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Allahabad High Court: बच्चे की कस्टडी लेकर पूरी परवरिश का खर्च पिता पर नहीं डाल सकती कामकाजी मां, साझा दायित्व

Fri, 17 Jul 2026 06:37 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 17 Jul 2026 06:37 AM IST
सार

यदि दोनों माता-पिता आय अर्जित कर रहे हैं तो बच्चे के पालन-पोषण और शिक्षा सहित अन्य आवश्यक खर्च उनकी आय के अनुपात में साझा किए जा सकते हैं।

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A working mother cannot shift the entire cost of upbringing onto the father after securing child custody
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कामकाजी मां अपनी आर्थिक क्षमता का दावा कर नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा (कस्टडी) प्राप्त करती है तो बाद में वह बच्चे के भरण-पोषण का पूरा वित्तीय बोझ केवल पिता पर नहीं डाल सकती। ऐसी स्थिति में, यदि दोनों माता-पिता आय अर्जित कर रहे हैं तो बच्चे के पालन-पोषण और शिक्षा सहित अन्य आवश्यक खर्च उनकी आय के अनुपात में साझा किए जा सकते हैं।

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यह आदेश न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ल की एकलपीठ ने परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली मां और उसकी नाबालिग बेटी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर दी। प्रयागराज के परिवार न्यायालय ने अगस्त 2025 में मां की अंतरिम भरण-पोषण की मांग खारिज कर दी थी। जबकि नाबालिग बेटी के लिए तीन हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। आदेश के खिलाफ मां ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। कोर्ट में याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है। बेटी को दी गई राशि भी बेहद कम है। मां ने 2022 में केवल तीन महीने संविदा पर काम किया था और पति के दबाव के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी थी। वहीं, पति की ओर से अधिवक्ता ने वेतन पर्ची प्रस्तुत कर दलील दी कि पत्नी 14,125 रुपये प्रतिमाह कमा रही है। नौकरी छोड़ने का दस्तावेजी प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है। 
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व्यवसाय का विवरण जानबूझकर खाली छोड़ा
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के राजनेश मामले में दिए निर्णय के अनुरूप दाखिल आय-शपथपत्र में पत्नी ने अपनी आय और व्यवसाय का विवरण जानबूझकर खाली छोड़ दिया। पहले बच्ची पिता के साथ रह रही थी और वही उसका पालन-पोषण कर रहा था। बाद में मां ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर यह कहते हुए कस्टडी प्राप्त की कि वह स्वयं और बच्ची दोनों का भरण-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम है।
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अहंकार में बंटा मम्मा-पापा का प्यार, जुदा हुए मासूम
इलाहाबाद हाईकोर्ट में मम्मा-पापा के अंहकार में दो मासूम भाई-बहन जुदा हो गए। कोर्ट को भारी मन से माता-पिता के प्यार का बंटवारा करना पड़ा। ढाई साल की मासूम सोमवार, मंगलवार और बुधवार को पापा का दुलार पाएगी जबकि छह साल के बेटे को मां का आंचल शनिवार, रविवार और स्कूल की छुट्टियों के दिनों में नसीब होगा। यह फैसला न्यायमूर्ति संदीप जैन की अदालत ने मेरठ निवासी शिक्षिका मां की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनाया। करीब दो घंटे चली सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद लोगों की आंखें डबडबा गईं।  माता-पिता से बातचीत के दौरान कोर्ट ने दोबारा एक होने की संभावनाएं भी तलाशीं लेकिन वे किसी भी हाल में साथ न रहने की जिद पर अड़े रहे। वहीं, बच्चों की मासूम बात और अंदाज से कोर्ट हैरान और परेशान भी हुई। अंतत: सर्वोत्तम हित के मद्देनजर कानून की कलम मासूमों की जुदाई का फैसला लिखने को मजबूर हो गई। 

पिता बोले...कमाई अधिक है, बच्चों को बेहतर भविष्य दूंगा
बिल्डर पिता ने कहा कि मां की अपेक्षा उनकी आय अधिक है। वह बच्चों को बेहतर शिक्षा, अच्छी जीवनशैली और सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं।   मैं मां हूं, बच्चों को अलग नहीं करें : सरकारी शिक्षिका मां ने कहा कि एक मां से उसके बच्चों को अलग नहीं किया जाना चाहिए। मैं मां हूं, बच्चे मुझे ही मिलें।


बेटा बोला- मम्मा खेलने नहीं देती, पापा संग रहूंगा
कोर्ट ने बेटे से बात की तो पहले बोला पापा पसंद है। मां सामने आई तो बोला, दोनों के साथ रहना है लेकिन मम्मा खेलने नहीं देती इसलिए पापा संग रहूंगा। 

सीने से लिपट बेटी ने पोंछे मां के आंसू, फूट-फूटकर रोई
तीन महीने से पिता संग रह रही मासूम बेटी कोर्ट में लाई गई। मां को देख वह उनके सीने से लिपट गई। अपने नन्हें हाथों से मां के आंसू पोंछे। फिर दोनों एक-दूसरे को चूमकर फूट फूटकर रो पड़े। मां की गोद से पापा व दादी संग जाने को तैयार नहीं हुई। यह देख कोर्ट ने बेटी को मां के हवाले करने का आदेश दे दिया।

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