फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Allahabad High Court: The pen of the judges not only made the judgment but also created the history

Allahabad High Court : न्यायमूर्तियों की कलम ने फैसले ही नहीं, इतिहास भी रचा

Mon, 13 Sep 2021 08:23 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 13 Sep 2021 08:23 AM IST
सार

राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के फैसले की तो आजतक चर्चा होती है पर इसी क्रम में तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति केबी अस्थाना की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने भी ऐतिहासिक फैसला दिया था।

विज्ञापन
Allahabad High Court: The pen of the judges not only made the judgment but also created the history
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अपने डेढ़ सौ वर्ष के गौरवशाली इतिहास में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कई फैसले देकर लोकतंत्र और सांविधानिक मूल्यों की रक्षा की है। शनिवार को अधिवक्ताओं के चैंबर निर्माण के लिए नई इमारत और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के शिलान्यास कार्यक्रम में जब भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी चुनाव याचिका में ऐतिहासिक फैसला देने वाले जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के नाम का उल्लेख किया तो न केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट की बार और बेंच गौरवान्वित हुईं, बल्कि इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के अन्य ऐतिहासिक फैसले भी चर्चा का विषय बन गए, जिन्होंने आजाद भारत में विधि इतिहास की दिशा और दशा को निर्धारित किया।

विज्ञापन

इमरजेंसी में नेताओं की गिरफ्तारी निरस्त कर दी थी  
राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के फैसले की तो आजतक चर्चा होती है पर इसी क्रम में तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति केबी अस्थाना की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने भी ऐतिहासिक फैसला दिया था। देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 27 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद गैर कांग्रेसी प्रतिद्वंद्वी राजनेताओं को मीसा कानून के तहत गिरफ्तार किया जाने लगा।

तब भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई । खंडपीठ ने 6885/1975 नंबर पर उनकी याचिका स्वीकार कर ली। उसी समय वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र कुमार सिंह चौधरी भी सामने आए और याचिका दायर की। रिकार्ड में उनकी याचिका 7428/1975 आज भी दर्ज है। आपातकाल में मीसा कानून के तहत नेताओं की गिरफ्तारी को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी गई । इन दोनों याचिकाओं पर तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति केबी अस्थाना की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई शुरू की और अपने ऐतिहासिक फैसले में नेताओं की गिरफ्तारी निरस्त कर दी।

विज्ञापन
विज्ञापन

1998 में सांविधानिक संकट टाला
उत्तर प्रदेश में वर्ष 1998 में कल्याण सिंह की भाजपा सरकार थी। तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने 23 फरवरी 1998 को यूपी की कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर दिया और लोकतांत्रिक कांग्रेस दल के नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। उस वक्त डॉ.. नरेंद्र कुमार सिंह गौर ने राज्यपाल के फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। सुनवाई होने लगी तो न्यायमूर्ति वीरेंद्र दीक्षित व न्यायमूर्ति डीके सेठ की खंडपीठ ने कल्याण सिंह की बर्खास्तगी पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर राज्यपाल चाहें तो कल्याण सिंह को बहुमत साबित करने का आदेश दे सकते हैं। फिर क्या था यूपी में आया सांविधानिक संकट टल गया।

विज्ञापन

राममंदिर मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2010 को विवादित राम मंदिर मुद्दे पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने अयोध्या के विवादित स्थल को रामजन्मभूमि करार देते हुए विवादित जमीन का एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में बांटने का फैसला दिया था। हाईकोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन का तीन हिस्सों में बंटवारा किया था। इसमें से एक हिस्सा हिंदू महासभा को दिया गया था जिसमें राम मंदिर बनना था, दूसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया था। विवादित स्थल का तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इस पर फैसला देकर विवाद खत्म कर दिया है।

तीन तलाक को असांविधानिक करार दिया 
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में तीन तलाक को असांविधानिक करार देते हुए कहा था कि यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है। उच्च न्यायालय का यह भी मानना था कि कोई भी पर्सलन लॉ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं है। उच्च न्यायालय के अनुसार संविधान में सबके लिए समान अधिकार हैं और इसमें मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं। न्यायमूर्ति सुनील कुमार ने अपने फैसले में यहां तक कह डाला था कि इस्लामिक कानून तीन तलाक पर गलत व्याख्या कर रहा है। बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी तीन तलाक को असांविधानिक घोषित कर दिया।

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने को लेकर दिखाई गंभीरता
अगस्त 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी ऐतिहासिक टिप्पणी में कहा था कि अधिकारियों, नेताओं और जजों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि सरकारी शिक्षा पद्धति में सुधार लाया जा सके। यह टिप्पणी हाईकोर्ट ने खस्ताहाल प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था पर नाराजगी जाहिर करते हुए दी थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि निगम, अर्ध सरकारी संस्थानों या अन्य कोई भी राज्य के खजाने से वेतन उठा रहा हो, उनके बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ना अनिवार्य किया जाए। इतना ही नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश दिया था कि जो कोई इसका पालन नहीं करता उससे फीस वसूली जाए और उनका प्रमोशन और इंक्रीमेंट भी रोक दिया जाए।

जातीय राजनीतिक रैलियों पर लगाई रोक
जुलाई 11, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह तथा न्यायमूर्ति महेंद्र दयाल की खंडपीठ ने अपने अहम फैसले में पूरे उत्तर प्रदेश में जातियों के आधार पर होने वाली राजनीतिक दलों की रैलियों पर रोक लगा दी थी। एक ऐतिहासिक फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने दिसंबर 2020 में व्यवस्था दी थी कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर असहमति व्यक्त करना हमारे सांविधानिक और उदार लोकतंत्र की पहचान है। इसी चीज को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षित किया गया है। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति पर दायर एक प्राथमिकी को खारिज करते हुए की।

सुपरटेक के मामले में सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई मुहर
सबसे ताज़ा मामला नोएडा में दो 40 मंजिला टावरों (सुपरटेक) को गिराने का है, जिसमें  उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर मुहर लगा दी है। इसके बाद अब इन दोनों इमारतों को गिराया जाना तय है। इन टावर में 950 फ्लैट हैं। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्देश की पुष्टि की, जिसमें सक्षम प्राधिकारी को नोएडा के अधिकारियों के खिलाफ मिलीभगत से मुकदमा चलाने की मंजूरी देने का निर्देश दिया गया था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस वीके शुक्ला और जस्टिस  सुनीत कुमार की खंडपीठ ने 11 अप्रैल, 2014 को नोएडा प्राधिकरण को प्रमाणित प्रति दाखिल करने की तिथि से चार महीने की अवधि के भीतर प्लॉट चार, सेक्टर 93 ए नोएडा में स्थित टावर्स 16 और 17 (एपेक्स और सियान) को ध्वस्त करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने इसके साथ ही रियल एस्टेट फर्म सुपरटेक को मलबे को गिराने और हटाने का खर्च वहन करने का भी निर्देश दिया था। इसमें विफल रहने पर इसे नोएडा प्राधिकरण द्वारा भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल किया जाएगा।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed