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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   A journey from the Bakshi Bandh footpath to Moscow and Geneva—Dr. Rajesh Ranjan shares his memories.

प्रयागराज : बक्शी बांध की पगडंडी से मास्को-जेनेवा तक पहुंचा सफर, डॉ. राजेश रंजन ने साझा कीं यादें

Sun, 04 Oct 2026 06:33 PM IST
विनोद सिंह पुष्पा कुमारी, प्रयागराज
पुष्पा कुमारी, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 04 Oct 2026 06:33 PM IST
सार

एनी बेसेंट स्कूल के शताब्दी समारोह में शनिवार को पहुंचे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी व भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के उप महानिदेशक डॉ. राजेश रंजन से हुई खास बातचीत में अपने स्कूली दिनों से लेकर विदेश सेवा तक के सफर के अनुभव साझा किए।

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A journey from the Bakshi Bandh footpath to Moscow and Geneva—Dr. Rajesh Ranjan shares his memories.
डॉ. राजेश रंजन (बाएं) के साथ प्रोफेसर डॉ. एसएन लाल और डॉ. अनूप कुमार सिंह। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

एनी बेसेंट स्कूल के शताब्दी समारोह में शनिवार को पहुंचे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी व भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के उप महानिदेशक डॉ. राजेश रंजन से हुई खास बातचीत में अपने स्कूली दिनों से लेकर विदेश सेवा तक के सफर के अनुभव साझा किए। मूलरूप से अल्लापुर के रहने वाले डॉ. रंजन ने बताया कि वर्ष 1983-84 में कक्षा चार में स्कूल में प्रवेश लिया और आठवीं तक पढ़ाई की। स्कूल ने उन्हें शिक्षा के साथ अनुशासन, संस्कार और जीवनभर की दोस्ती दी। 

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सवाल : एनी बेसेंट स्कूल में कब से कब तक पढ़े?

वर्ष 1983-84 में कक्षा चार में प्रवेश लिया और कक्षा आठवीं तक यहीं पढ़ाई की। यह मेरे जीवन के सबसे यादगार वर्ष रहे। मित्रों के साथ बक्शी बांध के रास्ते पैदल स्कूल जाना, अब भी याद है।

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सवाल : उच्च शिक्षा कहां से ली?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की पढ़ाई और सार्वजनिक वित्त पर पीएचडी की। प्रो. एसएन लाल ने अर्थशास्त्र को समझने की ऐसी दृष्टि दी जो आगे विदेश सेवा में भी काम आई।

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सवाल : विदेश सेवा में जाने की प्रेरणा कैसे मिली?

प्रयागराज में प्रतियोगी परीक्षाओं का माहौल और घर-स्कूल से मिले अनुशासन ने प्रेरित किया। ऐसा लगा कि अर्थशास्त्र की समझ को देशहित में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद विदेश सेवा में देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।

सवाल : आपका चयन किस बैच में हुआ और पहली पोस्टिंग कहां मिली?

मैं वर्ष 2001 बैच का भारतीय विदेश सेवा अधिकारी हूं। दिसंबर 2001 में सेवा में शामिल हुआ। प्रशिक्षण के बाद पहली पोस्टिंग मास्को स्थित भारतीय दूतावास में हुई। इसके बाद सेंट पीटर्सबर्ग में कौंसल के रूप में भी काम किया।

सवाल : विदेश सेवा का सबसे यादगार अनुभव कौन-सा रहा?

मास्को की पहली पोस्टिंग हमेशा याद रहेगी। जेनेवा में श्रम, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर बहुपक्षीय वार्ताओं में भारत का पक्ष रखने का अवसर मिला। अमेरिका प्रभाग में निदेशक के रूप में भारत-अमेरिका और भारत-कनाडा संबंधों पर काम करना भी महत्वपूर्ण अनुभव रहा।

सवाल : प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को क्या संदेश देंगे?

नियमित और अखबार पढ़ने के साथ अपनी राय बनाना सीखें। लेखन और बोलने का अभ्यास करें। अपनी कमजोरियों का ईमानदारी से आकलन कर असफलता से निराश न हों। सेवा का अर्थ केवल पद पाना नहीं बल्कि जिम्मेदारी निभाना है।

सवाल : एनी बेसेंट स्कूल ने क्या दिया और इतने वर्षों बाद स्कूल लौटकर कैसा लगा?

स्कूल ने शिक्षा के साथ संस्कार और अनुशासन दिया। शिक्षकों ने विषयों की मजबूत नींव रखी। सबसे खास बात है कि दीपक कुमार पांडे, अनूप कुमार सिंह, कन्हैया लाल बर्नवाल और शशिकांत प्रसाद जैसे दोस्त मिले। इतने वर्षों बाद स्कूल लौटकर ऐसा लगा जैसे समय पीछे लौट आया हो।

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