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Prayagraj News: पढ़ने की दीवानगी ने इलाहाबाद की लाइब्रेरी से जोड़ दिया प्रेमचंद का रिश्ता

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 08 Oct 2026 01:21 AM IST
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A passion for reading forged a connection between Premchand and the library in Allahabad.A passion for reading forged a connection between Premchand and the library in Allahabad.
पुण्यतिथि पर विशेष
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कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद को पढ़ाई के प्रति दीवानगी की हद तक प्रेम था। इसकी एक बानगी तब देखने को मिली जब वह कानपुर में रहते थे और उनकी ससुराल के लोग प्रयागराज में। वह भारती भवन से पुस्तकें लेना चाहते थे, किंतु पुस्तकालय शहर से बाहर किताबें नहीं भेजता था। तब प्रेमचंद ने कटरा स्थित ससुराल में रह रहे अपनी पत्नी के भाई (साले) को भारती भवन पुस्तकालय का सदस्य बनवा दिया। वह पुस्तकें अपने नाम से जारी करा प्रेमचंद को डाक से भेजने लगे। यह सिलसिला लंबे समय तक चला।


वैसे प्रेमचंद का इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से सबसे नजदीकी रिश्ता उनकी ससुराल की वजह से था। यद्यपि पत्नी शिवरानी देवी का मायका सलेमपुर, फतेहपुर में था किंतु उनके विवाह के बाद ससुर देवीप्रसाद अपने परिवार के साथ इलाहाबाद के पुराना कटरा में रहने लगे थे। जब भी प्रेमचंद यहां आते तो कटरा से एक आना इक्का भाड़ा देकर लोकनाथ स्थित भारती भवन पुस्तकालय जरूर जाते। आठ अक्तूबर को इन्हीं कलम के सिपाही प्रेमचंद की पुण्यतिथि है।
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इनसेट...

प्रेमचंद और प्रयागराज एक दूसरे की जन्मकुंडली में थे

शोधकर्ता व सरस्वती पत्रिका के संपादक डॉ. रविनंदन सिंह का मानना है कि प्रेमचंद और इलाहाबाद एक दूसरे की जन्मकुंडली में मौजूद थे। इलाहाबाद प्रेमचंद के राशिफल में था। इसलिए वो बार-बार यहां आते रहे। यद्यपि वाराणसी के पास लमही में उनका जन्म हुआ, लेकिन इलाहाबाद ने उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को दिशा दी। वर्ष 1887 में प्रेमचंद के पिता की तैनाती यहां के डाक विभाग में थी। प्रेमचंद की मां आनंदी देवी छह महीने से बीमार थीं। उस समय प्रेमचंद (तब धनपत राय) सात वर्ष के थे। धनपत मां के सिरहाने बैठे पंखा झलते। मां के पास ही एक शक्कर की बोतल रखी रहती थी। उनके सो जाने पर वह चुपके से शक्कर पर हाथ साफ कर देते।
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इलाहाबाद के निमंत्रण को वे कभी टाल नहीं पाते थे। 1934 में जब प्रेमचंद मुंबई सिनेमा जगत के अजंता सिनेटोन से जुड़कर कहानियां लिख रहे थे, तब 1 जुलाई 1934 को उन्होंने पत्नी को पत्र लिखकर बच्चों का दाखिला इलाहाबाद में कराने के लिए कहा। 1935 में मुंबई का काम छोड़ने के बाद प्रेमचंद ने इलाहाबाद में बसने की योजना बनाई थी। उस समय उनके दोनों पुत्र यहीं पढ़ाई कर रहे थे। आर्थिक कठिनाइयों तथा लगातार बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण उनकी योजना पूरी नहीं हो सकी। अंततः उन्हें बनारस लौटना पड़ा। इलाहाबाद ने प्रेमचंद पर इतना प्यार लुटाया कि उनकी अगली पीढ़ी (श्रीपतराय तथा अमृतराय) इलाहाबाद की ही हो गई।


औपचारिक लेखन इलाहाबाद से ही शुरू हुआ

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में इलाहाबाद के बौद्धिक वातावरण ने प्रेमचंद की रचनात्मक प्रतिभा को नई दिशा दी। डॉ. रविनंदन के मुताबिक 1902 में जब उन्हें अध्यापकीय ट्रेनिंग के लिए प्रतापगढ़ से इलाहाबाद भेजा गया तब ट्रेनिंग करते हुए यहीं उन्होंने अपना पहला उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ (देवस्थान का रहस्य) लिखना शुरू किया। उपन्यास लिखे जाने के दौरान बनारस से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र ‘आवाजे-ख़ल्क़’ में धारावाहिक रूप में भी छप रहा था। इस उपन्यास के लेखक का नाम था धनपत राय उर्फ ‘नवाबराय अलाहाबादी’।


ट्रेनिंग करते हुए प्रेमचंद ने 1902 हिंदी, उर्दू में वर्नाकुलर एग्जाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पास किया। अध्यापक की ट्रेनिंग खत्म होने के बाद प्रेमचंद प्रतापगढ़ में सर्विस ज्वाइन कर लिए। किंतु नौ महीने बाद 1905 में इलाहाबाद के मॉडल स्कूल के हेड मास्टर बनकर पुनः आ गए। इसी वर्ष उनका तबादला कानपुर हो गया। प्रेमचंद की कहानियों का पहला हिंदी संग्रह ‘सप्त सरोज’ की पहली समीक्षा इलाहाबाद की सरस्वती पत्रिका ने प्रकाशित की। इस संग्रह के बाद प्रेमचंद की कहानियों की ऐसी मांग बढ़ी कि जल्दी-जल्दी उनकी कहानियों के चार और संग्रह ’नवनिधि’, ’प्रेम पूर्णिमा’, ’प्रेम पचीसी’ और ’प्रेम बतीसी’ प्रकाशित हो गए।
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