अघोरी साधना : चाहे भक्तों की बीमारी हो या कोई समस्या, धूने की राख से होता है सबका समाधान
चिता की बुझी हुई लकड़ियों से अघोरियों के धूने जलाए जा रहे हैं। चाहे भक्तों की किसी तरह की बीमारी हो या घर-परिवार की कोई समस्या, बेटी की शादी की चिंता हो या बेटे की नौकरी पक्की कराने की चाह, ऐसी मन्नतें पूरी कराने के लिए अघोरियों के शिविरों में भीड़ लग रही है।
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तन पर भस्मी लपेटे, गले में मानव खोपड़ी या मुंडों की माला और हाथ में खप्पर-चिमटा लिए साधु इन दिनों माघ मेले में लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। संगम पर संतों-भक्तों और कल्पवासियों के समागम में देश भर से आए अलग-अलग संप्रदायों, पंथों वाले संतों में इस तरह के निराले रूप वाले बाबा शिविरों से लेकर स्नान घाटों तक मिल जाएंगे। इनके बीच चिता की लकड़ी से धूना जलाकर साधना करने वाले अघोरी भी माघ मेले की शोभा बने हैं।
चिता की बुझी हुई लकड़ियों से अघोरियों के धूने जलाए जा रहे हैं। चाहे भक्तों की किसी तरह की बीमारी हो या घर-परिवार की कोई समस्या, बेटी की शादी की चिंता हो या बेटे की नौकरी पक्की कराने की चाह, ऐसी मन्नतें पूरी कराने के लिए अघोरियों के शिविरों में भीड़ लग रही है।
माघ मेले में इस बार अघोरियों के शिविर दुख निवारण का केंद्र बने हैं। वैसे मेले में ऐसे भी खप्परधारी बाबा घूमते दिख रहे हैं, जिन्हें देख कर कोई भी डर जाए। औघड़ बाबाओं की टोलियां सेक्टरवाइज निकल रही हैं और राह चलते लोगों के दुख दूर करने के उपाय भी बता रही हैं। भस्मी देकर पीठ ठोंकने वाले ऐसे बाबाओं से हटकर कुछ ऐसे भी अघोरी हैं जो महीने भर से शिविरों में रहकर शिव साधना में लीन हैं। उनके रहन-सहन और साधना के तरीके भी अलग हैं।
सेक्टर तीन में ही काली मार्ग पर अघोरेश्वर भगवान राम के शिविर में सत्संग के साथ निरोगी जीवन का संदेश मिल रहा है। वहीं मुंबई से आए बाबा अशीष राम सेक्टर तीन में गाटा संख्या चार पर लगे शिविर में साधनारत हैं। अघोरेश्वर आशीष की धुनि जलाने के लिए हर रोज श्मशान की लकड़ी लाई जाती है। इस शिविर में श्मशान की चिता की बुझी हुई लकड़ी का ही धूना जल रहा है। बाबा अशीष अघोरी शब्द की व्याख्या उजाले के रूप में करते हैं।
जीवन के अंधकार को दूर कर देता है अघोर पंथ
उनका कहना है कि अघोर पंथ वह है जो जीवन में व्याप्त घोर अंधकार हो हमेशा के लिए दूर कर दे। लेकिन, इस दौर में अघोरियों के रहन-सहन और तौर-तरीके को पाखंड के रूप में देखा जाता है। कुछ वेशधारियों की वजह से शैव संप्रदाय की इस परंपरा को क्षति पहुंचाई जा रही है। अघोरपंथी बाबा आशीष बताते हैं कि अघोर भगवान शिव के पांच रूपों में से एक है। इसीलिए ये अघोरी शव पर बैठकर साधना करते हैं। शव से शिव की प्राप्ति का यह रास्ता अघोर पंथ की परंपरा का हिस्सा है। ये अघोरी तीन तरह की साधना करते हैं। शव साधना,शिव साधना और श्मशान साधना।
अघोर का अर्थ है सरल। यानी जो घोर या जटिल न हो। तरह-तरह का वेश बनाकर खप्पर-खोपड़ी लेकर लोगों को डराने या परेशान करने वाले पाखंडी हैं। - अघोरी नहीं। बाबा आशीष राम।