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कान्हा की दीवानी, राधा की दासी हैं सखियां
Allahabad
Updated Fri, 18 Jan 2013 05:30 AM IST
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महाकुंभ नगर (इलाहाबाद)। ‘जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझैं, सो ही भेष धरूंगी’ कहने वाली सखियों की टोली संगम की रेती पर आ जुटी है। ‘मन न रंगायो, रंगायो जोगी कपड़ा’ वाले साधुओं से इतर, रंगबिरंगे कपड़े पहने और मन रंगाए सखियां मन से सखी लेकिन तन से पुरुष हैं। कान्हा को स्वामी और स्वयं को राधा की दासी मानने वाली सखियां उन्हें रिझाने के लिए किसी सुहागिन की तरह ही सोलहों शृंगार करती हैं।
इनकी जीवनचर्या ठाकुर से ही शुरू और उन्हीं पर खत्म होती है। सुबह और शाम ठाकुर को रिझाने के लिए ही स्त्री भाव के साथ नख से शिख तक सिंगार किया जाता है। इसमें मंगलसूत्र, लिपिस्टिक, साड़ी, ब्लाउज, आंखों में काजल सहित पांव में पायल, बिछिया, महावर, हाथ में कंगन चूड़ी, कमर में तगड़ी, कान में बुंदे के साथ माथे पर बेंदी, टीका, सिंदूर के अतिरिक्त बिंदी आदि शामिल है।
वृंदावन से आईं छब्बीस बरस की छबीली सरन के मुताबिक माथे पर तिलक लगाने का तरीका उनका संप्रदाय तय करता है। गुरु रामानंदी संप्रदाय का है तो लाल तिलक और कृष्णानंदी है तो माथे की बिंदी श्रीजी राधा के नाम होगी। इसी तरह शांति सरन दासी, राजेश्वरी सरन दासी ने भी माना कि गले में तुलसी की माला और माथे का तिलक उनके संप्रदाय की पहचान बताता है।
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0 दीक्षा के बाद बनी सखी
सखी बनने की प्रक्रिया आसान नहीं है। शुरुआत साधु से ही होती है। इसके तहत गुरु ही लंगोटी, कंठी, माला-झोरी, तिलक स्वरूप और मंत्र देकर साधु बनाता है। इस बीच जिसे ‘सखी भाव’ उपजा, उसे गुरु ही महिलाओं के वस्त्र और उनका सिंगार देकर सखी की दीक्षा देते हैं। राधा बल्लभी निर्मोही अखाड़े से जुड़े सखी संप्रदाय के सदस्यों का आंगन साधुओं का डेरा और कान्हा के सामने नाच-गाकर उन्हें रिझाना और महंतों से न्योछावर पाना दिनचर्या।
0 मन उचटने पर बन गई सखी
परिवार और समाज से मन उचटा तो सखी बन गई। लुधियाना की सखी गणेशदासी के मुताबिक परिवार में अनबन से भागकर अयोध्या पहुंचने पर गुरु रामकिशोर दास ने कंठी, लंगोटी, मंत्र देकर साधु बनाया फिर बारह वर्षों बाद शृंगार देकर सखी बनाया।
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‘सखी संप्रदाय में स्त्री नहीं, बल्कि साधु ही स्त्री रूप धारण करके कान्हा के प्रति श्रद्धाभाव रखकर उन्हें रिझाती हैं। इनका कोई एक ठौर नहीं। साधुओं के डेरों पर ही भजन, नृत्य करके कान्हा को रिझाना और महंतों से न्योछावर पाना जीवन का राग है।
0 महंत दीनबंधु
महंत, राधाबल्लभी संप्रदाय
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इनकी जीवनचर्या ठाकुर से ही शुरू और उन्हीं पर खत्म होती है। सुबह और शाम ठाकुर को रिझाने के लिए ही स्त्री भाव के साथ नख से शिख तक सिंगार किया जाता है। इसमें मंगलसूत्र, लिपिस्टिक, साड़ी, ब्लाउज, आंखों में काजल सहित पांव में पायल, बिछिया, महावर, हाथ में कंगन चूड़ी, कमर में तगड़ी, कान में बुंदे के साथ माथे पर बेंदी, टीका, सिंदूर के अतिरिक्त बिंदी आदि शामिल है।
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वृंदावन से आईं छब्बीस बरस की छबीली सरन के मुताबिक माथे पर तिलक लगाने का तरीका उनका संप्रदाय तय करता है। गुरु रामानंदी संप्रदाय का है तो लाल तिलक और कृष्णानंदी है तो माथे की बिंदी श्रीजी राधा के नाम होगी। इसी तरह शांति सरन दासी, राजेश्वरी सरन दासी ने भी माना कि गले में तुलसी की माला और माथे का तिलक उनके संप्रदाय की पहचान बताता है।
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0 दीक्षा के बाद बनी सखी
सखी बनने की प्रक्रिया आसान नहीं है। शुरुआत साधु से ही होती है। इसके तहत गुरु ही लंगोटी, कंठी, माला-झोरी, तिलक स्वरूप और मंत्र देकर साधु बनाता है। इस बीच जिसे ‘सखी भाव’ उपजा, उसे गुरु ही महिलाओं के वस्त्र और उनका सिंगार देकर सखी की दीक्षा देते हैं। राधा बल्लभी निर्मोही अखाड़े से जुड़े सखी संप्रदाय के सदस्यों का आंगन साधुओं का डेरा और कान्हा के सामने नाच-गाकर उन्हें रिझाना और महंतों से न्योछावर पाना दिनचर्या।
0 मन उचटने पर बन गई सखी
परिवार और समाज से मन उचटा तो सखी बन गई। लुधियाना की सखी गणेशदासी के मुताबिक परिवार में अनबन से भागकर अयोध्या पहुंचने पर गुरु रामकिशोर दास ने कंठी, लंगोटी, मंत्र देकर साधु बनाया फिर बारह वर्षों बाद शृंगार देकर सखी बनाया।
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‘सखी संप्रदाय में स्त्री नहीं, बल्कि साधु ही स्त्री रूप धारण करके कान्हा के प्रति श्रद्धाभाव रखकर उन्हें रिझाती हैं। इनका कोई एक ठौर नहीं। साधुओं के डेरों पर ही भजन, नृत्य करके कान्हा को रिझाना और महंतों से न्योछावर पाना जीवन का राग है।
0 महंत दीनबंधु
महंत, राधाबल्लभी संप्रदाय