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सहालग सिर पर, परख कर खरीदें आभूषण
Allahabad
Updated Sat, 08 Nov 2014 05:30 AM IST
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इलाहाबाद। सहालग के दिन करीब हैं। वर-वधू के लिए स्वर्णाभूषण खरीदने वाले परिजनों का साथ देने के लिए बाजार में कीमतें भी गिरी हैं लेकिन मार्केट में एकरूपता न होने के कारण खरीदारों के ठगे जाने का खतरा भी बना हुआ है। ग्राहकों का कसूर यह है कि ज्यादातर लोग गहनों की खरीदारी बेचने या निवेश के लिए नहीं करते। वह इसे भविष्य की निधि मानकर सुरक्षित रखते हैं। ठगे जाने का अहसास तब होता है जब वह 15-20 साल बाद जरूरत या मुसीबत के वक्त बिक्री के लिए किसी दुकान पर जाते हैं तो पता चलता है कि सोने के दाम में तांबा खरीदा है। ऐसे में ग्राहकों के लिए यह जानना जरूरी है कि वह जो भी ज्वैलरी खरीद रहे हैं उसमें सोने की मात्रा जरूर परखें। केवल सुनार के दावे पर भरोसा न करें। ग्राहकों की जागरूकता और उनके रुपये की पूरी कीमत वसूल कराने के लिए ‘अमर उजाला’ ने सराफा बाजार की पड़ताल की। इसमें सुनारों ने हॉलमार्क ज्वैलरी खरीदने की वकालत की। वजह, बिना स्टैंप वाले गहनों में 30-35 फीसदी तक मिलावट की आशंका जताई गई।
ग्रामीण क्षेत्रों में कहावत है कि सोना सुनार का है। दस बार गहना बदलो तो गहने की कीमत के बराबर रकम सुनार वसूल लेते हैं। 90 फीसदी से ज्यादा मार्केट पर काबिज परंपरागत सराफा बाजार में यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ दिखती है। बताते हैं कि 18 कैरेट की ज्वैलरी में 70 फीसदी ही सोना है। कुछ दुकानदार 16 कैरेट यानी 60 फीसदी सोने वाली ज्वैलरी भी बना रहे हैं। जानकार बताते हैं कि ऐसी ज्वैलरी खरीदने में ग्राहक दो स्तरों पर ठगे जा रहे हैं। पहले खरीदारी के वक्त पूरे वजन की रकम चुकाते है। दूसरे, किसी दूसरी दुकान पर बिक्री के वक्त ज्वैलरी में इस्तेमाल 60, 70, 75 या अधिकतम 80 फीसदी सोने की ही कीमत मिलती है। इस कमी को छिपाने के लिए दुकानदार लालच देते हैं। सराफा दुकानदार संदीप वैश्य का कहना है कि जिस दुकान से ज्वैलरी खरीदी गई है उसी पर बदलने में 10 फीसदी और रकम वापस लेने पर 20 फीसदी की ही कटौती है। हालांकि, सराफा का अघोषित नियम है कि दूसरी दुकान की ज्वैलरी की 75 फीसदी से ज्यादा रकम नहीं लौटाई जाएगी।
हॉलमार्क ज्वैलरी को बेचने पर भी नुकसान है लेकिन इसकी मात्रा तय है। चड्डा ज्वैलर्स के राकेश चड्ढा का दावा है कि हॉलमार्क स्टैंप लगी ज्वैलरी के बदले दूसरे गहने लेने पर 100 फीसदी वापसी है। इसमें कटौती नहीं की जाती, लेकिन मेकिंग चार्ज देना पड़ता है। ज्वैलरी बेचने पर 91.6 फीसदी रकम वापस मिलती है। हालांकि, गैर दुकान पर हॉलमार्क ज्वैलरी बेचने पर सामान्यतौर पर दुकानदार 10 फीसदी की कटौती कर लेते हैं।
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हॉलमार्क को सरकारी स्टैंप और शुद्धता की गारंटी के रूप में माना जाता है। स्टैंप लगी ज्वैलरी में न्यूनतम 90.5 फीसदी सोना बताया जाता है। स्टैंप लगे गहने बेचने वाले दुकानदार 150 से 700 रुपये प्रति ग्राम की दर से मेकिंग चार्ज वसूलते हैं। सो, परंपरागत गहनों की तुलना में यह करीब 10-15 फीसदी तक महंगा पड़ता है लेकिन पूरे देश में इसकी शुद्धता मान्य है। सराफा कारोबारी विष्णु अग्रवाल का दावा है कि ग्राहकों के हित में हॉलमार्क ज्वैलरी है।
