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लगाई डुबकी, ले गए पुण्य
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
Updated Sat, 16 Jan 2016 12:10 AM IST
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मकर संक्रांति के पुण्यकाल में शुक्रवार को लाखों श्रद्धालुओं ने हर-हर गंगे के जयघोष के साथ संगम सहित गंगा और यमुना के विभिन्न घाटों पर डुबकी लगाई। भोर से ही शुरू स्नान का क्रम देर शाम तक जारी रहा। साफ मौसम ने साथ दिया। तकरीबन पौने आठ बजे से लेकर दोपहर तक पुण्यकाल के दौरान श्रद्धालुओं की आमद जरूर ज्यादा रही लेकिन प्रशासन ने कई गुना ज्यादा, तीस लाख श्रद्धालुओं के स्नान का दावा किया है।स्नानार्थियों के लिए मेला क्षेत्र में चौदह स्नान घाट बनाए गए थे। कल्पवासियों और विभिन्न संस्थाओं के शिविरों में बसे श्रद्धालुओं ने अपने शिविरों के पास बने घाटों पर ही स्नान किया। विभिन्न घाटों पर सुरक्षा बलों के साथ ही नागरिक सुरक्षा कोर के स्वयंसेवक श्रद्धालुओं को सहयोग करते रहे।
सुबह हल्के कोहरे और संक्रांति के पुण्यकाल की शुरुआत न होने से कम ही लोग स्नान को निकले पर जैसे ही धूप खिली दूरदराज से आए श्रद्धालुओं और कल्पवासियों के साथ ही संक्रांति की डुबकी लगाने के लिए शहरी भी पहुंचे। जल में ही खड़े होकर श्रद्धालुओं ने अर्घ्य देते हुए सूर्योपासना की, फिर घाट किनारे पूजा-अर्चना पूरी की। गंगा और यमुना पट्टी में बैठे गंगापुत्र घाटियों के यहां यथाशक्ति तिल, गुड, खिचड़ी का दान, दक्षिणा दिया गया और रेती पर आसन जमाए घाटियों से ही तिलक चंदन लगवाया। पुरोहितों के पास गोदान कराने के लिए लोगों की कतार लगी। चंदन टीका लगवाने के बाद लोगों ने गंगा के तट पर ही खिचड़ी खाई और मंगलगीत गाते हुए घरों को लौटे।
शहरियों ने भी श्रद्धालुओं का स्वागत किया। रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन से लेकर संगम तक पूरे रास्ते स्वयंसेवी संस्थाओं ने श्रद्धालुओं के लिए चाय और खिचड़ी के स्टॉल लगाए। लौटते लोगों को प्रसाद बांटा गया। शंकराचार्य, संतों के पंडालों में तो खिचड़ी प्रसाद का वितरण किया गया। पंडालों में दिन भर खिचड़ी का भंडारा चला।
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मकर संक्रांति से कल्पवास शुरू करने वाले श्रद्धालुओं ने शुक्रवार को पुण्यकाल में डुबकी के साथ कल्पवास का संकल्प लिया। मां गंगा, नगर देवता वेणी माधव और पुरखों को याद करके व्रत शुरू किया। शिविर के पास तुलसी का बिरवा रोपा और जौ बोया गया। श्रद्धालु कल्पवास के दौरान तीन बार गंगा स्नान एक बार भोजन करेंगे।
रेती पर बसे तंबुओं के शहर में संतों की वाणी गूंजने लगी है। त्रिवेणी मार्ग स्थित काशीसुमेरूपीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने अध्यात्मिक मंच से भक्ति उपासना एवं ज्ञान की चर्चा की। कहा, संगम की रेती में सांसरिक मायाजाल से दूर रहकर चिंतन मनन करने से तमाम तरह के विकारों का नाश होता है। समाज की उन्नति के लिए यह साधना जरूरी है। गंगा के तट पर आने वाले बच्चे जहां संस्कारित होते हैं वहीं बुजुर्गों को युवाओं से तालमेल बिठाने की सीख भी हासिल होती है। खाक चौक के महामंत्री सतुआबाबा संतोष दास ने कहा कि त्रिवेणी तट पर आने वाले आपसी भाईचारा एवं सद्भाव की मिसाल बने। दंडीबाड़ा, आचार्य बाड़ा, संगम मार्ग स्थित संतों के शिविरों में प्रवचन शुरू हो गया।
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सुबह हल्के कोहरे और संक्रांति के पुण्यकाल की शुरुआत न होने से कम ही लोग स्नान को निकले पर जैसे ही धूप खिली दूरदराज से आए श्रद्धालुओं और कल्पवासियों के साथ ही संक्रांति की डुबकी लगाने के लिए शहरी भी पहुंचे। जल में ही खड़े होकर श्रद्धालुओं ने अर्घ्य देते हुए सूर्योपासना की, फिर घाट किनारे पूजा-अर्चना पूरी की। गंगा और यमुना पट्टी में बैठे गंगापुत्र घाटियों के यहां यथाशक्ति तिल, गुड, खिचड़ी का दान, दक्षिणा दिया गया और रेती पर आसन जमाए घाटियों से ही तिलक चंदन लगवाया। पुरोहितों के पास गोदान कराने के लिए लोगों की कतार लगी। चंदन टीका लगवाने के बाद लोगों ने गंगा के तट पर ही खिचड़ी खाई और मंगलगीत गाते हुए घरों को लौटे।
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शहरियों ने भी श्रद्धालुओं का स्वागत किया। रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन से लेकर संगम तक पूरे रास्ते स्वयंसेवी संस्थाओं ने श्रद्धालुओं के लिए चाय और खिचड़ी के स्टॉल लगाए। लौटते लोगों को प्रसाद बांटा गया। शंकराचार्य, संतों के पंडालों में तो खिचड़ी प्रसाद का वितरण किया गया। पंडालों में दिन भर खिचड़ी का भंडारा चला।
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मकर संक्रांति से कल्पवास शुरू करने वाले श्रद्धालुओं ने शुक्रवार को पुण्यकाल में डुबकी के साथ कल्पवास का संकल्प लिया। मां गंगा, नगर देवता वेणी माधव और पुरखों को याद करके व्रत शुरू किया। शिविर के पास तुलसी का बिरवा रोपा और जौ बोया गया। श्रद्धालु कल्पवास के दौरान तीन बार गंगा स्नान एक बार भोजन करेंगे।
रेती पर बसे तंबुओं के शहर में संतों की वाणी गूंजने लगी है। त्रिवेणी मार्ग स्थित काशीसुमेरूपीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने अध्यात्मिक मंच से भक्ति उपासना एवं ज्ञान की चर्चा की। कहा, संगम की रेती में सांसरिक मायाजाल से दूर रहकर चिंतन मनन करने से तमाम तरह के विकारों का नाश होता है। समाज की उन्नति के लिए यह साधना जरूरी है। गंगा के तट पर आने वाले बच्चे जहां संस्कारित होते हैं वहीं बुजुर्गों को युवाओं से तालमेल बिठाने की सीख भी हासिल होती है। खाक चौक के महामंत्री सतुआबाबा संतोष दास ने कहा कि त्रिवेणी तट पर आने वाले आपसी भाईचारा एवं सद्भाव की मिसाल बने। दंडीबाड़ा, आचार्य बाड़ा, संगम मार्ग स्थित संतों के शिविरों में प्रवचन शुरू हो गया।