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बाइस महीने बाद मिला सूबे को लोकायुक्त
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
Updated Fri, 29 Jan 2016 12:53 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लगभग बाइस महीने और 12 दिन बाद यूपी को जस्टिस संजय मिश्र के रूप में नया लोकायुक्त मिल पाया। माना जाता है कि किसी ‘अपने’ को ही लोकायुक्त बनाने के चक्कर में ही यह मामला विधायिका यानि सरकार, न्यायपालिका यानि मुख्य न्यायाधीश और सूबे के संवैधानिक प्रमुख यानि राज्यपाल के बीच मतभेद का कारण बन गया। यहां तक कि सरकार का राजभवन व न्यायपालिक से टकराव ही नहीं बल्कि तकरार तक का मंजर तक आते दिखा।
विवादों में उलझी लोकायुक्त के चयन की लंबी प्रक्रिया ने जाने-अनजाने कुछ रिकार्ड भी बना डाले। न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा के नाम लगभग डेढ़ महीने कम दस साल इस कुर्सी पर रहने का रिकार्ड भी दर्ज हो गया। इसमें आठ साल तो वह सरकार के फैसले के चलते रहे। बाकी बाइस महीने 12 दिन सरकार द्वारा नए लोकायुक्त का चयन न कर पाने के कारण उन्होंने लोकायुक्त की कुर्सी संभाली।
लेकिन बृहस्पतिवार को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायमूर्ति न्यायाधीश संजय मिश्र को लोकायुक्त बनाने के फैसले के साथ ही इस मामले का पटाक्षेप होना लगभग निश्चित हो गया। इस दौरान जो कुछ हुआ उसे न सिर्फ सूबे के लोग लंबे समय तक याद रखेंगे बल्कि यह भी याद रखेंगे कि सरकारें अपने मन की करने के लिए क्या-क्या कर सकती हैं। यही नहीं, शायद उत्तर प्रदेश के नाम ही न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह के बहाने यह भी रिकार्ड दर्ज हो गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के मामले में पहले के आदेश को वापस लेकर नया आदेश किया हो। वैसे, उत्तर प्रदेश पहला राज्य नहीं है जहां लोकायुक्त की तैनाती को लेकर विवाद व राजभवन के बीच खींचतान हुई है। कर्नाटक, गुजरात सहित अन्य कई प्रदेशों में भी ऐसा हो चुका है। पर, उत्तर प्रदेश जितना लंबा मामला न कहीं खिंचा और न ही उलझा।
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कब और क्या हुआ
-लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का छह वर्ष का कार्यकाल 15 मार्च 2012 को समाप्त हो रहा था। इसी दिन अखिलेश यादव ने सूबे की सत्ता संभाली। उन्होंने पहली ही कैबिनेट की बैठक में मेहरोत्रा का कार्यकाल दो वर्ष के लिए बढ़ाकर आठ साल कर दिया। इसके लिए उप्र लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त (संशोधन) अध्यादेश 2012 जारी किया।
-इस अध्यादेश को लेकर अखिलेश सरकार व तत्कालीन राज्यपाल बीएल जोशी के बीच तनातनी भी हुई। राज्यपाल ने बैक डेट में अध्यादेश पर दस्तखत करने से इन्कार कर दिया। काफी जद्दोजहद के बाद 22 मार्च 12 को राज्यपाल ने अध्यादेश पर दस्तखत कर दिए। इसमें लोकायुक्त का कार्यकाल दो वर्ष बढ़ाने के साथ यह प्रावधान भी किया गया था कि नए लोकायुक्त की नियुक्ति होने तक मौजूदा लोकायुक्त पद पर बने रहेंगे। यह अध्यादेश बैक डेट यानि 15 मार्च 2012 से प्रभावी माना गया।
-28 मई 12 लोकायुक्त का कार्यकाल बढ़ाने संबंधी अध्यादेश सदन में पेश किया गया। विधानमंडल से विधेयक पास होने के बाद इसे राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा गया। राज्यपाल ने जुलाई में इस विधेयक को मंजूरी भी दे दी।
-लोकायुक्त का कार्यकाल बढ़ाने के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अप्रैल 2014 में प्रदेश सरकार को छह महीने के भीतर नए लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया।
-दिसंबर 2014 में राज्य सरकार ने नए लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया शुरू की। 19 दिसंबर को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई चयन समिति की बैठक में किसी नाम पर सहमति नहीं बन सकी। जनवरी में दो और बैठकों में भी लोकायुक्त के नाम पर फैसला नहीं हो सका।
