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High Court : बीएनएसएस लागू होने के बाद आपराधिक मामलों में अग्रिम जमानत पर अब प्रतिबंध नहीं

Sat, 05 Jul 2025 12:18 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 05 Jul 2025 12:18 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एक जुलाई, 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) लागू होने के बाद अब उत्तर प्रदेश में मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडनीय आपराधिक मामलों में अग्रिम जमानत देने पर लगा प्रतिबंध प्रभावी नहीं है।

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After implementation of BNSS, there is no ban on anticipatory bail in criminal cases
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एक जुलाई, 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) लागू होने के बाद अब उत्तर प्रदेश में मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडनीय आपराधिक मामलों में अग्रिम जमानत देने पर लगा प्रतिबंध प्रभावी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 482, जो अब अग्रिम जमानत को नियंत्रित करती है। ऐसे में सीआरपीसी की धारा 438(6) के तहत पहले से मौजूद किसी भी प्रतिबंध को बरकरार नहीं रखा गया है। यह फैसला न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह की पीठ ने अब्दुल हमीद की दूसरी अग्रिम जमानत अर्जी को स्वीकार करते हुए सुनाया।

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दरअसल, सीआरपीसी की धारा 438(6) के तहत उत्तर प्रदेश संशोधन अधिनियम, 2019 से हत्या या आजीवन कारावास से संबंधित मामलों में अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसी प्रतिबंध के कारण अब्दुल हमीद की पहली अग्रिम जमानत याचिका फरवरी 2023 में खारिज कर दी गई थी।

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मामला 13 अगस्त 2011 को बरेली के देवरानिया थाना क्षेत्र में हुई गुड्डू उर्फ जाकिर हुसैन की हत्या से जुड़ा है। पुलिस ने शुरुआती जांच में अब्दुल हमीद के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल नहीं किया था, क्योंकि जांच में उसके खिलाफ आरोप झूठे पाए गए थे और घायलों ने भी उसके मौके पर न होने की बात कही थी। हालांकि, 2019 में गवाही के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने उसे धारा 319 सीआरपीसी के तहत तलब किया था।

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बीएनएसएस के लागू होने के बाद, अब्दुल हमीद ने धारा 482 बीएनएसएस के तहत नई अग्रिम जमानत अर्जी दायर की, जिसे सत्र न्यायालय ने मार्च 2025 में खारिज कर दिया था। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। अपीलार्थी की ओर से तर्क दिया गया कि सीआरपीसी की धारा 438(6) के तहत वैधानिक रोक अब बीएनएसएस में मौजूद नहीं है।

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि एफआईआर में अपीलार्थी की भूमिका अस्पष्ट थी और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल एक गोली लगने की बात थी, जो अंधाधुंध गोलीबारी के दावों का खंडन करती है। याची के 78 वर्ष उम्र आदि को ध्यान में रखते हुए अब्दुल हमीद की अग्रिम जमानत अर्जी स्वीकार कर ली।

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