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पॉलीथिन पर हुई चोट, रद्दी से बनने लगे नोट
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 04 Jan 2016 11:46 PM IST
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पॉलीथिन पर प्रतिबंध के सरकारी फरमान और प्रशासन की ओर से कार्रवाई के बाद कागज की थैली को नया जीवन मिल गया है। सरकार के फैसले के बाद कागज से थैली बनाने के काम में लगे लोगों के चेहरे खिल गए हैं क्योंकि फिर दुकानों में इसकी मांग तेजी से बढ़ी है। बहादुरगंज, गढ़ी सराय, नखास कोहना आदि में काफी परिवार कागज से थैली बनाते हैं। उनके पास पिछले कुछ दिनों में काम इतना ज्यादा बढ़ गया है कि रात-दिन थैली बनाई जा रही है, जबकि अब से पहले कागज की थैली को लेने में दुकानदार ना नुकुर करते थे।
पॉलीथिन का इस्तेमाल जिस तेजी से बढ़ा, उससे बाजार से कागज की थैली गायब हो गईं जबकि करीब दस वर्ष पहले तक कागज की थैलियों की जबरदस्त मांग थी। शहर के विभिन्न इलाकों में काफी लोग कागज की थैली बनाते हैं। इस काम में उनका पूरा परिवार जुटा हुआ है लेकिन पॉलीथिन की मांग बढ़ने से कागज की थैली बनाने वालों के सामने आर्थिक संकट ऐसा खड़ा हुआ कि परिवार का खर्च चलना भी मुश्किल हो गया। कारोबार बंद होने पर कई ने चाय-पान की छोटी सी दुकान खोल ली तो कई रिक्शा-ट्राली चलाने लगे। अब सरकार की ओर से पॉलीथिन पर सख्ती के फरमान से उन्हें फिर आर्डर मिलने लगे हैं। बीते कई दिनों में ही पूरा परिवार फिर से रात-दिन कागज की थैली बनाने के काम में जुट गया है।
थैली बनाने वाले बहादुरगंज के तारिक का कहना है कि पॉलीथिन की वजह से धंधा बंद हो गया था लेकिन अब सरकार के फैसले के बाद कोरबार फिर चल निकला है। नखासकोना के संतोष केसरवानी का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद बीच-बीच में जब भी पॉलीथिन के खिलाफ कार्रवाई हुई, कागज की थैलियों की मांग बढ़ी। चक जीरो रोड की शहनाज, सेवई मंडी की मंजू केसरवानी, बहादुरगंज की महरोज, सीमा आदि का कहना है कागज की थैली का इस्तेमाल कम होने से परिवार का गुजरा मुश्किल हो गया था, ऊपर वाले ने सुन ली सो फिर से काम ने रफ्तार पकड़ ली है।
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कागज से थैलियां बनाने का काम तेज होने के बाद पुराने अखबार और कापी-किताब की रद्दी की कीमत बढ़ गई है। कबाड़ वाले कागज की रद्दी पर ज्यादा जोर देने लगे हैं तो घरों में भी पुराने अखबार, कापी-किताब को इधर-उधर न फेंककर करीने से रखा जाने लगा है ताकि उसकी अच्छी कीमत मिल सके।
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पॉलीथिन का इस्तेमाल जिस तेजी से बढ़ा, उससे बाजार से कागज की थैली गायब हो गईं जबकि करीब दस वर्ष पहले तक कागज की थैलियों की जबरदस्त मांग थी। शहर के विभिन्न इलाकों में काफी लोग कागज की थैली बनाते हैं। इस काम में उनका पूरा परिवार जुटा हुआ है लेकिन पॉलीथिन की मांग बढ़ने से कागज की थैली बनाने वालों के सामने आर्थिक संकट ऐसा खड़ा हुआ कि परिवार का खर्च चलना भी मुश्किल हो गया। कारोबार बंद होने पर कई ने चाय-पान की छोटी सी दुकान खोल ली तो कई रिक्शा-ट्राली चलाने लगे। अब सरकार की ओर से पॉलीथिन पर सख्ती के फरमान से उन्हें फिर आर्डर मिलने लगे हैं। बीते कई दिनों में ही पूरा परिवार फिर से रात-दिन कागज की थैली बनाने के काम में जुट गया है।
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थैली बनाने वाले बहादुरगंज के तारिक का कहना है कि पॉलीथिन की वजह से धंधा बंद हो गया था लेकिन अब सरकार के फैसले के बाद कोरबार फिर चल निकला है। नखासकोना के संतोष केसरवानी का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद बीच-बीच में जब भी पॉलीथिन के खिलाफ कार्रवाई हुई, कागज की थैलियों की मांग बढ़ी। चक जीरो रोड की शहनाज, सेवई मंडी की मंजू केसरवानी, बहादुरगंज की महरोज, सीमा आदि का कहना है कागज की थैली का इस्तेमाल कम होने से परिवार का गुजरा मुश्किल हो गया था, ऊपर वाले ने सुन ली सो फिर से काम ने रफ्तार पकड़ ली है।
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कागज से थैलियां बनाने का काम तेज होने के बाद पुराने अखबार और कापी-किताब की रद्दी की कीमत बढ़ गई है। कबाड़ वाले कागज की रद्दी पर ज्यादा जोर देने लगे हैं तो घरों में भी पुराने अखबार, कापी-किताब को इधर-उधर न फेंककर करीने से रखा जाने लगा है ताकि उसकी अच्छी कीमत मिल सके।