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हमले से आहत विवि शिक्षकों ने निकाला जुलूस
Allahabad
Updated Wed, 04 Dec 2013 05:41 AM IST
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इलाहाबाद। छात्रों ने मारपीट की और दुर्व्यवहार किया लेकिन विश्वविद्यालय ने सुना नहीं, इससे क्षुब्ध-हैरान और नाराज शिक्षकों ने परिसर में मौन जुलूस निकाला। उन्हाेंने सीनेट परिसर से विज्ञान संकाय तक मार्च भी किया। इस दौरान उनके हाथों में बैनर भी था। विश्वविद्यालय के कर्मचारी और छात्र-छात्राएं ही नहीं आम लोगों के लिए भी यह दृश्य हतप्रभ करने वाला रहा। सभी के जुबान और चेहरों पर यही सवाल था, आखिर विश्वविद्यालय को यह क्या हो गया है। विश्वविद्यालय में ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण नजारा 1993 के बाद देखने को मिला था। चौंकाने वाली बात यह भी है वरिष्ठ प्रोफेसर के सड़क पर आने के बाद भी प्रशासन निरंकुश बना हुआ है और किसी आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। पांच दिन बाद भी विश्वविद्यालय और जिला प्रशासन के सामने हमलावरों की पहचान का संकट खड़ा है।
कुछ अराजक तत्वों ने 29 नवंबर को जेके इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर आरआर तिवारी, प्रोफेसर सीके द्विवेदी समेत अनेक शिक्षकों और कर्मचारियों की पिटाई कर दी थी। इसके विरोध में शिक्षक सोमवार से हड़ताल पर हैं। इसके बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई। इससे नाराज शिक्षकों ने पहले सभा की। फिर मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग से पूरे परिसर में जुलूस निकाला। सभी शिक्षक दो कतार में और खामोश थे लेकिन उनके चेहरे से झलक रही निराशा और आक्रोश उनकी पीड़ा बता रहे थे। विधि विभाग के प्रोफेसर एलएम सिंह अस्वस्थ होने के कारण चलने में असमर्थ थे। उन्हें मोटरसाइकिल पर लेकर हमलावरों के शिकार प्रोफेसर सीके द्विवेदी आगे-आगे चल रहे थे। पहले लगा यह दृश्य कुलपति कार्यालय के सामने रुक जाएगा लेकिन नहीं, रजिस्ट्रार ऑफिस, छात्रसंघ भवन से हुए परिसर से बाहर निकल गया। कतारबद्ध होकर शिक्षक विश्वविद्यालय मार्ग से विज्ञान संकाय परिसर की तरफ चल पड़े। शिक्षकों को इस रूप में देखकर लोग भी सड़कों की दोनों तरफ खड़े हो गए। शिक्षक मार्च करते हुए जेके इंस्टीट्यूट पहुंचे। वहां सभा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने कहा, ‘शिक्षक समुदाय को यह विश्ववास था कि व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदार लोग इस नकारात्मक प्रवृत्ति पर स्वयं रोक लगाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यही वजह है कि विश्वविद्यालय के समक्ष उत्पन्न हुई चुनौतियों का मुकाबला करने का निर्णय शिक्षकों ने लिया है और लगभग दो दशक बाद इस अभियान को समाज के बीच ले जाने तथा निर्णायक संघर्ष के लिए कदम आगे बढ़ाया है। यह आंदोलन सिर्फ दो शिक्षकों के साथ हुई हिंसा के विरुद्ध नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय की अस्मिता और उसकी गरिमा और सम्मान से जुड़ा है, इससे वापस हटने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।’ आटा अध्यक्ष ने शिक्षकों से बुधवार को दिन में 11 बजे मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के सामने एकत्रित होने की अपील की। इसके बाद शिक्षक फिर उसी तरह से कतारबद्ध होकर सीनेट परिसर वापस हो गए। सभा तथा जुलूस में कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर एनआर फारूकी, कई डीन्स, विभागाध्यक्ष समेत अधिकतर शिक्षक शामिल रहे। हालांकि बॉटनी विभाग में आयोजित कार्यशाला में शामिल होने के कारण प्रोफेसर फारूकी को बीच में ही जाना पड़ा। रजिस्ट्रार प्रोफेसर बीपी सिंह तथा डीएसडब्ल्यू प्रोफेसर जगदम्बा सिंह शहर से बाहर हैं। इसलिए ये लोग आंदोलन में शामिल नहीं हो सके लेकिन इनके समर्थन की बात कही जा रही है।
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कुछ अराजक तत्वों ने 29 नवंबर को जेके इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर आरआर तिवारी, प्रोफेसर सीके द्विवेदी समेत अनेक शिक्षकों और कर्मचारियों की पिटाई कर दी थी। इसके विरोध में शिक्षक सोमवार से हड़ताल पर हैं। इसके बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई। इससे नाराज शिक्षकों ने पहले सभा की। फिर मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग से पूरे परिसर में जुलूस निकाला। सभी शिक्षक दो कतार में और खामोश थे लेकिन उनके चेहरे से झलक रही निराशा और आक्रोश उनकी पीड़ा बता रहे थे। विधि विभाग के प्रोफेसर एलएम सिंह अस्वस्थ होने के कारण चलने में असमर्थ थे। उन्हें मोटरसाइकिल पर लेकर हमलावरों के शिकार प्रोफेसर सीके द्विवेदी आगे-आगे चल रहे थे। पहले लगा यह दृश्य कुलपति कार्यालय के सामने रुक जाएगा लेकिन नहीं, रजिस्ट्रार ऑफिस, छात्रसंघ भवन से हुए परिसर से बाहर निकल गया। कतारबद्ध होकर शिक्षक विश्वविद्यालय मार्ग से विज्ञान संकाय परिसर की तरफ चल पड़े। शिक्षकों को इस रूप में देखकर लोग भी सड़कों की दोनों तरफ खड़े हो गए। शिक्षक मार्च करते हुए जेके इंस्टीट्यूट पहुंचे। वहां सभा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने कहा, ‘शिक्षक समुदाय को यह विश्ववास था कि व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदार लोग इस नकारात्मक प्रवृत्ति पर स्वयं रोक लगाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यही वजह है कि विश्वविद्यालय के समक्ष उत्पन्न हुई चुनौतियों का मुकाबला करने का निर्णय शिक्षकों ने लिया है और लगभग दो दशक बाद इस अभियान को समाज के बीच ले जाने तथा निर्णायक संघर्ष के लिए कदम आगे बढ़ाया है। यह आंदोलन सिर्फ दो शिक्षकों के साथ हुई हिंसा के विरुद्ध नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय की अस्मिता और उसकी गरिमा और सम्मान से जुड़ा है, इससे वापस हटने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।’ आटा अध्यक्ष ने शिक्षकों से बुधवार को दिन में 11 बजे मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के सामने एकत्रित होने की अपील की। इसके बाद शिक्षक फिर उसी तरह से कतारबद्ध होकर सीनेट परिसर वापस हो गए। सभा तथा जुलूस में कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर एनआर फारूकी, कई डीन्स, विभागाध्यक्ष समेत अधिकतर शिक्षक शामिल रहे। हालांकि बॉटनी विभाग में आयोजित कार्यशाला में शामिल होने के कारण प्रोफेसर फारूकी को बीच में ही जाना पड़ा। रजिस्ट्रार प्रोफेसर बीपी सिंह तथा डीएसडब्ल्यू प्रोफेसर जगदम्बा सिंह शहर से बाहर हैं। इसलिए ये लोग आंदोलन में शामिल नहीं हो सके लेकिन इनके समर्थन की बात कही जा रही है।
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