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लेकिन, अमरूद तो इलाहाबादी ही रहेंगे
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Wed, 17 Oct 2018 12:28 AM IST
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कभी मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने कहा था, ‘कुछ इलाहाबाद में सामां नहीं बहबूद के, यां धरा क्या है ब-जुज़ अकबर के और अमरूद के’ और वह सोलह आने सच भी था। लेकिन, अब इलाहाबाद के प्रयागराज होने पर अमरूद पर फिर आफत आ गई है। आते हुए जाड़े से पहले ही ‘आधार कार्ड’ बदलने से इलाहाबादी अमरूद असमंजस में है।
जिस अमरूद से इलाहाबाद की पहचान जुड़ी हुई थी, अब उस अमरूद की पहचान पर ही संकट है। जिले के बंटवारे के साथ पहले ही पाला बदलकर अमरूद का कौशाम्बी का हो गया था। हालांकि, तब भी अमरूद कौशाम्बी का हरगिज नहीं हुआ, इलाहाबादी ही कहलाता रहा। अमरूद के इसी इलाहाबादीपन से पहले की तरह ही स्वाद की मिठास और अनूठेपन की खुशबू आती रही।
‘इलाहाबादी सेबिया‘ कहने के बाद कम से कम किसी इलाहाबादी को यह बताने की जरूरत नहीं कि यह सेब नहीं सेब की शक्ल-सूरत वाला अमरूद है, जो अपनी बिरादरी में अलग और अनूठा है। ‘इलाहाबादी सुर्खा‘ की ठसक भी ऐसी ही है। देश के दूसरे हिस्सों में ‘इलाहाबादी अमरूद’ के कुनबे को बसाने, बढ़ाने की तमाम कोशिशें हुईं लेकिन सब बेमानी रहा। ‘इलाहाबादी अमरूद’ का क्रेज पहले की तरह ही आज भी बरकरार है।
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बेमिसाल स्वाद वाले अमरूद की खुशबू ही ऐसी है कि इलाहाबाद जंक्शन पर ट्रेन रुकते ही लोग चाय-पानी की चिंता छोड़कर सिर्फ और सिर्फ इलाहाबादी अमरूद के लिए ही स्टालों की ओर दौड़ पड़ते हैं। ज्यादातर वेंडर्स भी ‘इलाहाबादी अमरूद’ की टोकरियां लिए करीब के एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक का सफर करते इसकी खुशबू बांटते, बिखेरते हैं। लोग दूर बसे अपने परिचितों, रिश्तेदारों को जाड़े के दिनों में अमरूद की सौगात ही भेजते हैं, जो मिठाइयों पर कई गुना भारी होती है।
अमरूद महोत्सव की संयोजिका पल्लवी चंदेल कहती हैं, नाम चाहे जो भी बदले, ‘इलाहाबादी अमरूद’ को ‘प्रयागराजी अमरूद’ कौन बोलेगा। कुल मिलाकर नाम और पाला बदलने से ‘इलाहाबादी अमरूद’ की पहचान और निरालेपन में कोई बदलाव नहीं आने वाला। भले ही नाम गुम जाए लेकिन नामचीन बना रहेगा ‘इलाहाबादी अमरूद।’
बागबान सशंकित, पहचान पर संकट
अमरूद किसानों ने कहा, इलाहाबादी अमरूद के नाम से उनकी भी पहचान
मंझनपुर। इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किए जाने पर कौशाम्बी में बहस छिड़ गई। अमरूद की खेती करने वाले किसान इलाहाबादी अमरूद की पहचान को लेकर सशंकित हैं।
अविभाजित इलाहाबाद के दोआबा (अब कौशाम्बी जिला) में तकरीबन 300 हेक्टेयर क्षेत्रफल में अमरूद की बागवानी होती है। यहां मूरतगंज और चायल ब्लाक को शासन ने फलपट्टी के रूप में घोषित कर रखा है। जिले भर में होने वाली बागवानी का 75 फीसदी अकेले इन दोनों ब्लॉकों का है। अमरूद की बागवानी करने वाले इब्राहिमपुर के छोटेलाल पहलवान, सुरेेमन पहलवान, छोटी धन्नी के नसीर अहमद, धन्नी के जावेद अहमद आदि का कहना है कि दिल्ली, कोलकाता, बिहार, झारखंड आदि प्रांतों में इलाहाबादी अमरूद के नाम से उन सभी की कद्र होती है। सीजन पर यहां से रोजाना करीब 50 टन फल इन राज्यों को भेजा जाता है। वे सशंकित हैं कि इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने से अब अमरूद की पहचान का संकट होगा। जिला उद्यान अधिकारी सुरेंद्र राम भाष्कर के मुताबिक हर साल कौशाम्बी से करीब दो हजार टन अमरूद बाहर भेजा जाता है। इसमें सुर्खा के अलावा सफेदा, नर्मा और पट्ठा भी शामिल होता है। इलाहाबादी अमरूद की अपनी एक पहचान है।