शहर में गहनों की शुद्धता जांचने का कोई इंतजाम नहीं है। निजी फर्में शुद्धता की जांच करती हैं लेकिन उनकी जांच केमिकल आधारित यानी पुरानी है। कानपुर, दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में जांच का काम कंप्यूटराइज्ड है। हॉलमार्क की मोहर भी स्थानीय स्तर पर नहीं लगती।
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ग्रामीण क्षेत्रों में कहावत है कि सोना सुनार का है। दस बार गहना बदलो तो गहने की कीमत के बराबर रकम सुनार वसूल लेते हैं। 90 फीसदी से ज्यादा मार्केट पर काबिज परंपरागत सराफा बाजार में यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ दिखती है। बताते हैं कि 18 कैरेट की ज्वैलरी में 70 फीसदी ही सोना है। कुछ दुकानदार 16 कैरेट यानी 60 फीसदी सोने वाली ज्वैलरी भी बना रहे हैं। जानकार बताते हैं कि ऐसी ज्वैलरी खरीदने में ग्राहक दो स्तरों पर ठगे जा रहे हैं। पहले खरीदारी के वक्त पूरे वजन की रकम चुकाते है। दूसरे, किसी दूसरी दुकान पर बिक्री के वक्त ज्वैलरी में इस्तेमाल 60, 70, 75 या अधिकतम 80 फीसदी सोने की ही कीमत मिलती है। इस कमी को छिपाने के लिए दुकानदार लालच देते हैं। सराफा दुकानदार संदीप वैश्य का कहना है कि जिस दुकान से ज्वैलरी खरीदी गई है उसी पर बदलने में 10 फीसदी और रकम वापस लेने पर 20 फीसदी की ही कटौती है। हालांकि, सराफा का अघोषित नियम है कि दूसरी दुकान की ज्वैलरी की 75 फीसदी से ज्यादा रकम नहीं लौटाई जाएगी।
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हॉलमार्क ज्वैलरी को बेचने पर भी नुकसान है लेकिन इसकी मात्रा तय है। चड्डा ज्वैलर्स के राकेश चड्ढा का दावा है कि हॉलमार्क स्टैंप लगी ज्वैलरी के बदले दूसरे गहने लेने पर 100 फीसदी वापसी है। इसमें कटौती नहीं की जाती, लेकिन मेकिंग चार्ज देना पड़ता है। ज्वैलरी बेचने पर 91.6 फीसदी रकम वापस मिलती है। हालांकि, गैर दुकान पर हॉलमार्क ज्वैलरी बेचने पर सामान्यतौर पर दुकानदार 10 फीसदी की कटौती कर लेते हैं।
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हॉलमार्क को सरकारी स्टैंप और शुद्धता की गारंटी के रूप में माना जाता है। स्टैंप लगी ज्वैलरी में न्यूनतम 90.5 फीसदी सोना बताया जाता है। स्टैंप लगे गहने बेचने वाले दुकानदार 150 से 700 रुपये प्रति ग्राम की दर से मेकिंग चार्ज वसूलते हैं। सो, परंपरागत गहनों की तुलना में यह करीब 10-15 फीसदी तक महंगा पड़ता है लेकिन पूरे देश में इसकी शुद्धता मान्य है। सराफा कारोबारी विष्णु अग्रवाल का दावा है कि ग्राहकों के हित में हॉलमार्क ज्वैलरी है।
शहर में गहनों की शुद्धता जांचने का कोई इंतजाम नहीं है। निजी फर्में शुद्धता की जांच करती हैं लेकिन उनकी जांच केमिकल आधारित यानी पुरानी है। कानपुर, दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में जांच का काम कंप्यूटराइज्ड है। हॉलमार्क की मोहर भी स्थानीय स्तर पर नहीं लगती।