-5 फरवरी 2014 को चयन समिति की बैठक में हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रविंद्र सिंह का नाम तय करके हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से परामर्श मांगा गया। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ ने जस्टिस रविंद्र सिंह के नाम पर सहमति नहीं दी।
-जून 15 में राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य व चीफ जस्टिस डॉ. चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया जल्द पूरी करने के लिए कहा।
-मनमाफिक लोकायुक्त का चयन न हो पाने पर सरकार ने जुलाई में लोकायुक्त व उप लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन करके चयन प्रक्रिया में चीफ जस्टिस की भूमिका समाप्त करने का मन बनाया और गुपचुप ढंग से कैबिनेट बाई सर्कुलेशन इसका प्रस्ताव भी पास करा लिया।
- 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाते हुए 23 जुलाई 15 को राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर नए लोकायुक्त की नियुक्ति करने के आदेश दिए
-अगस्त के पहले सप्ताह में सरकार ने जस्टिस रविंद्र सिंह के नाम पर कैबिनेट से मुहर लगवाकर नियुक्ति के लिए फाइल राजभवन को भेज दी।
- 6 अगस्त 15 को राज्यपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से चीफ जस्टिस व नेता प्रतिपक्ष के साथ किए गए पत्राचारों की जानकारी मांगते हुए लोकायुक्त की नियुक्ति की फाइल लौटा दी। सरकार और राजभवन के बीच फाइल भेजने व लौटाने का सिलसिला तीन बार चला।
-25 अगस्त 15 को राज्यपाल ने जस्टिस रविंद्र सिंह का नाम खारिज करते हुए चौथी बार मुख्यमंत्री को फाइल वापस भेजी और किसी अन्य उपयुक्त नाम का चयन करके भेजने को कहा।
-27 अगस्त 15 को मनमाफिक लोकायुक्त की नियुक्ति का रास्ता साफ करने के लिए सरकार ने विधानमंडल से उप्र लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त संशोधन विधेयक पास कराकर चयन प्रक्रिया से चीफ जस्टिस की भूमिका समाप्त कर दी।
-सितंबर के पहले सप्ताह में राज्यपाल ने विधानमंडल द्वारा पारित लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त संशोधन विधेयक को रोक दिया।
-राजभवन से विधेयक को मंजूरी न मिलने तथा सुप्रीम कोर्ट के दबाव के मद्देनजर सितंबर में सरकार ने अंतत: पुराने कानून के जरिये ही लोकायुक्त की नियुक्ति का फैसला किया।
-17 सितंबर 15 को मुख्यमंत्री आवास पर चयन समिति की बैठक बुलाई गई। न्यायिक कार्यों में व्यस्तता के चलते चीफ जस्टिस नहीं आ सके जिसके चलते बैठक टल गई।
-चीफ जस्टिस की सलाह पर 27 सितंबर 15 को छुट्टी के दिन चयन समिति की बैठक हुई जिसमें चीफ जस्टिस ने विधानमंडल से पास कराए गए विधेयक के लंबित रहते पुराने कानून के जरिये चयन के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कानूनी राय लिए जाने की बात कही। संविधान विशेषज्ञों ने राय दी कि नए कानून को राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिली है, इसलिए पुराने कानून के प्रावधानों के अनुसार चयन प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। फिर भी लोकायुक्त के लिए किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई।
-सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र कुमार जैन की अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए 14 दिसंबर 15 को सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को दो दिन में लोकायुक्त चयन की हिदायत दी। प्रदेश सरकार को आगाह किया कि दो दिन में नियुक्ति हो जाए वरना गंभीर नतीजे होंगे। महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह से कहा कि सरकार ऐसा क्यों कर रही है। महाधिवक्ता ने कहा कि नए लोकायुक्त की नियुक्ति की 99 प्रतिशत प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। न्यायाधीशों ने कहा कि पिछली बार भी ऐसा ही कहा गया था।
-15 दिसंबर लोकायुक्त के चयन पर पांच घंटा बैठक चली। सरकार फिर भी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाई। बैठक में मुख्य न्यायाधीश डॉ. चंद्रचूड़, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और मुख्य सचिव आलोक रंजन शामिल हुए। रात 11 बजे तक बैठक चली। पर, कोई फैसला नहीं हो पाया। 16 दिसंबर को सुबह 9.30 बजे फिर चयन समिति की बैठक बुलाने का फैसला किया गया।
