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शहर में पॉलीथिन रोकने में नाकाम, पूरे सूबे में कैसे करें काम
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 21 Nov 2015 12:09 AM IST
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इलाहाबाद (ब्यूरो)। हाईकोर्ट ने संगम नगरी के साथ पूरे उत्तर प्रदेश में पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब इसके खिलाफ सख्ती से कदम उठाने की जिम्मेदारी शासन और स्थानीय प्रशासन की है, लेकिन प्रतिबंधित पॉलीथिन पर इतनी आसानी से रोक लग सकेगी, यह बड़ा सवाल है।
ऐसा इसलिए कि हाईकोर्ट लंबे समय से आदेश दे रहा है कि 40 माइक्रॉन से कम की पॉलीथिन का उत्पादन और प्रयोग पूरी तरह बंद हो, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। इलाहाबाद में पॉलीथिन के इस्तेमाल पर कार्रवाई की जिम्मेदारी नगर निगम की है, जबकि पॉलीथिन फैक्ट्रियों को बंद कराने का काम प्रशासन के साथ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का है, लेकिन कोई भी विभाग अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं निभा रहा है। नतीजा है कि पॉलीथिन पर प्रतिबंध का कहीं भी असर नहीं है। हाईकोर्ट के लगातार आदेश के बावजूद नगर निगम कभी भी पॉलीथिन के खिलाफ लगातार और प्रभावी अभियान नहीं चला सका है।
अकेले इलाहाबाद में ही प्रतिबंधित पॉलीथिन का इस्तेमाल धड़ल्ले से जारी है। पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक बड़े-बड़े स्टोर, शोरूम हो या सब्जी, फल, चाय, पान, मांस जैसी बड़ी-छोटी दुकानें, 40 माइक्रान से कम की पॉलीथिन तकरीबन हर जगह मिल जाएगी। इलाहाबाद में पॉलीथिन और प्लास्टिक उत्पाद बनाने वाली बड़ी-छोटी दो दर्जन से अधिक फर्में चल रही हैं। नैनी, महेवा, डांडी, औद्योगिक क्षेत्र, दारागंज, मुट्ठीगंज, बांसमंडी और तेलियरगंज में चल रही इन फर्मों में प्रतिबंधित पॉलीथिन धड़ल्ले से बनाई जा रही है। 40 माइक्रान तो दूर इन फैक्ट्रियों में 20 माइक्रॉन से भी नीचे की पॉलीथिन बनाई जा रही है।
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लोकल कंपनियों की ब्रेड, मसाले, बिस्कुट, दालमोट आदि की पैकिंग भी प्रतिबंधित पॉलीथिन में होती है जो मानक के मुताबिक नहीं हैं। इसके अलावा शहर में चोरी से कानपुर, वाराणसी से भी बड़े पैमाने पर पॉलीथिन और प्लास्टिक के अन्य उत्पाद आ रहे हैं। इस्तेमाल के बाद पॉलीथिन फेंक दिया जाता है। घरों से लेकर कूड़ा अड्डों तक पॉलीथिन बड़ी मात्रा में बिखरी नजर आएगी। कूड़ा अड्डों पर अक्सर इसे जला भी दिया जाता है। हाईकोर्ट के लगातार आदेश के बावजूद नगर निगम की ओर से अब तक इसके खिलाफ एक बार भी प्रभावी अभियान नहीं चला, ऐसे में प्रदेश को पूरी तरह प्रतिबंधित पॉलीथिन से मुक्त करना शासन के लिए भी चुनौती है।
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ऐसा इसलिए कि हाईकोर्ट लंबे समय से आदेश दे रहा है कि 40 माइक्रॉन से कम की पॉलीथिन का उत्पादन और प्रयोग पूरी तरह बंद हो, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। इलाहाबाद में पॉलीथिन के इस्तेमाल पर कार्रवाई की जिम्मेदारी नगर निगम की है, जबकि पॉलीथिन फैक्ट्रियों को बंद कराने का काम प्रशासन के साथ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का है, लेकिन कोई भी विभाग अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं निभा रहा है। नतीजा है कि पॉलीथिन पर प्रतिबंध का कहीं भी असर नहीं है। हाईकोर्ट के लगातार आदेश के बावजूद नगर निगम कभी भी पॉलीथिन के खिलाफ लगातार और प्रभावी अभियान नहीं चला सका है।
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अकेले इलाहाबाद में ही प्रतिबंधित पॉलीथिन का इस्तेमाल धड़ल्ले से जारी है। पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक बड़े-बड़े स्टोर, शोरूम हो या सब्जी, फल, चाय, पान, मांस जैसी बड़ी-छोटी दुकानें, 40 माइक्रान से कम की पॉलीथिन तकरीबन हर जगह मिल जाएगी। इलाहाबाद में पॉलीथिन और प्लास्टिक उत्पाद बनाने वाली बड़ी-छोटी दो दर्जन से अधिक फर्में चल रही हैं। नैनी, महेवा, डांडी, औद्योगिक क्षेत्र, दारागंज, मुट्ठीगंज, बांसमंडी और तेलियरगंज में चल रही इन फर्मों में प्रतिबंधित पॉलीथिन धड़ल्ले से बनाई जा रही है। 40 माइक्रान तो दूर इन फैक्ट्रियों में 20 माइक्रॉन से भी नीचे की पॉलीथिन बनाई जा रही है।
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लोकल कंपनियों की ब्रेड, मसाले, बिस्कुट, दालमोट आदि की पैकिंग भी प्रतिबंधित पॉलीथिन में होती है जो मानक के मुताबिक नहीं हैं। इसके अलावा शहर में चोरी से कानपुर, वाराणसी से भी बड़े पैमाने पर पॉलीथिन और प्लास्टिक के अन्य उत्पाद आ रहे हैं। इस्तेमाल के बाद पॉलीथिन फेंक दिया जाता है। घरों से लेकर कूड़ा अड्डों तक पॉलीथिन बड़ी मात्रा में बिखरी नजर आएगी। कूड़ा अड्डों पर अक्सर इसे जला भी दिया जाता है। हाईकोर्ट के लगातार आदेश के बावजूद नगर निगम की ओर से अब तक इसके खिलाफ एक बार भी प्रभावी अभियान नहीं चला, ऐसे में प्रदेश को पूरी तरह प्रतिबंधित पॉलीथिन से मुक्त करना शासन के लिए भी चुनौती है।