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इसी छात्रसंघ के लिए संघर्ष हुआ था क्या
Allahabad
Updated Tue, 03 Sep 2013 05:35 AM IST
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इलाहाबाद। छात्रसंघ अध्यक्ष निष्कासित, महामंत्री जेल में, बाकी के पदाधिकारी लगभग निष्क्रिय! कुछ सक्रिय दिखे भी तो मुद्दों से इतर। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 91 साल पुराने इलाहाबाद विश्वविद्यालय यूनियन की गौरवशाली गाथा में इस तरह का कलंक लगेगा। परिसर में लोकतंत्र की बहाली के लिए सात साल संघर्ष करना पड़ा। इसके लिए छात्र नेताओं ने जान भी जोखिम में डाला। राहुल गांधी के हस्तक्षेप पर छात्रनेताओं की मानव संसाधन विकास मंत्री तक से वार्ता हुई। लंबे संघर्ष के बाद परिसर में पिछले साल छात्रसंघ बहाल हुआ। इससे छात्र-छात्राओं ही नहीं शिक्षकों और कर्मचारियों को भी ढेरों उम्मीदें थी कि परिसर के हालात सुधरेंगे लेकिन सभी पदाधिकारियों से धोखा मिला। इस साल फिर छात्रसंघ चुनाव का मंच सजने लगा है और एक महीने से भी कम समय शेष है लेकिन छात्र-छात्राओं में इसको लेकर निराशा और नेताआें के प्रति गुस्सा है। विद्यार्थियों का कहना है कि लाइब्रेरी, नियमित कक्षाएं, सुरक्षा जैसे मुद्दों के लिए संघर्ष तो दूर इन नेताओं का पूरा वक्त खुद को साबित करने में बित गया। अब तो विद्यार्थी खुद से सवाल करने लगे हैं कि क्या उन्होंने ऐसे ही छात्रसंघ के लिए संघर्ष किया था। छात्र-छात्राओं के मन में छात्रसंघ को लेकर तमाम सवाल हैं। उन्हीं सवालों, समस्याआें, नए छात्रसंघ से उम्मीद समेत तमाम मसलों पर अमर उजाला ने विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों से बात की। विद्यार्थियों की राय, उनके सवालों में मन की हलचल साफ दिखती है। पिछले सत्र में सात साल के लंबे संघर्ष के बाद विश्वविद्यालय और कालेजों में छात्रसंघ बहाल हुआ लेकिन इसे कोई भी याद करना नहीं चाहेगा। फर्जीवाड़ा करने के आरोप में हाईकोर्ट ने अध्यक्ष दिनेश यादव का निर्वाचन अवैध कर दिया तो जेल से चुनाव लड़ने वाले महामंत्री अभिषेक सिंह माइकल अब भी बाहर नहीं निकल पाए हैं। कुलपति कार्यालय में तोड़फोड़ तथा पीए और गार्ड की पिटाई के मामले में उपाध्यक्ष शालू यादव भी निलंबित हैं। ऐसे में छात्र-छात्राओं की समस्याओं को उठाने की जिम्मेदारी संयुक्त मंत्री गया प्रसाद तथा सांस्कृतिक सचिव देवमणि मिश्रा के ऊपर थी लेकिन ये दोनों नेता पूरे सत्र में किसी निर्णय पर नहीं पहुुंच सके और विद्यार्थियों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। छात्र-छात्राओं का दुर्भाग्य यह कि इससे पहले 2005 में अध्यक्ष चुने गए अजीत का निर्वाचन भी हाईकोर्ट ने अवैध कर दिया था। परिसर में छात्रसंघ की बहाली के लिए लंबा संघर्ष हुआ। इस दौरान छात्रों ने कई बार लाठियां खाईं। इस लड़ाई में छात्र-छात्राओं के अलावा छात्रसंघ के पुराने पदाधिकारियों ने भी साथ दिया। अभिषेक सिंह यादव, विवेकानंद पाठक समेत कई छात्र नेताओं ने आठ दिनों तक अनशन किया। राहुल गांधी की रैली के दौरान अभिषेक समेत कई छात्र नेताओं ने हेलीपैड में घुसकर अपनी जान भी जोखिम में डाली। इसी मामले में केंद्रीय राज्य मंत्री आरपीएन सिंह, जितेंद्र प्रसाद, प्रमोद तिवारी, नसीब पठान आदि नेताओं के खिलाफ मुकदमा भी चला। छात्रों केइस तीव्र आंदोलन के बाद केंद्र सरकार को भी हस्तक्षेप करना पड़ा तथा दिल्ली तलब किए कुलपति को रात में नौ बजे वहीं से छात्रसंघ बहाली की घोषणा करनी पड़ी थी। पिछले छात्रसंघ के इस हश्र को लेकर छात्र-छात्राओं में शिक्षकों की भूमिका को लेकर भी नाराजगी है। छात्रों का कहना है कि शिक्षकों ने अपराधी प्रवृत्ति तथा झूठ बोलकर चुनाव लड़ने वालों को रोक दिया होता तो इस तरह का कलंक नहीं लगता। छात्रों का यह भी कहना है कि मुश्किल यह है कि हाईकोर्ट में फटकार पाने वाले उन शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें नई जिम्मेदारी देकर उपकृत भी किया जा रहा है। ऐसे में सुधार की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का 91 साल पुराना और गौरवमयी इतिहास है। छात्र-छात्राओं को आवाज उठाने के लिए मंच प्रदान करने तथा उनकी नेतृत्व क्षमता को विकसित करने के मकसद से 1921 में विश्वविद्यालय को शैक्षिक परिसर घोषित करने के दो साल बाद ही 1923 में ‘इलाहाबाद विश्वविद्यालय यूनियन’ की नींव पड़ी। पहले साल हुए तीन चुनावों में एसबी तिवारी, बीएन कौल और सैयद नसीर अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद इस छात्रसंघ ने देश को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री ही नहीं प्रख्यात शिक्षा, कानूनविद भी दिए हैं। 1942 में लाल पद्मधर शहादत स्वतंत्रता संग्राम में छात्रसंघ की भूमिका को बयां करता है तो 1967 का ‘हिन्दी आंदोलन’, 1980 का ‘शिक्षा मौलिक अधिकार में शामिल हो’ आदि आंदोलनों की शुरुआत भी इसी विश्वविद्यालय से हुई थी जिसकी लपट पूरे देश में फैली। इमरजेंसी के बाद ‘बोफोर्स घोटाला’ को लेकर चले आंदोलन और ‘मंडल कमीशन’ को सबसे बड़े सामाजिक परिवर्तन के तौर पर देखा जाता है। दोनों ही आंदोलन के अगुआ पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह इसी छात्रसंघ के उपाध्यक्ष रहे। संसद और विधानमंडल में एक निश्चित सीमा के अंदर मंत्रीमंडल के विस्तार जैसे कई अहम निर्णयों में मुख्य भूमिका निभाने वाले कानून विशेषज्ञ सुभाष कश्यप भी इसी छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे। शिक्षा के आधुनिक स्वरूप का जिक्र होते ही प्रोफेसर डीएस कोठारी का नाम सबसे पहले आता है। वह भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पदाधिकारी रहे। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी, मदन लाल खुराना, मोहन सिंह समेत कई नाम हैं जिन्होंने देश की राजनीतिक और सामाजिक बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस साल भी छात्रसंघ चुनाव का बिगुल बज चुका है। पिछले साल के कटु अनुभव को देखते हुए परिसर में एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि नया छात्रसंघ आधुनिक भारत का निर्माण करने वाले इन पुरोधाओं की परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्षम होगा?
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