-16 दिसंबर सर्वोच्च नायायालय ने न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह को लोकायुक्त बनाने का फैसला सुनाया। सिंह राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष हैं।
-17 दिसंबर को प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश डॉ. चंद्रचूड़ ने जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम पर आपत्ति उठा दी। राज्यपाल को भेजेे पत्र में चीफ जस्टिस ने कहा कि चयन समिति की बैठक में मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया था कि सरकार जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम पर जोर नहीं देगी। लिखा कि वह वीरेंद्र सिंह के नाम पर सहमत नहीं हैं।
-18 दिसंबर को राज्यपाल रामनाईक ने जस्टिस वीरेंद्र सिंह की नियुक्ति की अधिसूचना जारी की। अधिसूचना के अनुसार, जस्टिस वीरेंद्र सिंह की शपथ की तारीख 20 दिसंबर तय हुई।
-19 दिसंबर 15 को सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस वीरेंद्र सिंह की शपथ पर 4 जनवरी 2016 तक रोक लगा दी। यह रोक सच्चिदानंद गुप्त उर्फ सच्चे की याचिका पर लगाई। याचिका में कहा गया था कि मुख्य न्यायाधीश की आपत्ति के बावजूद वीरेंद्र सिंह का नाम लाया गया।
-4 जनवरी 2016 सर्वोच्च न्यायालय ने शपथ ग्रहण पर 19 जनवरी तक रोक की अवधि बढ़ा दी।
-19 जनवरी को राज्य सरकार यूपी ने सरकार के वकील कपिल सिब्बल की व्यस्तता के तर्क पर सुनवाई तो 20 जनवरी तक के लिए टाल दी। पर, राज्य सरकार को हिदायत दी कि वह तय करे कि सिब्बल यूपी सरकार की पैरवी करेंगे या नहीं।
-20 जनवरी 2016 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यूपी सरकार ने लोकायुक्त मामले पर शीर्ष अदालत को गुमराह किया। अदालत को अगर जस्टिस वीरेंद्र सिंह पर मुख्य न्यायाधीश डॉ. चंद्रचूड़ की आपत्ति की जानकारी होती तो वह सिंह को यूपी का लोकायुक्त नियुक्त करने का आदेश न करती। कोर्ट ने अगले आदेशों तक शपथग्रहण टालने का निर्देश दिया।
-28 जनवरी 2016 सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस संजय मिश्र को यूपी का लोकायुक्त नियुक्त किया।
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विवादों में उलझी लोकायुक्त के चयन की लंबी प्रक्रिया ने जाने-अनजाने कुछ रिकार्ड भी बना डाले। न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा के नाम लगभग डेढ़ महीने कम दस साल इस कुर्सी पर रहने का रिकार्ड भी दर्ज हो गया। इसमें आठ साल तो वह सरकार के फैसले के चलते रहे। बाकी बाइस महीने 12 दिन सरकार द्वारा नए लोकायुक्त का चयन न कर पाने के कारण उन्होंने लोकायुक्त की कुर्सी संभाली।
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लेकिन बृहस्पतिवार को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायमूर्ति न्यायाधीश संजय मिश्र को लोकायुक्त बनाने के फैसले के साथ ही इस मामले का पटाक्षेप होना लगभग निश्चित हो गया। इस दौरान जो कुछ हुआ उसे न सिर्फ सूबे के लोग लंबे समय तक याद रखेंगे बल्कि यह भी याद रखेंगे कि सरकारें अपने मन की करने के लिए क्या-क्या कर सकती हैं। यही नहीं, शायद उत्तर प्रदेश के नाम ही न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह के बहाने यह भी रिकार्ड दर्ज हो गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के मामले में पहले के आदेश को वापस लेकर नया आदेश किया हो। वैसे, उत्तर प्रदेश पहला राज्य नहीं है जहां लोकायुक्त की तैनाती को लेकर विवाद व राजभवन के बीच खींचतान हुई है। कर्नाटक, गुजरात सहित अन्य कई प्रदेशों में भी ऐसा हो चुका है। पर, उत्तर प्रदेश जितना लंबा मामला न कहीं खिंचा और न ही उलझा।
