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जांच को कमेटी गठित, दोषी होने पर होंगे बाहर
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 02 Aug 2015 11:44 PM IST
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नोएडा के कारोबारी सचिन दत्त्ता उर्फ सच्चिदानंद गिरि के पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के महामंडलेश्वर बनने के साथ ही अध्यात्म और अखाड़ों की दुनिया में भूचाल आ गया है। डिस्कोथेक, बियर बार और रियल स्टेट कारोबार से उनके जुड़ाव केआरोपों के बाद अखाड़े की ओर से तेजी दिखाते हुए रविवार को चार महंतों की जांच समिति गठित कर दी गई। यह सच्चिदानंद गिरि के पारिवारिक और कारोबारी रिश्तों की जानकारी परिषद अध्यक्ष को देगी जिसके आधार पर महामंडलेश्वर बने रहने का निर्णय लिया जाएगा।
वहीं उन्हें महामंडलेश्वर बनाने वाले गुरु और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने सफाई दी कि उन्हें सच्चिदानंद गिरि के कारोबार केबारे में जानकारी नहीं थी लेकिन मिली जानकारी के अनुसार फिलहाल वह किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधियों से अलग हैं। जांच के लिए कमेटी बनाई गई है जो उनके परिवार या कारोबार से जुड़ाव जैसी रिश्तों की जांच करेगी, वह दोषी पाए जाएंगे तो उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी और अखाड़ा, दोनों से अलग कर दिया जाएगा। पहले वह अग्नि अखाड़े में ब्रह्मचारी थे, अब शिष्य और संन्यासी बने, जिसके बाद ही उन्हें महामंडलेश्वर बनाया गया।
सच्चिदानंद गिरि के महामंडलेश्वर बनाए जाने की प्रक्रिया से लेकर परंपरा तक पर विभिन्न अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने भी सवाल उठाए हैं। शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने अपने को पूरे प्रकरण से अलग करते हुए किसी भी तरह की जानकारी न होने की बात कही। हालांकि उन्होंने इतना जरूर जोड़ा कि महामंडलेश्वर बनाने के समय अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर, सभापति सहित सभी सचिव मौजूद रहते हैं, फिर अन्य अखाड़ों की ओर से भी चादर ओढ़ाई जाती है। महिला संत और परी अखाड़े की प्रमुख त्रिकाल भवंता का कहना है कि उनकी तत्काल जांच कराई जानी चाहिए। किसी भी ऐसे व्यक्ति को धर्मक्षेत्र को अपमानित, कलंकित करने को कोई अधिकार नहीं है।
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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरिगिरि ने बिना किसी का नाम लेते हुए परंपरा की याद दिलाई। बोले, संन्यास की दीक्षा के दो घंटे बाद ही महामंडलेश्वर बनना चौंकाता है। संन्यास की दीक्षा सहित विजयाहवन आदि की प्रक्रिया तो रात में होती है, दिन में नहीं। मुझे उम्मीद है कि परंपराओं का पालन किया गया होगा। वहीं अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष महंत ज्ञानदास ने दो टूक कहा कि संन्यासी अखाड़ों की ओर से महामंडलेश्वर बनाने की प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही है। कभी धन तो कभी संस्कार, आचरण को लेकर बातें उठती रही हैं।
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वहीं उन्हें महामंडलेश्वर बनाने वाले गुरु और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने सफाई दी कि उन्हें सच्चिदानंद गिरि के कारोबार केबारे में जानकारी नहीं थी लेकिन मिली जानकारी के अनुसार फिलहाल वह किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधियों से अलग हैं। जांच के लिए कमेटी बनाई गई है जो उनके परिवार या कारोबार से जुड़ाव जैसी रिश्तों की जांच करेगी, वह दोषी पाए जाएंगे तो उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी और अखाड़ा, दोनों से अलग कर दिया जाएगा। पहले वह अग्नि अखाड़े में ब्रह्मचारी थे, अब शिष्य और संन्यासी बने, जिसके बाद ही उन्हें महामंडलेश्वर बनाया गया।
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सच्चिदानंद गिरि के महामंडलेश्वर बनाए जाने की प्रक्रिया से लेकर परंपरा तक पर विभिन्न अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने भी सवाल उठाए हैं। शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने अपने को पूरे प्रकरण से अलग करते हुए किसी भी तरह की जानकारी न होने की बात कही। हालांकि उन्होंने इतना जरूर जोड़ा कि महामंडलेश्वर बनाने के समय अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर, सभापति सहित सभी सचिव मौजूद रहते हैं, फिर अन्य अखाड़ों की ओर से भी चादर ओढ़ाई जाती है। महिला संत और परी अखाड़े की प्रमुख त्रिकाल भवंता का कहना है कि उनकी तत्काल जांच कराई जानी चाहिए। किसी भी ऐसे व्यक्ति को धर्मक्षेत्र को अपमानित, कलंकित करने को कोई अधिकार नहीं है।
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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरिगिरि ने बिना किसी का नाम लेते हुए परंपरा की याद दिलाई। बोले, संन्यास की दीक्षा के दो घंटे बाद ही महामंडलेश्वर बनना चौंकाता है। संन्यास की दीक्षा सहित विजयाहवन आदि की प्रक्रिया तो रात में होती है, दिन में नहीं। मुझे उम्मीद है कि परंपराओं का पालन किया गया होगा। वहीं अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष महंत ज्ञानदास ने दो टूक कहा कि संन्यासी अखाड़ों की ओर से महामंडलेश्वर बनाने की प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही है। कभी धन तो कभी संस्कार, आचरण को लेकर बातें उठती रही हैं।