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दूध पी ले सांप तो होगा इंफेक्शन, मौत
Allahabad
Updated Sat, 02 Aug 2014 05:30 AM IST
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इलाहाबाद। नागपंचमी पर शुक्रवार को मंदिरों, मेलों से इतर घर-घर जाकर सपेरों की टोली सांप के दर्शन कराती और उन्हें दूध पिलाने के लिए दान मांगती रही लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि सांप दूध पीते ही नहीं। जंतुओं पर काम करने वाले विशेषज्ञ, डॉक्टर्स और खुद सपेरे भी स्वीकार करते हैं कि सांप ने अगर दूध पी लिया तो उसकी आंतों में इंफेक्शन हो जाएगा और जल्द ही वह मर जाएगा।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जीव विज्ञान की प्रोफेसर अनिता गोपेश के मुताबिक सांप पूरी तरह से मांसाहारी होता और चूहे, कीड़े-मकोड़े, मछलियां आदि खाता है। दूध उसके लिए जहर समान है। सांप की सुनने की क्षमता नहीं होती, वह सिर्फ बीन से निकली तरंगों को महसूस करके बीन के साथ डोलता है। आयुर्वेदाचार्य डॉ.एसके राय ने बताया कि सांप ऐसी चीजें ग्रहण करते हैं, जो न अम्लीय और न ही क्षारीय हों। दूध की प्रकृति बीच की है, ऐसे में यदि उसने दूध पी भी लिया तो उसके आंतों में इंफेक्शन हो जाएगा। दूध की मात्रा थोड़ी भी बढ़ी तो सांप की मौत हो जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर सांपों का शो करने वाले भवर बावरा ने भी इस परंपरा को पूरी तरह भ्रांति बताया।
पर्यावरणविद इस पंरपरा को पारिस्थितिक संतुलन से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि सांप ऐसा प्राणी है जिसे पानी के भीतर सांस लेने में मुश्किल आती है। बारिश में जैसे ही बिल में पानी घुसता है, वे बिलों से बाहर निकल आते हैं। बड़ी संख्या में सांप निकलने पर लोग उन्हें मार देंगे, इसीलिए ऋषियों ने उन्हें दूध-लावा चढ़ाने की परंपरा शुरू की ताकि सांपों का जीवन और पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।
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सांपों के जादूगर माने जाने वाले चौफटका निवासी लल्लू सपेरे की माने तो इलाहाबाद में कोबरा, करइत, अजगर, घोड़ा पछाड़-धामिन, गेहुंअन, दोमुंहा, मगरगो, शिवनाथर सहित सांपों की 116 जातियां मिलती हैं, लेकिन इनमें से केवल पांच फीसदी विषैली होती हैं। उसने माना कि कोबरा और करइत की संख्या तेजी से कम हो रही है। लल्लू ने बताया कि केंचुल से नासूर के इलाज की दवा बनती है सो इसकी मांग ज्यादा है।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जीव विज्ञान की प्रोफेसर अनिता गोपेश के मुताबिक सांप पूरी तरह से मांसाहारी होता और चूहे, कीड़े-मकोड़े, मछलियां आदि खाता है। दूध उसके लिए जहर समान है। सांप की सुनने की क्षमता नहीं होती, वह सिर्फ बीन से निकली तरंगों को महसूस करके बीन के साथ डोलता है। आयुर्वेदाचार्य डॉ.एसके राय ने बताया कि सांप ऐसी चीजें ग्रहण करते हैं, जो न अम्लीय और न ही क्षारीय हों। दूध की प्रकृति बीच की है, ऐसे में यदि उसने दूध पी भी लिया तो उसके आंतों में इंफेक्शन हो जाएगा। दूध की मात्रा थोड़ी भी बढ़ी तो सांप की मौत हो जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर सांपों का शो करने वाले भवर बावरा ने भी इस परंपरा को पूरी तरह भ्रांति बताया।
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पर्यावरणविद इस पंरपरा को पारिस्थितिक संतुलन से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि सांप ऐसा प्राणी है जिसे पानी के भीतर सांस लेने में मुश्किल आती है। बारिश में जैसे ही बिल में पानी घुसता है, वे बिलों से बाहर निकल आते हैं। बड़ी संख्या में सांप निकलने पर लोग उन्हें मार देंगे, इसीलिए ऋषियों ने उन्हें दूध-लावा चढ़ाने की परंपरा शुरू की ताकि सांपों का जीवन और पारिस्थितिक संतुलन बना रहे।
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सांपों के जादूगर माने जाने वाले चौफटका निवासी लल्लू सपेरे की माने तो इलाहाबाद में कोबरा, करइत, अजगर, घोड़ा पछाड़-धामिन, गेहुंअन, दोमुंहा, मगरगो, शिवनाथर सहित सांपों की 116 जातियां मिलती हैं, लेकिन इनमें से केवल पांच फीसदी विषैली होती हैं। उसने माना कि कोबरा और करइत की संख्या तेजी से कम हो रही है। लल्लू ने बताया कि केंचुल से नासूर के इलाज की दवा बनती है सो इसकी मांग ज्यादा है।