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लापरवाही से मरीज की मौत, डॉक्टर पर दो लाख जुर्माना
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Wed, 30 Dec 2015 12:09 AM IST
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ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर की लापरवाही से मरीज की मौत होना सेवा में कमी है। उपभोक्ता फोरम ने ऐसे एक मामले में डॉक्टर और अस्पताल को दो लाख रुपये बतौर हर्जाना और पांच हजार रुपये मुकदमा खर्च देने का आदेश दिया है। पीड़ित की अर्जी पर जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष तारकेश्वर नाथ पांडे और सदस्य अमिता गिरि ने सुनवाई की। फोरम ने कहा है कि डॉक्टर ने बिना कोई जांच किए इलाज शुरू कर दिया। यह लापरवाही है।
मामले के अनुसार वादी कृष्णचंद्र पांडे ने फोरम में एक शिकायत परिवाद हेज मिशन अस्पताल, डॉ. ए दयाल ,डॉ. संजय तिवारी और डॉ. मित्रा के खिलाफ दाखिल किया था। वादी अपने पुत्र देवेश कुमार पांडेय को पेट में दर्द होने पर 30 जून 1997 को अस्पताल में दिखाने ले गया था । अस्पताल के डॉक्टरों ने यह कहते हुए देवेश को भर्ती कर लिए की मरीज के पेट में अपेंडिक्स है, ऑपरेशन नहीं किया तो फट सकता है। बिना किसी जांच के एक जुलाई 1997 को देवेश ऑपरेशन कर दिया और एक गांठ निकाल कर जांच कराने की बात कही और बाद में बताया कि जांच में कुछ नहीं मिला। वादी का 25 हजार रुपये इलाज में खर्च हुआ।
मरीज को कोई आराम नहीं मिला। वादी ने अपने एक रिश्तेदार डॉ. संजय तिवारी को दिखाया तो पता चला कि मरीज के आंतों में टीबी है। इस तरह मरीज के इलाज में डॉक्टरों की लापरवाही के कारण 20 सितंबर 1998 को एसपीजीआई में जांच के दौरान देवेश की मृत्यु हो गई। जांच में पता चला कि उसकी आंत में जो गांठें थीं, वह बढ़ कर ट्यूमर बन चुकी थीं। फोरम ने इस मामले में डॉक्टर मित्रा और हेज अस्पताल को ही दोषी पाया है। फोरम ने दो माह के अंदर दो लाख पांच हजार रुपये भुगतान करने का आदेश अस्पताल और डॉक्टर को दिया है।
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मामले के अनुसार वादी कृष्णचंद्र पांडे ने फोरम में एक शिकायत परिवाद हेज मिशन अस्पताल, डॉ. ए दयाल ,डॉ. संजय तिवारी और डॉ. मित्रा के खिलाफ दाखिल किया था। वादी अपने पुत्र देवेश कुमार पांडेय को पेट में दर्द होने पर 30 जून 1997 को अस्पताल में दिखाने ले गया था । अस्पताल के डॉक्टरों ने यह कहते हुए देवेश को भर्ती कर लिए की मरीज के पेट में अपेंडिक्स है, ऑपरेशन नहीं किया तो फट सकता है। बिना किसी जांच के एक जुलाई 1997 को देवेश ऑपरेशन कर दिया और एक गांठ निकाल कर जांच कराने की बात कही और बाद में बताया कि जांच में कुछ नहीं मिला। वादी का 25 हजार रुपये इलाज में खर्च हुआ।
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मरीज को कोई आराम नहीं मिला। वादी ने अपने एक रिश्तेदार डॉ. संजय तिवारी को दिखाया तो पता चला कि मरीज के आंतों में टीबी है। इस तरह मरीज के इलाज में डॉक्टरों की लापरवाही के कारण 20 सितंबर 1998 को एसपीजीआई में जांच के दौरान देवेश की मृत्यु हो गई। जांच में पता चला कि उसकी आंत में जो गांठें थीं, वह बढ़ कर ट्यूमर बन चुकी थीं। फोरम ने इस मामले में डॉक्टर मित्रा और हेज अस्पताल को ही दोषी पाया है। फोरम ने दो माह के अंदर दो लाख पांच हजार रुपये भुगतान करने का आदेश अस्पताल और डॉक्टर को दिया है।
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