष चार साल बिना गतिरोध के विश्वविद्यालय के हित में काम कर सकेंगे, लेकिन आत्मदाह की घटना तथा छात्रों के आंदोलन ने विरोधी खेमा को एक बार फिर बड़ा हथियार दे दिया है। इन आशंकाओं के बीच केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री महेंद्रनाथ पांडेय के पूरी घटना से राष्ट्रपति को अवगत कराने तथा मंत्रालय के स्तर पर जांच कराए जाने के बयान से यह तय है कि कुलपति की परेशानी बढ़ने जा रही है।
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छात्रों के आंदोलन को ही देखें तो एक विवादित प्रोफेसर को प्रवेश की जिम्मेदारी दिया जाना ही इसका प्रमुख कारण है, लेकिन अन्य तीन मांगें अफसरों की सुस्त कार्यशैली की देन हैं। छात्रों की मांग है कि लाइब्रेरी से स्नातक के विद्यार्थियों को भी पुस्तक निर्गत की जाएं। इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने तीन साल पहले ही हामी भर दी थी लेकिन, कर्मचारियों की कमी की वजह से इस व्यवस्था को लागू नहीं किया जा सका। खास यह कि कर्मचारियों की भर्ती के लिए आवेदन लिया जा चुका है। अफसरों का कहना है कि स्क्रीनिंग भी हो गई है, लेकिन भर्ती नहीं हो पाई।
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इसके अलावा रजिस्ट्रार और वित्त अधिकारी के पद भी वर्षों से खाली हैं, जिन पर स्थाई नियुक्ति छात्रों की प्रमुख मांग है। गौर करने वाली बात यह है कि बंधक बनाए जाने के बाद रजिस्ट्रार ने इन दोनों मांगों को मान लिया है तथा जल्द से जल्द नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का आश्वासन दिया। इसके अलावा अन्य दोनों मांगों पर भी सकारात्मक आश्वासन दिया।
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उधर, छात्रों के आंदोलन के अलावा कर्मचारियों और संघटक कालेज के अध्यापकों में भी नाराजगी बढ़ रही है। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों की मांगें लंबे समय से लंबित हैं। इसके अलावा कालेज के अध्यापकों को कैस के अंतर्गत प्रमोशन तो मिल गया है, लेकिन उसका लाभ अभी तक नहीं मिला है। इसकी वजह से उनमें भी नाराजगी है। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों ने तो आंदोलन की भी घोषणा भी कर दी है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रतनलाल हांगलू की चुनौती कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। अलग-अलग मोर्चे पर पहले से ही घिरे कुलपति की परेशानी छात्र के आत्मदाह करने के बाद और बढ़ गई है। पहले से नाराज चल रहे अध्यापकों और सियासी नेताओं को उनके खिलाफ एक और आधार मिल गया है तो छात्रों का आंदोलन भी तेज होने की आशंका है। ऐसे में कुलपति के लिए आगे की पारी आसान नहीं दिख रही।
कुलपति को वापस बुलाए जाने के लिए अध्यापकों का एक वर्ग लंबे से समय से सक्रिय है। इनके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भी सक्रिय हैं। पूर्व में हुए आंदोलनों को इसी कवायद का हिस्सा माना जा रहा है। इनकी शिकायतों का प्रभाव भी दिखा तथा राष्ट्रपति ने जांच शुरू करा दी है। हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कई विवादित फैसले वापस लिए जाने तथा भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता के हस्तक्षेप के बाद माना जाने लगा था कि कुलपति की राह कुछ आसान हो गई है। अब वह शेष चार साल बिना गतिरोध के विश्वविद्यालय के हित में काम कर सकेंगे, लेकिन आत्मदाह की घटना तथा छात्रों के आंदोलन ने विरोधी खेमा को एक बार फिर बड़ा हथियार दे दिया है। इन आशंकाओं के बीच केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री महेंद्रनाथ पांडेय के पूरी घटना से राष्ट्रपति को अवगत कराने तथा मंत्रालय के स्तर पर जांच कराए जाने के बयान से यह तय है कि कुलपति की परेशानी बढ़ने जा रही है।