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अदब तक ही सीमित नहीं गालिब का दायरा
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 19 Feb 2016 12:30 AM IST
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय की केंद्रीय सांस्कृतिक समिति की ओर से बृहस्पतिवार को मिर्जा गालिब स्मृति व्याख्यान के तहत तमाम पहलुओं से गालिब की शख्सियत बयां की गई। बतौर मुख्य वक्ता प्रो.राजेंद्र कुमार ने गालिब को उर्दू का पहला कवि बताया। कहा कि गालिब का दायरा केवल साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि संगीत और सिनेमा तक फैला हुआ है। उनकी रचनाओं का अनुवाद हिंदी, रूसी, जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी और अवधी भाषाओं में भी हो चुका है जो उनकी वैश्विक लोकप्रियता को साबित करता है। गालिब भावनाओं को बहुत कलात्मक रूप से अपनी शायरी में पेश करते थे।
कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो.अकील रिजवी ने कहा कि गालिब की शख्सियत के कई पहलू अभी भी छिपे हुए हैं।
वह इलाहाबाद भी आए थे लेकिन बहुत ही दुखी मन से गए, उन कारणों को जानना भी जरूरी है। अंग्रेजी विभाग की प्रो.स्मिता अग्रवाल ने शिव और सौंदर्य के संगीत के साथ गालिब की गजलों को पेश किया। प्रो.अली अहमद फातमी ने कहा कि दीवाने गालिब के प्रकाशन को 175 वर्ष पूरे हो चुके हैं। गालिब का दीवान पहली बार 1841 में दिल्ली से प्रकाशित हुआ। हिंदी साहित्यकारों ने गालिब की शायरी से समाज को तलाशने की कोशिश की है। इस दौरान प्रो.अब्दुल कादिर जाफरी, प्रो.नौशाबा सरदार, प्रो.शबनम हमीद, प्रो.आरके सिंह, प्रो.अजय जैतली, कर्नल अबरार, डॉ.सालेहा रशीद, जफर बख्त, डॉ.सूर्य नारायण, डॉ.फाजिल हाशमी, नीलम शंकर, सुरेंद्र राही आदि मौजूद थे।
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कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो.अकील रिजवी ने कहा कि गालिब की शख्सियत के कई पहलू अभी भी छिपे हुए हैं।
वह इलाहाबाद भी आए थे लेकिन बहुत ही दुखी मन से गए, उन कारणों को जानना भी जरूरी है। अंग्रेजी विभाग की प्रो.स्मिता अग्रवाल ने शिव और सौंदर्य के संगीत के साथ गालिब की गजलों को पेश किया। प्रो.अली अहमद फातमी ने कहा कि दीवाने गालिब के प्रकाशन को 175 वर्ष पूरे हो चुके हैं। गालिब का दीवान पहली बार 1841 में दिल्ली से प्रकाशित हुआ। हिंदी साहित्यकारों ने गालिब की शायरी से समाज को तलाशने की कोशिश की है। इस दौरान प्रो.अब्दुल कादिर जाफरी, प्रो.नौशाबा सरदार, प्रो.शबनम हमीद, प्रो.आरके सिंह, प्रो.अजय जैतली, कर्नल अबरार, डॉ.सालेहा रशीद, जफर बख्त, डॉ.सूर्य नारायण, डॉ.फाजिल हाशमी, नीलम शंकर, सुरेंद्र राही आदि मौजूद थे।
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