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हाईकोर्ट ने दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी को ठहराया जायज, कहा- अपनी इच्छा से जी सकते हैं जिंदगी
Mon, 28 Dec 2020 05:53 PM IST
सुरेंद्र जोशी
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Mon, 28 Dec 2020 05:53 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दूसरे धर्म के लड़के से शादी को जायज ठहराया है. फैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा कि बालिग होने पर लोग अपनी शर्तों पर जिंदगी जी सकते हैं. न्यायालय ने एटा जिले की एक युवती द्वारा दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करने को जायज ठहराय है. उन्होंने व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द कर दी है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की पीठ ने 18 दिसंबर को दिए एक फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता शिखा हाईस्कूल के प्रमाण पत्र के मुताबिक बालिग हो चुकी है, उसे अपनी इच्छा और शर्तों पर जीवन जीने का हक है। उसने अपने पति सलमान उर्फ करण के साथ जीवन जीने की इच्छा जताई है इसलिए वह आगे बढ़ने को स्वतंत्र है।
बता दें कि एटा जिले के कोतवाली देहात पुलिस थाने में 27 सितंबर को सलमान उर्फ करण के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 366 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसे अदालत ने रद्द कर दिया है। इससे पूर्व एटा जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 7 दिसंबर के अपने आदेश में शिखा को बाल कल्याण समिति को सौंप दिया था जिसने 8 दिसंबर को शिखा को उसकी इच्छा के बगैर उसके मां-बाप को सौंप दिया।
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अदालत ने कहा कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और बाल कल्याण समिति की कार्रवाई में कानूनी प्रावधानों के उपयोग में खामी देखी गई। उल्लेखनीय है कि अदालत के निर्देश पर शिखा को पेश किया गया जिसने बताया कि हाईस्कूल प्रमाण पत्र के मुताबिक उसकी जन्म तिथि 4 अक्टूबर 1999 है और वह बालिग है।
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बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की पीठ ने 18 दिसंबर को दिए एक फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता शिखा हाईस्कूल के प्रमाण पत्र के मुताबिक बालिग हो चुकी है, उसे अपनी इच्छा और शर्तों पर जीवन जीने का हक है। उसने अपने पति सलमान उर्फ करण के साथ जीवन जीने की इच्छा जताई है इसलिए वह आगे बढ़ने को स्वतंत्र है।
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बता दें कि एटा जिले के कोतवाली देहात पुलिस थाने में 27 सितंबर को सलमान उर्फ करण के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 366 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसे अदालत ने रद्द कर दिया है। इससे पूर्व एटा जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 7 दिसंबर के अपने आदेश में शिखा को बाल कल्याण समिति को सौंप दिया था जिसने 8 दिसंबर को शिखा को उसकी इच्छा के बगैर उसके मां-बाप को सौंप दिया।
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अदालत ने कहा कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और बाल कल्याण समिति की कार्रवाई में कानूनी प्रावधानों के उपयोग में खामी देखी गई। उल्लेखनीय है कि अदालत के निर्देश पर शिखा को पेश किया गया जिसने बताया कि हाईस्कूल प्रमाण पत्र के मुताबिक उसकी जन्म तिथि 4 अक्टूबर 1999 है और वह बालिग है।