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मिड डे मील के नाम पर मिल रहा केवल ‘प्रसाद’
Allahabad
Updated Thu, 02 May 2013 05:30 AM IST
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इलाहाबाद। घरेलू उपयोग की चीजें महंगी होने को लेकर काफी होहल्ला मचा है। सरकार भी पेट्रोल, डीजल पर टिप्पणी देकर महंगाई के मुद्दे को टाल जाती है लेकिन प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे उन मामूमों पर सरकार की नजर नहीं है जो दोपहर भोजन की आस में घंटों इंतजार करते हैं। बजट की कमी के कारण ज्यादातर स्कूलों में भोजन नहीं बन रहा या फिर केवल खिचड़ी बनाकर बला टाली जा रही है। खिचड़ी भी बस इतनी कि प्रसाद की तरह बांट दी जाए।
मिड डे मील के लिए सरकार जो बजट दे रही है, उसमें मानक के हिसाब से भोजन बन भी नहीं सकता। सरकार की तरफ से एक बच्चे के एक दिन के भोजन के बदले केवल तीन रुपये 34 पैसे निर्धारित हैं। बजट और मेनू का औसत सौ बच्चों के हिसाब से बनाया गया है। सौ बच्चों के बदले प्रतिदिन 334 रुपये स्कूलों को मिलते हैं लेकिन महंगाई इस कदर बढ़ी है कि इस बजट में मेनू के मुताबिक तो दूर, केवल खिचड़ी देना भी मुश्किल है।
प्राथमिक विद्यालयों में भोजन के मद में सौ बच्चों के लिए कनवर्जन कास्ट के तौर पर 334 रुपये मिलते हैं लेकिन इस बजट का बड़ा हिस्सा तो रसोई गैस में चला जाता है। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में जहां रसोई गैस आसानी से नहीं मिल पाती, वहां लकड़ी जलाकर भोजन पकाया जाता है जिसमें इससे ज्यादा रकम खर्च होती है। प्राथमिक विद्यालय कारों, प्राथमिक विद्यालय बनकट, पूर्व माध्यमिक विद्यालय अगवान के प्रधानाध्यापकों ने सौ बच्चों पर खर्च का बजट तैयार किया है। बताया कि यदि सौ बच्चों के लिए केवल खिचड़ी महीने में 20 दिन बने तो दस हजार रुपये से कम खर्च नहीं बैठता जबकि 20 दिन के हिसाब से मिलता है केवल लगभग सात हजार रुपये। लगभग डेढ़ से दो हजार रुपये तो रसोई गैस पर ही खर्च हो जाते हैं। यानी भोजन के मद का बड़ा हिस्सा तो गैस में निकल जा रहा।
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प्राथमिक विद्यालय बनखेसरा के प्रधानाध्यापक रवि तिवारी, नौगवां की अलका पांडेय, ज्योतिपुर की विद्या देवी ने माना कि बजट के अभाव में बच्चों को मानक से काफी कम भोजन दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि चावल मुफ्त में मिल जाता है इसलिए ज्यादातर विद्यालयों में हफ्ते में चार दिन खिचड़ी बनाई जाती है। खिचड़ी में आंशिक दाल और दो-चार आलू डाल दिया जाता है।
मिड डे मील की लिस्ट में दाल, रोटी, सब्जी, खीर, कढ़ी समेत तमाम व्यंजन हैं और वह भी केवल तीन रुपये में। इस बजट में ये सामग्री देख कोई भी हैरान हो सकता है लेकिन सर्व शिक्षा अभियान के अधिकारियों को कोई अचंभा नहीं दिखता। महंगाई का आलम यह है कि लगभग सभी जरूरी चीजों के दाम दोगुने-तीनगुने हो गए हैं। रसोई गैस, दाल, सरसो तेल, घी, मसाले की कीमतें पिछले चार महीनों में 15 फीसदी से अधिक हो गईं लेकिन मिड डे मील का बजट नहीं बढ़ा। मात्र तीन रुपये 34 पैसे में बच्चों को एक वक्त का भोजन देने का बजट किस सोच से तैयार किया गया, कैसे सरकार ने इसे पास कर दिया, समझ से परे है।
जरा एक दिन का सबसे सरल मेनू देखिए। बुधवार को बच्चों को कढ़ी चावल या खीर देने का प्रावधान है। यदि कढ़ी बने तो सौ बच्चों के लिए विभाग ने ढाई किलो बेसन, 500 ग्राम तेल, मसाला तय किया है और यदि खीर बने तो दस लीटर दूध, तीन किलोग्राम चीनी। दस लीटर दूध यानी औसतन 300 रुपये और तीन किलोग्राम चीनी यानी 120 रुपये। यानी सौ बच्चों को केवल खीर दी जाए तो केवल सामान के 420 रुपये चाहिए जबकि विभाग की तरफ से केवल 334 रुपये तय है। इसमें अन्य कोई खर्च शामिल नहीं है। जाहिर है कि दोपहर भोजन में केवल खीर देना है तो भी तीन रुपये प्रति छात्र की दर से संभव नहीं है।
मेनू में नहीं पर अक्सर मिलती है खिचड़ी
स्कूलों में बच्चों को तय भोजन के बजाय अक्सर खिचड़ी ही दी जाती है क्योंकि उसका बजट कम है। जबकि खिचड़ी मेनू में है ही नहीं। खिचड़ी बनाने के लिए चावल अलग से मिलता है। उसमें दिखाने भर को दाल, दो-चार आलू डाल दिए, हो गया।
