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अनिल और आंदोलन का योग, आयोग
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 25 Dec 2015 12:02 AM IST
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प्रतियोगियों के लिहाज से सन 2015 ब्लैक इयर के रूप में जाना जाएगा। भर्ती संस्थाओं के अध्यक्ष और सदस्यों के पदों पर राजनीतिक नियुक्ति ने सूबे के लाखों युवाओं का भविष्य अंधकार में धकेल दिया है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के इतिहास में पहली बार पीसीएस का पेपर आउट हुआ। दोबारा परीक्षा हुई लेकिन इस भर्ती का भविष्य अब भी हाईकोर्ट के आदेश पर टिका है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रतियोगियों का दावा है कि अध्यक्ष रहे अनिल यादव के कार्यकाल की भर्तियों की जांच हुई तो मध्य प्रदेश के व्यापम से भी बड़ा घोटाला साबित हो सकता है।
आयोग में अध्यक्ष पद पर अनिल यादव की नियुक्ति भी सियासी साबित हुई। चयन की कोई प्रक्रिया ही नहीं अपनाई गई जबकि, उनके खिलाफ कई गंभीर आरोपाें में मुकदमे भी दर्ज हैं। नतीजा यह रहा कि प्रतियोगियों का पूरा वर्ष अनिल यादव को हटाने तथा भर्तियाें में गड़बड़ी के खिलाफ कानूनी लड़ाई और आंदोलनों में गुजर गया और पूरा शहर परेशान रहा। हालांकि अध्यक्ष पद पर अनिल यादव की नियुक्ति रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले से प्रतियोगियों को राहत जरूर मिली लेकिन निष्पक्ष और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया का उन्हें अब भी इंतजार है।
लोक सेवा आयोग की भर्तियों में धांधली के विरोध में वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह और आईपीएस अमिताभ ठाकुर खुलकर सामने आए। इतना ही नहीं अनिल यादव के कार्यकाल में हुई भर्तियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर प्रतियोगियों के अलावा पूर्व डीजीपी जेएफ.रिबेरो, प्रकाश सिंह, आईएएस एसएटी रिजवी, पूर्व प्रमुख सचिव एसएन शुक्ला, कुलपति एचसी पांडेय, समाजसेवी अरुणेश शुक्ला सहित कई वरिष्ठ आईएएस तथा आईपीएस अफसरों ने भी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की जिस पर कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है। ऐसे में प्रतियोगियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर शुरू लड़ाई को नया आधार मिला है।
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लोक सेवा आयोग ही नहीं उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग तथा माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में भी अध्यक्ष और सदस्य के पद पर राजनीतिक नफा-नुकसान को देखकर नियुक्ति की गई। हालांकि प्रतियोगियों की लड़ाई ने असर दिखाया और हाईकोर्ट के आदेश पर इन आयोगों की सफाई शुरू हो गई है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब होईकोर्ट के आदेश पर तीनों भर्ती संस्थाओं के अध्यक्ष की नियुक्तियां रद्द हो चुकी है। वहीं उच्चतर में तीन सदस्य भी हटा दिए गए हैं तो माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में तीन मेंबर के काम करने पर रोक लगा दी गई है। उच्चतर शिक्षा आयोग में अब सिर्फ एक तथा माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में दो सदस्य बचे हैं। इससे दोनों संस्थाओं में भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से ठप है।
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आयोग में अध्यक्ष पद पर अनिल यादव की नियुक्ति भी सियासी साबित हुई। चयन की कोई प्रक्रिया ही नहीं अपनाई गई जबकि, उनके खिलाफ कई गंभीर आरोपाें में मुकदमे भी दर्ज हैं। नतीजा यह रहा कि प्रतियोगियों का पूरा वर्ष अनिल यादव को हटाने तथा भर्तियाें में गड़बड़ी के खिलाफ कानूनी लड़ाई और आंदोलनों में गुजर गया और पूरा शहर परेशान रहा। हालांकि अध्यक्ष पद पर अनिल यादव की नियुक्ति रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले से प्रतियोगियों को राहत जरूर मिली लेकिन निष्पक्ष और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया का उन्हें अब भी इंतजार है।
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लोक सेवा आयोग की भर्तियों में धांधली के विरोध में वरिष्ठ आईएएस सूर्य प्रताप सिंह और आईपीएस अमिताभ ठाकुर खुलकर सामने आए। इतना ही नहीं अनिल यादव के कार्यकाल में हुई भर्तियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर प्रतियोगियों के अलावा पूर्व डीजीपी जेएफ.रिबेरो, प्रकाश सिंह, आईएएस एसएटी रिजवी, पूर्व प्रमुख सचिव एसएन शुक्ला, कुलपति एचसी पांडेय, समाजसेवी अरुणेश शुक्ला सहित कई वरिष्ठ आईएएस तथा आईपीएस अफसरों ने भी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की जिस पर कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है। ऐसे में प्रतियोगियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर शुरू लड़ाई को नया आधार मिला है।
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लोक सेवा आयोग ही नहीं उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग तथा माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में भी अध्यक्ष और सदस्य के पद पर राजनीतिक नफा-नुकसान को देखकर नियुक्ति की गई। हालांकि प्रतियोगियों की लड़ाई ने असर दिखाया और हाईकोर्ट के आदेश पर इन आयोगों की सफाई शुरू हो गई है। ऐसा पहली बार हो रहा है जब होईकोर्ट के आदेश पर तीनों भर्ती संस्थाओं के अध्यक्ष की नियुक्तियां रद्द हो चुकी है। वहीं उच्चतर में तीन सदस्य भी हटा दिए गए हैं तो माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में तीन मेंबर के काम करने पर रोक लगा दी गई है। उच्चतर शिक्षा आयोग में अब सिर्फ एक तथा माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड में दो सदस्य बचे हैं। इससे दोनों संस्थाओं में भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से ठप है।