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जिस अमरूद से इलाहाबाद की पहचान जुड़ी हुई थी, अब उस अमरूद की पहचान पर ही संकट है। जिले के बंटवारे के साथ पहले ही पाला बदलकर अमरूद का कौशाम्बी का हो गया था। हालांकि, तब भी अमरूद कौशाम्बी का हरगिज नहीं हुआ, इलाहाबादी ही कहलाता रहा। अमरूद के इसी इलाहाबादीपन से पहले की तरह ही स्वाद की मिठास और अनूठेपन की खुशबू आती रही।
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‘इलाहाबादी सेबिया‘ कहने के बाद कम से कम किसी इलाहाबादी को यह बताने की जरूरत नहीं कि यह सेब नहीं सेब की शक्ल-सूरत वाला अमरूद है, जो अपनी बिरादरी में अलग और अनूठा है। ‘इलाहाबादी सुर्खा‘ की ठसक भी ऐसी ही है। देश के दूसरे हिस्सों में ‘इलाहाबादी अमरूद’ के कुनबे को बसाने, बढ़ाने की तमाम कोशिशें हुईं लेकिन सब बेमानी रहा। ‘इलाहाबादी अमरूद’ का क्रेज पहले की तरह ही आज भी बरकरार है।
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बेमिसाल स्वाद वाले अमरूद की खुशबू ही ऐसी है कि इलाहाबाद जंक्शन पर ट्रेन रुकते ही लोग चाय-पानी की चिंता छोड़कर सिर्फ और सिर्फ इलाहाबादी अमरूद के लिए ही स्टालों की ओर दौड़ पड़ते हैं। ज्यादातर वेंडर्स भी ‘इलाहाबादी अमरूद’ की टोकरियां लिए करीब के एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक का सफर करते इसकी खुशबू बांटते, बिखेरते हैं। लोग दूर बसे अपने परिचितों, रिश्तेदारों को जाड़े के दिनों में अमरूद की सौगात ही भेजते हैं, जो मिठाइयों पर कई गुना भारी होती है।
अमरूद महोत्सव की संयोजिका पल्लवी चंदेल कहती हैं, नाम चाहे जो भी बदले, ‘इलाहाबादी अमरूद’ को ‘प्रयागराजी अमरूद’ कौन बोलेगा। कुल मिलाकर नाम और पाला बदलने से ‘इलाहाबादी अमरूद’ की पहचान और निरालेपन में कोई बदलाव नहीं आने वाला। भले ही नाम गुम जाए लेकिन नामचीन बना रहेगा ‘इलाहाबादी अमरूद।’
बागबान सशंकित, पहचान पर संकट
अमरूद किसानों ने कहा, इलाहाबादी अमरूद के नाम से उनकी भी पहचान
मंझनपुर। इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किए जाने पर कौशाम्बी में बहस छिड़ गई। अमरूद की खेती करने वाले किसान इलाहाबादी अमरूद की पहचान को लेकर सशंकित हैं।
अविभाजित इलाहाबाद के दोआबा (अब कौशाम्बी जिला) में तकरीबन 300 हेक्टेयर क्षेत्रफल में अमरूद की बागवानी होती है। यहां मूरतगंज और चायल ब्लाक को शासन ने फलपट्टी के रूप में घोषित कर रखा है। जिले भर में होने वाली बागवानी का 75 फीसदी अकेले इन दोनों ब्लॉकों का है। अमरूद की बागवानी करने वाले इब्राहिमपुर के छोटेलाल पहलवान, सुरेेमन पहलवान, छोटी धन्नी के नसीर अहमद, धन्नी के जावेद अहमद आदि का कहना है कि दिल्ली, कोलकाता, बिहार, झारखंड आदि प्रांतों में इलाहाबादी अमरूद के नाम से उन सभी की कद्र होती है। सीजन पर यहां से रोजाना करीब 50 टन फल इन राज्यों को भेजा जाता है। वे सशंकित हैं कि इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने से अब अमरूद की पहचान का संकट होगा। जिला उद्यान अधिकारी सुरेंद्र राम भाष्कर के मुताबिक हर साल कौशाम्बी से करीब दो हजार टन अमरूद बाहर भेजा जाता है। इसमें सुर्खा के अलावा सफेदा, नर्मा और पट्ठा भी शामिल होता है। इलाहाबादी अमरूद की अपनी एक पहचान है।