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पातालपुरी मंदिर का स्वरूप बदलने पर ज वाब तलब
Updated Mon, 10 Dec 2018 10:13 PM IST
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पातालपुरी मंदिर का स्वरूप बदलने पर जवाब तलब
0 पातालपुरी स्थित अक्षयवट को ही असली अक्षयवट होने का किया दावा
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। हाईकोर्ट ने किला स्थित पातालपुरी मंदिर का स्वरूप बदलने के खिलाफ दाखिल याचिका पर केंद्र सरकार और किला के कमांडेंट से जवाब तलब किया है। अक्षयवट मंदिर किला प्रयाग के सचिव रवींद्र नाथ योगेश्वर और अन्य की याचिकाओं पर न्यायमूर्ति अभिनव उपाध्याय और न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की पीठ सुनवाई कर रही है।
याची का कहना है कि गंगा-यमुना के तट पर अकबर ने किले का निर्माण कराया था, जिसके अंदर पातालपुरी मंदिर स्थित है। इस मंदिर में पूजा का अधिकार याची के पूर्वजों को अकबर के जमाने से ही प्राप्त है। तभी से याची के पूर्वज पातालपुरी मंदिर में पूजा करते आ रहे हैं। याची के पूर्वजों को शाह आलम द्वितीय ने 1795 में आदेश जारी कर मान्यता दी थी। औरंगजेब ने भी जजियाकर नहीं लगाया था। याची के पूर्वज अंग्रेजों के शासनकाल में भी इसी मंदिर में पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। इसके चढ़ावे से 500 परिवार पल रहे हैं।
याची का कहना है कि पातालपुरी स्थित अक्षयवट ही असली अक्षयवट है। मगर, इसे लेकर जनता को दिग्भ्रमित किया जा रहा है। अक्षयवट को लेकर 1928 तक कोई विवाद नहीं था। 1968 में सरकारी गजट जारी हुआ, जिसमें पातालपुरी स्थित अक्षयवट को ही असली अक्षयवट बताया गया। 1994 के गजट में भी यही बात है। 2013 में रक्षामंत्रालय के जीओसी ने भी कहा कि पातालपुरी अक्षयवट ही असली अक्षयवट है। अब कुंभ मेले के कार्यों के बीच रक्षा मंत्रालय पातालपुरी मंदिर को दिगंबर जैन के पद चिन्ह के रूप में विकसित कर रहा है। मंदिर में बदलाव से याची के अधिकार छीने जा रहे हैं। याचिका में स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी को भी पक्षकार बनाया गया है।
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0 पातालपुरी स्थित अक्षयवट को ही असली अक्षयवट होने का किया दावा
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। हाईकोर्ट ने किला स्थित पातालपुरी मंदिर का स्वरूप बदलने के खिलाफ दाखिल याचिका पर केंद्र सरकार और किला के कमांडेंट से जवाब तलब किया है। अक्षयवट मंदिर किला प्रयाग के सचिव रवींद्र नाथ योगेश्वर और अन्य की याचिकाओं पर न्यायमूर्ति अभिनव उपाध्याय और न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की पीठ सुनवाई कर रही है।
याची का कहना है कि गंगा-यमुना के तट पर अकबर ने किले का निर्माण कराया था, जिसके अंदर पातालपुरी मंदिर स्थित है। इस मंदिर में पूजा का अधिकार याची के पूर्वजों को अकबर के जमाने से ही प्राप्त है। तभी से याची के पूर्वज पातालपुरी मंदिर में पूजा करते आ रहे हैं। याची के पूर्वजों को शाह आलम द्वितीय ने 1795 में आदेश जारी कर मान्यता दी थी। औरंगजेब ने भी जजियाकर नहीं लगाया था। याची के पूर्वज अंग्रेजों के शासनकाल में भी इसी मंदिर में पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। इसके चढ़ावे से 500 परिवार पल रहे हैं।
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याची का कहना है कि पातालपुरी स्थित अक्षयवट ही असली अक्षयवट है। मगर, इसे लेकर जनता को दिग्भ्रमित किया जा रहा है। अक्षयवट को लेकर 1928 तक कोई विवाद नहीं था। 1968 में सरकारी गजट जारी हुआ, जिसमें पातालपुरी स्थित अक्षयवट को ही असली अक्षयवट बताया गया। 1994 के गजट में भी यही बात है। 2013 में रक्षामंत्रालय के जीओसी ने भी कहा कि पातालपुरी अक्षयवट ही असली अक्षयवट है। अब कुंभ मेले के कार्यों के बीच रक्षा मंत्रालय पातालपुरी मंदिर को दिगंबर जैन के पद चिन्ह के रूप में विकसित कर रहा है। मंदिर में बदलाव से याची के अधिकार छीने जा रहे हैं। याचिका में स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी को भी पक्षकार बनाया गया है।
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