‘रसोई गैस पर सब्सिडी के लिए मिड डे मील प्राधिकरण को प्रस्ताव भेजा गया है। शासन स्तर से बातचीत जारी है। उम्मीद है कि रसोई गैस पर सब्सिडी मिलेगी। इससे तय कनवर्जन कास्ट में निर्धारित भोजन उपलब्ध हो सकेगा।’
राजीव त्रिपाठी, जिला समन्वयक
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मिड डे मील के लिए सरकार जो बजट दे रही है, उसमें मानक के हिसाब से भोजन बन भी नहीं सकता। सरकार की तरफ से एक बच्चे के एक दिन के भोजन के बदले केवल तीन रुपये 34 पैसे निर्धारित हैं। बजट और मेनू का औसत सौ बच्चों के हिसाब से बनाया गया है। सौ बच्चों के बदले प्रतिदिन 334 रुपये स्कूलों को मिलते हैं लेकिन महंगाई इस कदर बढ़ी है कि इस बजट में मेनू के मुताबिक तो दूर, केवल खिचड़ी देना भी मुश्किल है।
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प्राथमिक विद्यालयों में भोजन के मद में सौ बच्चों के लिए कनवर्जन कास्ट के तौर पर 334 रुपये मिलते हैं लेकिन इस बजट का बड़ा हिस्सा तो रसोई गैस में चला जाता है। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में जहां रसोई गैस आसानी से नहीं मिल पाती, वहां लकड़ी जलाकर भोजन पकाया जाता है जिसमें इससे ज्यादा रकम खर्च होती है। प्राथमिक विद्यालय कारों, प्राथमिक विद्यालय बनकट, पूर्व माध्यमिक विद्यालय अगवान के प्रधानाध्यापकों ने सौ बच्चों पर खर्च का बजट तैयार किया है। बताया कि यदि सौ बच्चों के लिए केवल खिचड़ी महीने में 20 दिन बने तो दस हजार रुपये से कम खर्च नहीं बैठता जबकि 20 दिन के हिसाब से मिलता है केवल लगभग सात हजार रुपये। लगभग डेढ़ से दो हजार रुपये तो रसोई गैस पर ही खर्च हो जाते हैं। यानी भोजन के मद का बड़ा हिस्सा तो गैस में निकल जा रहा।
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प्राथमिक विद्यालय बनखेसरा के प्रधानाध्यापक रवि तिवारी, नौगवां की अलका पांडेय, ज्योतिपुर की विद्या देवी ने माना कि बजट के अभाव में बच्चों को मानक से काफी कम भोजन दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि चावल मुफ्त में मिल जाता है इसलिए ज्यादातर विद्यालयों में हफ्ते में चार दिन खिचड़ी बनाई जाती है। खिचड़ी में आंशिक दाल और दो-चार आलू डाल दिया जाता है।
मिड डे मील की लिस्ट में दाल, रोटी, सब्जी, खीर, कढ़ी समेत तमाम व्यंजन हैं और वह भी केवल तीन रुपये में। इस बजट में ये सामग्री देख कोई भी हैरान हो सकता है लेकिन सर्व शिक्षा अभियान के अधिकारियों को कोई अचंभा नहीं दिखता। महंगाई का आलम यह है कि लगभग सभी जरूरी चीजों के दाम दोगुने-तीनगुने हो गए हैं। रसोई गैस, दाल, सरसो तेल, घी, मसाले की कीमतें पिछले चार महीनों में 15 फीसदी से अधिक हो गईं लेकिन मिड डे मील का बजट नहीं बढ़ा। मात्र तीन रुपये 34 पैसे में बच्चों को एक वक्त का भोजन देने का बजट किस सोच से तैयार किया गया, कैसे सरकार ने इसे पास कर दिया, समझ से परे है।
जरा एक दिन का सबसे सरल मेनू देखिए। बुधवार को बच्चों को कढ़ी चावल या खीर देने का प्रावधान है। यदि कढ़ी बने तो सौ बच्चों के लिए विभाग ने ढाई किलो बेसन, 500 ग्राम तेल, मसाला तय किया है और यदि खीर बने तो दस लीटर दूध, तीन किलोग्राम चीनी। दस लीटर दूध यानी औसतन 300 रुपये और तीन किलोग्राम चीनी यानी 120 रुपये। यानी सौ बच्चों को केवल खीर दी जाए तो केवल सामान के 420 रुपये चाहिए जबकि विभाग की तरफ से केवल 334 रुपये तय है। इसमें अन्य कोई खर्च शामिल नहीं है। जाहिर है कि दोपहर भोजन में केवल खीर देना है तो भी तीन रुपये प्रति छात्र की दर से संभव नहीं है।
मेनू में नहीं पर अक्सर मिलती है खिचड़ी
स्कूलों में बच्चों को तय भोजन के बजाय अक्सर खिचड़ी ही दी जाती है क्योंकि उसका बजट कम है। जबकि खिचड़ी मेनू में है ही नहीं। खिचड़ी बनाने के लिए चावल अलग से मिलता है। उसमें दिखाने भर को दाल, दो-चार आलू डाल दिए, हो गया।
‘रसोई गैस पर सब्सिडी के लिए मिड डे मील प्राधिकरण को प्रस्ताव भेजा गया है। शासन स्तर से बातचीत जारी है। उम्मीद है कि रसोई गैस पर सब्सिडी मिलेगी। इससे तय कनवर्जन कास्ट में निर्धारित भोजन उपलब्ध हो सकेगा।’
राजीव त्रिपाठी, जिला समन्वयक