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बिन बजट करोड़ों का कैश, महोत्सव की आड़ में ऐश

Thu, 25 Feb 2016 12:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Thu, 25 Feb 2016 12:46 AM IST
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छह साल पहले त्रिवेणी महोत्सव का आयोजन सिर्फ इसलिए बंद कर दिया गया था, क्योंकि इस पूरे आयोजन का बजट ही विवादित था। दरअसल, इसके लिए किसी सरकारी बजट का प्रावधान ही नहीं है। सहयोग के नाम पर बड़े बिल्डरों, व्यापारियों, निजी अस्पतालों से करोड़ों रुपये वसूले जाते हैं। मोटी फीस देकर बड़े-बड़े कलाकारों को बुलाया जाता है। किसे कितना दिया और कितना बचा, इसका कोई हिसाब-किताब भी नहीं। ऐसे में घपले की आशंका हमेशा बनी रहती है। साथ ही हुड़दंग होता है, सो अलग। बुधवार को त्रिवेणी महोत्सव के पहले दिन श्रेया घोषाल के कार्यक्रम के दौरान मची अफरातफरी और हुड़दंग इसका जीता-जागता उदाहरण है।
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त्रिवेणी महोत्सव की शुरुआत स्थानीय प्रतिभाओं को मंच और मौका दिए जाने के उद्देश्य से की गई थी। शुरू में स्थानीय प्रतिभाओं को इस मंच के जरिये आगे बढ़ने के खूब मौके मिले लेकिन बाद में प्रशासनिक अफसरों ने स्थानीय प्रतिभाओं को दरकिनार कर इसे ग्लैमर का रूप दे दिया और यहीं से शुरू हुई बजट की बंदरबांट। कार्यक्रम को ग्लैमरस और आकर्षक बनाने के लिए इसमें बॉलीवुड के कलाकारों, कई चर्चित पार्श्व गायकों, सूफी गायकों और डांस ग्रुप को बुलाने का सिलसिला शुरू हो गया।
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लाखों, करोड़ों रुपये लेकर मंच पर प्रदर्शन करने वाले इन बड़े कलाकारों की मांगें भी बड़ी होती हैं, जिन्हें पूरा कर पाना आसान नहीं। इसके लिए कोई सरकारी बजट भी नहीं था, सो अफसरों ने नया रास्ता खोज लिया। शहर के बडे़ बिल्डरों, निजी अस्पतालों, व्यापारियों और तमाम शिक्षण संस्थानों सहित कई सरकारी विभागों को बजट की व्यवस्था करने के लिए कहा गया। मरता क्या न करता, बड़े साहब से पंगा लेने का मतलब मुसीबत मोल लेना।
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कुछ ने खुशी तो ज्यादातर ने मजबूरी में अपनी-अपनी हैसियत के अनुरूप बजट की व्यवस्था की, फिर इसके बाद करोड़ों के कैश और त्रिवेणी महोत्सव की आड़ में शुरू हुआ ऐश का खेल। अफसरों, उनके रिश्तेदारों, करीबियों, सत्ता के लोगों और प्रभावशाली लोगों को मुफ्त में मनोरंजन की ऐसी लत लगी कि मंच से स्थानीय प्रतिभाएं गायब हो गईं। त्रिवेणी महोत्सव बॉलीवुड कलाकारों के ठुमकों तक ही सीमित रह गया। छह साल पहले इस आयोजन के बजट को लेकर विवाद खड़ा हो गया।


अफसरों को लगा कि अगर यह सिलसिला नहीं थमा तो जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। आयोजन बंद कर दिया गया। छह साल बाद इस बार फिर इसकी शुरुआत हुई है। बजट को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं। कला के इस महोत्सव के आयोजन के लिए प्रशासन की ओर से बनाई गई अलग-अलग समितियों में कलाकारों से ज्यादा बिल्डरों और तमाम बड़े व्यापारियों को शामिल किया गया है। यमुना तट पर लगी लग्जरी कुर्सियों पर फिर से अफसर, उनके रिश्तेदार, करीबी और प्रभावशाली लोग नजर आने लगे हैं। महोत्सव देखने पहुंच रहे आम शहरी हमेशा की तरह इस दफे भी धक्के खाकर बाहर से लौट जा रहे हैं।
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