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गरीबों को आवास देना सरकार की जिम्मेदारीः हाईकोर्ट

Wed, 03 Jul 2019 09:48 PM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Wed, 03 Jul 2019 09:48 PM IST
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Allahabad Highcourt Says, to provide house to poors is governsment's responsbility.
Allahabad Highcourt - फोटो : AU
गरीबों को आवास देना सरकार की जिम्मेदारी: हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(इ) के तहत आश्रय का अधिकार मूल अधिकार है। जिसमें अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार के तहत आवास का अधिकार भी शामिल है। सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह गरीबों को आवास मुहैया कराए। कोर्ट ने कहा है कि आवास का अधिकार केवल जीवन का संरक्षण ही नहीं है अपितु घर शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं धार्मिक विकास के लिए जरूरी है। आवास सभी मूलभूत सुविधाओं के साथ होना चाहिए। कोर्ट ने कहा दलितों और आदिवासियों को देश की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए आवश्यक है कि सरकार उनको आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराए। ऐसा करना सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए आवश्यक है।
बलिया रसड़ा निवासी राजेश यादव की जनहित याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी ने 1995 से पट्टे पर आवंटित भूमि से पिछड़े वर्ग के श्रमिकों की बेदखली का आदेश देने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि शासन उन्हें हटाना ही चाहता है तो वैकल्पिक आवास देने के बाद हटाए। कोर्ट ने इसे जनहित याचिका के बजाय व्यक्तिगत हित की याचिका मानते हुए याची पर 10 हजार रुपये हर्जाना लगाते हुए याचिका खारिज कर दी है।
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रोटी, कपड़ा और मकान है मूल जरूरत
कोर्ट ने कहा है कि पारंपरिक रूप से रोटी, कपड़ा और मकान किसी व्यक्ति की मूलभूत जरूरत मानी गई है। राज्य का दायित्व है कि वह उचित कीमत पर गरीबों को आवास दे। हालांकि कि किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर अतिक्रमण करने का अधिकार नहीं है।
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यह था मामला
एसडीएम ने खलिहान, खाद का गड्ढा और खेल के मैदान की भूमि को दूसरे स्थान पर शिफ्ट किया और सार्वजनिक उपयोग की खाली जमीन को बंजर दर्ज कर दिया। ग्राम प्रधान के प्रस्ताव पर पिछड़े वर्ग के पांच भूमिहीन कृषि मजदूरों को 1995 में आवासीय पट्टा दिया गया। जिसमें वह मकान बनाकर रह रहे हैं। आबादी से पहले सार्वजनिक भूमि होने के आधार पर पट्टे की वैधता पर आपत्ति की गई। 12 साल बाद एसडीएम ने पट्टा रद्द कर दिया। मगर आवंटीगण ने अपना कब्जा नहीं छोड़ा। जमीन खाली न होने पर यह याचिका दाखिल की गई और निवासियों की बेदखली के लिए समादेश जारी करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने याचिका हर्जाने के साथ खारिज कर दी है।
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