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डिग्री कॉलेजों में मानदेय शिक्षकों के नियमितिकरण का रास्ता साफ, चुनौती देने वाली याचिका खारिज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Updated Sat, 17 Nov 2018 08:43 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : PTI
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डिग्री कॉलेजों में मानदेय पर नियुक्त शिक्षकों के नियमितीकरण का रास्ता साफ हो गया है। राज्य सरकार द्वारा नियमितीकरण के लिए किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है।
डा. दीनानाथ यादव और 25 अन्य की याचिका पर न्यायमूर्ति एपी साही और न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने सुनवाई की। याचिका का विरोध कर रहे अधिवक्ता सीमांत सिंह के मुताबिक प्रदेश सरकार ने यूपी हायर एजूकेशन सर्विस कंडीशन एक्ट की धारा 31(इ) में संशोधन कर नियमितीकरण हेतु आदेश जारी किया। इसके तहत 29 मार्च 2011 तक नियुक्ति पा चुके ऐसे मानदेय शिक्षक, जो पद की अर्हता रखते हैं और 10 सितंबर 2018 तक लगातार पढ़ा रहे हैं, को सेवा में नियमित कर दिया जाए।
इस संशोधन को याचिका में यह कहते हुए चुनौती दी गई कि जिन पदों के सापेक्ष नियमितीकरण किया जा रहा है, उसमें से 2008 में 44 पद और 2009 में 45 पद पहले से ही विज्ञापित हैं। याचीगण ने उन पदों के लिए आवेदन किया है। यदि उन पर नियमितीकरण कर दिया जाएगा तो याचीगण के मौलिक अधिकार का हनन होगा।
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यह भी कहा गया कि एक्ट में पदों को सीधी भर्ती से भरने का प्रावधान है, इसलिए राज्य सरकार को नियमितीकरण के जरिए पदों को भरने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार से इस मामले में जवाब मांगा था। सरकार ने बताया कि 2008 और 2009 का विज्ञापन उसने संशोधन करने से पूर्व ही वापस ले लिया था तथा वर्तमान में न तो कोई नियुक्ति प्रक्रिया लंबित है और न ही कोई आवेदक है।
कोर्ट ने कहा कि एक्ट में संशोधन करने का राज्य सरकार को अधिकार है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार ने बिना अधिकार के संशोधन किया है। याचिका खारिज कर दी गई है।
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डा. दीनानाथ यादव और 25 अन्य की याचिका पर न्यायमूर्ति एपी साही और न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने सुनवाई की। याचिका का विरोध कर रहे अधिवक्ता सीमांत सिंह के मुताबिक प्रदेश सरकार ने यूपी हायर एजूकेशन सर्विस कंडीशन एक्ट की धारा 31(इ) में संशोधन कर नियमितीकरण हेतु आदेश जारी किया। इसके तहत 29 मार्च 2011 तक नियुक्ति पा चुके ऐसे मानदेय शिक्षक, जो पद की अर्हता रखते हैं और 10 सितंबर 2018 तक लगातार पढ़ा रहे हैं, को सेवा में नियमित कर दिया जाए।
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इस संशोधन को याचिका में यह कहते हुए चुनौती दी गई कि जिन पदों के सापेक्ष नियमितीकरण किया जा रहा है, उसमें से 2008 में 44 पद और 2009 में 45 पद पहले से ही विज्ञापित हैं। याचीगण ने उन पदों के लिए आवेदन किया है। यदि उन पर नियमितीकरण कर दिया जाएगा तो याचीगण के मौलिक अधिकार का हनन होगा।
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यह भी कहा गया कि एक्ट में पदों को सीधी भर्ती से भरने का प्रावधान है, इसलिए राज्य सरकार को नियमितीकरण के जरिए पदों को भरने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार से इस मामले में जवाब मांगा था। सरकार ने बताया कि 2008 और 2009 का विज्ञापन उसने संशोधन करने से पूर्व ही वापस ले लिया था तथा वर्तमान में न तो कोई नियुक्ति प्रक्रिया लंबित है और न ही कोई आवेदक है।
कोर्ट ने कहा कि एक्ट में संशोधन करने का राज्य सरकार को अधिकार है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार ने बिना अधिकार के संशोधन किया है। याचिका खारिज कर दी गई है।