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-लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का छह वर्ष का कार्यकाल 15 मार्च 2012 को समाप्त हो रहा था। इसी दिन अखिलेश यादव ने सूबे की सत्ता संभाली। उन्होंने पहली ही कैबिनेट की बैठक में मेहरोत्रा का कार्यकाल दो वर्ष के लिए बढ़ाकर आठ साल कर दिया। इसके लिए उप्र लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त (संशोधन) अध्यादेश 2012 जारी किया।
-इस अध्यादेश को लेकर अखिलेश सरकार व तत्कालीन राज्यपाल बीएल जोशी के बीच तनातनी भी हुई। राज्यपाल ने बैक डेट में अध्यादेश पर दस्तखत करने से इन्कार कर दिया। काफी जद्दोजहद के बाद 22 मार्च 12 को राज्यपाल ने अध्यादेश पर दस्तखत कर दिए। इसमें लोकायुक्त का कार्यकाल दो वर्ष बढ़ाने के साथ यह प्रावधान भी किया गया था कि नए लोकायुक्त की नियुक्ति होने तक मौजूदा लोकायुक्त पद पर बने रहेंगे। यह अध्यादेश बैक डेट यानि 15 मार्च 2012 से प्रभावी माना गया।
-28 मई 12 लोकायुक्त का कार्यकाल बढ़ाने संबंधी अध्यादेश सदन में पेश किया गया। विधानमंडल से विधेयक पास होने के बाद इसे राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा गया। राज्यपाल ने जुलाई में इस विधेयक को मंजूरी भी दे दी।
-लोकायुक्त का कार्यकाल बढ़ाने के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अप्रैल 2014 में प्रदेश सरकार को छह महीने के भीतर नए लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया।
-दिसंबर 2014 में राज्य सरकार ने नए लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया शुरू की। 19 दिसंबर को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई चयन समिति की बैठक में किसी नाम पर सहमति नहीं बन सकी। जनवरी में दो और बैठकों में भी लोकायुक्त के नाम पर फैसला नहीं हो सका।
-5 फरवरी 2014 को चयन समिति की बैठक में हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रविंद्र सिंह का नाम तय करके हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से परामर्श मांगा गया। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ ने जस्टिस रविंद्र सिंह के नाम पर सहमति नहीं दी।
-जून 15 में राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य व चीफ जस्टिस डॉ. चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया जल्द पूरी करने के लिए कहा।
-मनमाफिक लोकायुक्त का चयन न हो पाने पर सरकार ने जुलाई में लोकायुक्त व उप लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन करके चयन प्रक्रिया में चीफ जस्टिस की भूमिका समाप्त करने का मन बनाया और गुपचुप ढंग से कैबिनेट बाई सर्कुलेशन इसका प्रस्ताव भी पास करा लिया।
- 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाते हुए 23 जुलाई 15 को राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर नए लोकायुक्त की नियुक्ति करने के आदेश दिए
-अगस्त के पहले सप्ताह में सरकार ने जस्टिस रविंद्र सिंह के नाम पर कैबिनेट से मुहर लगवाकर नियुक्ति के लिए फाइल राजभवन को भेज दी।
- 6 अगस्त 15 को राज्यपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से चीफ जस्टिस व नेता प्रतिपक्ष के साथ किए गए पत्राचारों की जानकारी मांगते हुए लोकायुक्त की नियुक्ति की फाइल लौटा दी। सरकार और राजभवन के बीच फाइल भेजने व लौटाने का सिलसिला तीन बार चला।
-25 अगस्त 15 को राज्यपाल ने जस्टिस रविंद्र सिंह का नाम खारिज करते हुए चौथी बार मुख्यमंत्री को फाइल वापस भेजी और किसी अन्य उपयुक्त नाम का चयन करके भेजने को कहा।
-27 अगस्त 15 को मनमाफिक लोकायुक्त की नियुक्ति का रास्ता साफ करने के लिए सरकार ने विधानमंडल से उप्र लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त संशोधन विधेयक पास कराकर चयन प्रक्रिया से चीफ जस्टिस की भूमिका समाप्त कर दी।
-सितंबर के पहले सप्ताह में राज्यपाल ने विधानमंडल द्वारा पारित लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त संशोधन विधेयक को रोक दिया।
-राजभवन से विधेयक को मंजूरी न मिलने तथा सुप्रीम कोर्ट के दबाव के मद्देनजर सितंबर में सरकार ने अंतत: पुराने कानून के जरिये ही लोकायुक्त की नियुक्ति का फैसला किया।
