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नाबालिग को बालिग होने तक नारी निकेतन में नहीं रख सकते
Updated Tue, 19 Jun 2018 12:28 AM IST
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नाबालिग को बालिग होने तक नारी निकेतन में नहीं रख सकते
0 हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय किशोरी को पति के साथ जाने की दी छूट
0 अपनी मर्जी से विवाह करने के मामले में राज्य को नियंत्रण का अधिकार नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने कहा है कि अपनी मर्जी से विवाह करने वाली लड़की को उसके बालिग होने तक नारी निकेतन में नहीं रखा जा सकता है। लेकिन यदि लड़की को कोर्ट के आदेश से नारी निकेतन भेजा गया है तो उसे अवैध निरुद्धि भी नहीं कह सकते हैं। कोर्ट का यह भी कहना है कि हर नागरिक को अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार है। राज्य को इस पर नियंत्रण का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है ।
हाईकोर्ट ने देवरिया की 16 साल की नाबालिग लड़की को बलिया के नारी निकेतन में रखने के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया है और उसे अपनी मर्जी से अपने पति के साथ जाने के लिए स्वतंत्र कर दिया है ।
यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति अजित कुमार की खंडपीठ ने काजल निषाद की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। काजल निषाद ने रवि निषाद से माता-पिता की मर्जी के खिलाफ शादी कर ली । पांच फरवरी 2018 को देवरिया के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने नाबालिग होने के कारण उसको नारी निकेतन में भेज दिया। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई। याची का कहना था कि उसे उसकी मर्जी के खिलाफ निरुद्ध किया गया है। कोर्ट ने याची को प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। उसे बलिया नारी निकेतन से हाईकोर्ट में पेश किया गया। उसकी मां भी अदालत में मौजूद थी। कोर्ट ने मां-बेटी को आपस में बात करने का मौका दिया। याची ने अपनी मां के साथ जाने से इंकार कर दिया और कहा कि वह अपने पति के साथ जाना चाहती है । मां का कहना था कि याची नाबालिग है और सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं है। कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए नाबालिग याची को अपने पति के साथ जाने की छूट दे दी । कोर्ट ने कहा कि याची अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने में सक्षम है ।
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नाबालिग को बालिग होने तक नारी निकेतन में नहीं रख सकते
0 हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय किशोरी को पति के साथ जाने की दी छूट
0 अपनी मर्जी से विवाह करने के मामले में राज्य को नियंत्रण का अधिकार नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने कहा है कि अपनी मर्जी से विवाह करने वाली लड़की को उसके बालिग होने तक नारी निकेतन में नहीं रखा जा सकता है। लेकिन यदि लड़की को कोर्ट के आदेश से नारी निकेतन भेजा गया है तो उसे अवैध निरुद्धि भी नहीं कह सकते हैं। कोर्ट का यह भी कहना है कि हर नागरिक को अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार है। राज्य को इस पर नियंत्रण का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है ।
हाईकोर्ट ने देवरिया की 16 साल की नाबालिग लड़की को बलिया के नारी निकेतन में रखने के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया है और उसे अपनी मर्जी से अपने पति के साथ जाने के लिए स्वतंत्र कर दिया है ।
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यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति अजित कुमार की खंडपीठ ने काजल निषाद की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। काजल निषाद ने रवि निषाद से माता-पिता की मर्जी के खिलाफ शादी कर ली । पांच फरवरी 2018 को देवरिया के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने नाबालिग होने के कारण उसको नारी निकेतन में भेज दिया। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई। याची का कहना था कि उसे उसकी मर्जी के खिलाफ निरुद्ध किया गया है। कोर्ट ने याची को प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। उसे बलिया नारी निकेतन से हाईकोर्ट में पेश किया गया। उसकी मां भी अदालत में मौजूद थी। कोर्ट ने मां-बेटी को आपस में बात करने का मौका दिया। याची ने अपनी मां के साथ जाने से इंकार कर दिया और कहा कि वह अपने पति के साथ जाना चाहती है । मां का कहना था कि याची नाबालिग है और सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं है। कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए नाबालिग याची को अपने पति के साथ जाने की छूट दे दी । कोर्ट ने कहा कि याची अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने में सक्षम है ।
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