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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- तय मापदंडों पर होना चाहिए अपराध का परीक्षण

Thu, 03 Dec 2020 02:54 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 03 Dec 2020 02:54 AM IST
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Allahabad High Court said crime should be tested on the set criteria
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी अपराध का परीक्षण इसके लिए निर्धारित मापदंडों पर ही होना चाहिए। इसमें मुख्य रूप से अपराध की प्रकृति, उद्देश्य आदि बातों का तुलनात्मक परीक्षण के बाद ही सजा तय की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यदि कानून में अपराध की न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं है सिर्फ अधिकतम सजा तय है, तो अपराध के तथ्यों, साक्ष्यों, परिस्थितियों व औचित्य पर विचार कर न्यायाधीश कोई भी सजा दे सकता है। 

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मगर न्यूनतम सजा निर्धारित होने पर उससे कम सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि धारा 420  आईपीसी (धोखाधड़ी) में दंड के साथ जुर्माने की सजा का प्रावधान है। इसलिए केवल जुर्माना लगाकर छोड़ा नहीं जा सकता, दोनों ही सजा देनी होगी। इस धारा में न्यूनतम सजा तय नहीं है, अधिकतम सात वर्ष तक की सजा निर्धारित है। इसलिए न्यायाधीश अपने विवेक से सजा को कम कर सकते हैं। 
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कोर्ट ने नौकरी लगवाने का लालच देकर पैसा हड़पने वाले अभियुक्त को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा को बदलते हुए उसके द्वारा 28 दिन जेल में बिताने की अवधि को पर्याप्त माना, किंतु जुर्माने की राशि 50 हजार से बढ़ाकर एक लाख कर दी है और कहा है कि जुर्माने का भुगतान दो माह के भीतर पीड़ित वादी को किया जाए।
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न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने यह निर्णय आशाराम यादव की दो साल की सजा व जुर्माने के खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया है। कोर्ट ने हिंदी में फैसला सुनाया। चिंतामणि दुबे ने एसएसपी इलाहाबाद से 15 मई 2002 को शिकायत की थी कि उनके भाई शेष मणि दुबे को नौकरी का झांसा देकर आशाराम यादव  ने 53 हजार रुपये ले लिए। नौकरी नहीं मिली तो रुपये वापस मांगे। आशाराम ने किस्तों में उसे 12 रुपये हजार वापस किए और 41 हजार हड़प लिए।

एसएसपी के निर्देश पर कर्नलगंज थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई। पुलिस ने कोई अपराध न पाते हुए अंतिम रिपोर्ट लगा दी। किंतु न्यायालय ने संज्ञान लेकर समन जारी किया और पांच वर्ष का सश्रम कारावास  व दो लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई । सत्र न्यायालय ने सजा घटाकर दो साल कर दी और 50 हजार जुर्माना लगाया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।


याची का कहना था कि उसने 28 दिन जेल मे बिताए हैं। उसकी उम्र 65साल है। 19 साल मुकदमा चला ।अब सहानुभूतिपूर्वक विचार कर भोगी गई सजा को पर्याप्त माना जाए और जुर्माना लगाकर छोड़ा जाए। इसपर कोर्ट ने 28 दिन की जेल में बिताई अवधि को पर्याप्त सजा माना और एक लाख जुर्माना लगाया है। यह राशि वादी मुकदमा को देने का निर्देश दिया है।

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