-17 सितंबर 15 को मुख्यमंत्री आवास पर चयन समिति की बैठक बुलाई गई। न्यायिक कार्यों में व्यस्तता के चलते चीफ जस्टिस नहीं आ सके जिसके चलते बैठक टल गई।
-चीफ जस्टिस की सलाह पर 27 सितंबर 15 को छुट्टी के दिन चयन समिति की बैठक हुई जिसमें चीफ जस्टिस ने विधानमंडल से पास कराए गए विधेयक के लंबित रहते पुराने कानून के जरिये चयन के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कानूनी राय लिए जाने की बात कही। संविधान विशेषज्ञों ने राय दी कि नए कानून को राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिली है, इसलिए पुराने कानून के प्रावधानों के अनुसार चयन प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। फिर भी लोकायुक्त के लिए किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई।
-सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र कुमार जैन की अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए 14 दिसंबर 15 को सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को दो दिन में लोकायुक्त चयन की हिदायत दी। प्रदेश सरकार को आगाह किया कि दो दिन में नियुक्ति हो जाए वरना गंभीर नतीजे होंगे। महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह से कहा कि सरकार ऐसा क्यों कर रही है। महाधिवक्ता ने कहा कि नए लोकायुक्त की नियुक्ति की 99 प्रतिशत प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। न्यायाधीशों ने कहा कि पिछली बार भी ऐसा ही कहा गया था।
-15 दिसंबर लोकायुक्त के चयन पर पांच घंटा बैठक चली। सरकार फिर भी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाई। बैठक में मुख्य न्यायाधीश डॉ. चंद्रचूड़, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और मुख्य सचिव आलोक रंजन शामिल हुए। रात 11 बजे तक बैठक चली। पर, कोई फैसला नहीं हो पाया। 16 दिसंबर को सुबह 9.30 बजे फिर चयन समिति की बैठक बुलाने का फैसला किया गया।
-16 दिसंबर सर्वोच्च नायायालय ने न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह को लोकायुक्त बनाने का फैसला सुनाया। सिंह राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष हैं।
-17 दिसंबर को प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश डॉ. चंद्रचूड़ ने जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम पर आपत्ति उठा दी। राज्यपाल को भेजेे पत्र में चीफ जस्टिस ने कहा कि चयन समिति की बैठक में मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया था कि सरकार जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम पर जोर नहीं देगी। लिखा कि वह वीरेंद्र सिंह के नाम पर सहमत नहीं हैं।
-18 दिसंबर को राज्यपाल रामनाईक ने जस्टिस वीरेंद्र सिंह की नियुक्ति की अधिसूचना जारी की। अधिसूचना के अनुसार, जस्टिस वीरेंद्र सिंह की शपथ की तारीख 20 दिसंबर तय हुई।
-19 दिसंबर 15 को सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस वीरेंद्र सिंह की शपथ पर 4 जनवरी 2016 तक रोक लगा दी। यह रोक सच्चिदानंद गुप्त उर्फ सच्चे की याचिका पर लगाई। याचिका में कहा गया था कि मुख्य न्यायाधीश की आपत्ति के बावजूद वीरेंद्र सिंह का नाम लाया गया।
-4 जनवरी 2016 सर्वोच्च न्यायालय ने शपथ ग्रहण पर 19 जनवरी तक रोक की अवधि बढ़ा दी।
-19 जनवरी को राज्य सरकार यूपी ने सरकार के वकील कपिल सिब्बल की व्यस्तता के तर्क पर सुनवाई तो 20 जनवरी तक के लिए टाल दी। पर, राज्य सरकार को हिदायत दी कि वह तय करे कि सिब्बल यूपी सरकार की पैरवी करेंगे या नहीं।
-20 जनवरी 2016 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यूपी सरकार ने लोकायुक्त मामले पर शीर्ष अदालत को गुमराह किया। अदालत को अगर जस्टिस वीरेंद्र सिंह पर मुख्य न्यायाधीश डॉ. चंद्रचूड़ की आपत्ति की जानकारी होती तो वह सिंह को यूपी का लोकायुक्त नियुक्त करने का आदेश न करती। कोर्ट ने अगले आदेशों तक शपथग्रहण टालने का निर्देश दिया।
-28 जनवरी 2016 सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस संजय मिश्र को यूपी का लोकायुक्त नियुक्त किया।