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दलित बस्ती में आगजनी के आरोपी की रासुका में निरुद्धि रद्द, जौनपुर के सरायख्वाजा का मामला
Mon, 07 Dec 2020 08:15 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Mon, 07 Dec 2020 08:15 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : social media
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दलित बस्ती में घुसकर आगजनी और मारपीट करने के आरोपी जावेद सिद्दकी की रासुका के तहत निरुद्धि को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट का मानना है कि याची को उसे मिले बचाव के अधिकार का प्रयोग करने का उचित अवसर नहीं दिया गया। कोर्ट ने जावेद पर की गई रासुका के तहत कार्रवाई को अवैधानिक और असंविधानिक करार देते हुए अधिकारियों को हिदायत भी दी है कि वह सामान्य कानूनों से इतर मिले निरुद्धि के विशेषाधिकारों का प्रयोग करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतें।
जावेद की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति पीके श्रीवास्तव की पीठ ने यह फैसला दिया। अपने विस्तृत आदेश में कोर्ट ने कहा है कि हमारी राय में अधिकारियों ने रासुका निरुद्धि के खिलाफ याची का प्रत्यावेदन राज्य एडवाइजरी बोर्ड तक पहुंचाने में जानबूझकर विलंब किया है। याची पर रासुका के तहत कार्रवाई करने में अधिकारियों ने अतिरिक्त जल्दीबाजी दिखाई और उसके प्रत्यावेदन को आगे बढ़ाने में बिना वजह देरी की गई जिसका कोई जवाब उनके पास नहीं है। इससे याची के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हनन हुआ।
जिलाधिकारी जौनपुर ने जावेद के खिलाफ 10 जुलाई 2020 को रासुका निरुद्धि का आदेश पारित किया था। नियमानुसार इसके 12 दिन के भीतर आदेश के खिलाफ याची का प्रत्यावेदन राज्य एडवाजरी बोर्ड तक पहुंच जाना चाहिए । मगर ऐसा नहीं हुआ और बोर्ड ने रासुका लगाए जाने की पुष्टि कर दी। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
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याची के अधिवक्ताओं का कहना था कि याची ने रासुका लगाने के बाद समय रहते इसके खिलाफ प्रत्यावेदन जेल अधीक्षक को दिया था। उसने संबंधित दस्तावेज भी मांगे थे। मगर उसका प्रत्यावेदन समय से बोर्ड को नहीं भेजा गया। दस्तावेज भी नहीं दिए गए जिससे वह प्रभावी प्रत्यावेदन नहीं दे सका। कोर्ट ने इस राज्य सरकार की दलील को नहीं माना कि कर्मचारियों के कोराना पॉजिटिव होने और कई छुट्टियां पड़ जाने की वजह से प्रत्यावेदन भेजने में देरी हुई। कोर्ट का कहना था कि तीन सप्ताह का अनावश्यक विलंब हुआ है और प्रत्यावेदन एडवाइजरी बोर्ड को प्रस्तुत नहीं किया गया।
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जावेद की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति पीके श्रीवास्तव की पीठ ने यह फैसला दिया। अपने विस्तृत आदेश में कोर्ट ने कहा है कि हमारी राय में अधिकारियों ने रासुका निरुद्धि के खिलाफ याची का प्रत्यावेदन राज्य एडवाइजरी बोर्ड तक पहुंचाने में जानबूझकर विलंब किया है। याची पर रासुका के तहत कार्रवाई करने में अधिकारियों ने अतिरिक्त जल्दीबाजी दिखाई और उसके प्रत्यावेदन को आगे बढ़ाने में बिना वजह देरी की गई जिसका कोई जवाब उनके पास नहीं है। इससे याची के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हनन हुआ।
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जिलाधिकारी जौनपुर ने जावेद के खिलाफ 10 जुलाई 2020 को रासुका निरुद्धि का आदेश पारित किया था। नियमानुसार इसके 12 दिन के भीतर आदेश के खिलाफ याची का प्रत्यावेदन राज्य एडवाजरी बोर्ड तक पहुंच जाना चाहिए । मगर ऐसा नहीं हुआ और बोर्ड ने रासुका लगाए जाने की पुष्टि कर दी। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
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याची के अधिवक्ताओं का कहना था कि याची ने रासुका लगाने के बाद समय रहते इसके खिलाफ प्रत्यावेदन जेल अधीक्षक को दिया था। उसने संबंधित दस्तावेज भी मांगे थे। मगर उसका प्रत्यावेदन समय से बोर्ड को नहीं भेजा गया। दस्तावेज भी नहीं दिए गए जिससे वह प्रभावी प्रत्यावेदन नहीं दे सका। कोर्ट ने इस राज्य सरकार की दलील को नहीं माना कि कर्मचारियों के कोराना पॉजिटिव होने और कई छुट्टियां पड़ जाने की वजह से प्रत्यावेदन भेजने में देरी हुई। कोर्ट का कहना था कि तीन सप्ताह का अनावश्यक विलंब हुआ है और प्रत्यावेदन एडवाइजरी बोर्ड को प्रस्तुत नहीं किया गया।