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जवाहर हत्याकांड मामला
Updated Tue, 13 Nov 2018 09:59 PM IST
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अभियोजन ने कहा निष्पक्ष भाव से
की है मुकदमा वापस लेने की मांग
0 जवाहर हत्याकांड : मुकदमा वापसी पर वादी पक्ष की आपत्तियों पर जवाब दाखिल
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। जवाहर हत्याकांड का मुकदमा अभियोजन ने बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र मस्तिष्क से वापस लिए जाने की मांग की है। मंगलवार को वादी पक्ष की आपत्तियों का जवाब देते हुए अभियोजन ने यह दावा किया। कोर्ट में दाखिल जवाब में विशेष अधिवक्ता रणेंद्र प्रताप सिंह ने वादी की आपत्तियों को न सिर्फ सिरे से खारिज किया है, बल्कि दावा किया कि मुकदमा वापस लेना जनहित में है।
जवाब में विशेष अधिवक्ता ने सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के कई विधि सिद्धांतों का हवाला देकर कहा है कि शासन की अनुमति से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के प्रावधानों के तहत उन्होंने केस डायरी का अवलोकन करने और तथ्यों तथा साक्ष्यों पर विचार के बाद निर्णय लिया कि इस मामले में अभियुक्तों की संलिप्तता न सिर्फ संदिग्ध है, बल्कि मुख्य अभियुक्तों कपिलमुनि करवरिया और उदयभान करवरिया की घटनास्थल पर मौजूदगी भी साबित नहीं हो रही है। सभी अभियुक्त जनप्रतिनिधि हैं और विधानसभा व विधान परिषद में लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
वादी पक्ष ने अपनी आपत्ति में कहा है कि मुकदमा राजनीतिक दबाव में वापस लिया जा रहा है। अभियोजन ने अपने स्वतंत्र मस्तिष्क का प्रयोग नहीं किया है। राज्य सरकार को सीधे मुकदमा वापस लेने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। इसके जवाब में अभियोजन ने कहा है कि पूरे केस में शुरू से ही अभियुक्तगणों की नामजदगी पर सवाल है। अभियुक्त लगातार घटना की निष्पक्ष जांच की मांग करते रहे हैं। घटना की जांच पहले सिविल लाइंस पुलिस फिर सीबीसीआईडी की प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी और फिर प्रयागराज शाखाओं ने जांच की। जांच एजेंसी का भी मानना है कि अभियुक्तगणों की मौके पर मौजूदगी का कोई साक्ष्य नहीं है।
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जनहित में लिया फैसला
अभियोजन का कहना है कि अभियुक्तगण पूर्व सांसद, विधायक और एमएलसी रहे हैं। उन्होंने लाखों लोगों का सदनों में प्रतिनिधित्व किया है। आम जनमानस में यह आशंका है कि सिर्फ राजनीतिज्ञ होने की वजह से निर्दोष लोग भी झूठे फंसाए जा सकते हैं। इसलिए केस वापसी जनहित में है।
2004 में दाखिल हुई चार्जशीट
जवाहर हत्याकांड 1996 की घटना है, मगर पुलिस ने इसमें पहली बार 2004 में चार्जशीट दाखिल की। अभियुक्तगणों की ओर से इसको हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने मुकदमे की सुनवाई पर रोक लगा दी। यह स्टे दस वर्षों तक लागू रहा। इसमें अभियुक्तों या अभियोजन की कोई गलती नहीं है। 2015 में स्टे हटने के बाद से लगातार मुकदमे में सुनवाई हो रही है। मंगलवार को मुकदमे की सुनवाई कर रहे जज के अवकाश पर होने की वजह से इस मामले में बहस नहीं हो सकी। अगली सुनवाई बुधवार को होगी।
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की है मुकदमा वापस लेने की मांग
0 जवाहर हत्याकांड : मुकदमा वापसी पर वादी पक्ष की आपत्तियों पर जवाब दाखिल
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। जवाहर हत्याकांड का मुकदमा अभियोजन ने बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र मस्तिष्क से वापस लिए जाने की मांग की है। मंगलवार को वादी पक्ष की आपत्तियों का जवाब देते हुए अभियोजन ने यह दावा किया। कोर्ट में दाखिल जवाब में विशेष अधिवक्ता रणेंद्र प्रताप सिंह ने वादी की आपत्तियों को न सिर्फ सिरे से खारिज किया है, बल्कि दावा किया कि मुकदमा वापस लेना जनहित में है।
जवाब में विशेष अधिवक्ता ने सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के कई विधि सिद्धांतों का हवाला देकर कहा है कि शासन की अनुमति से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के प्रावधानों के तहत उन्होंने केस डायरी का अवलोकन करने और तथ्यों तथा साक्ष्यों पर विचार के बाद निर्णय लिया कि इस मामले में अभियुक्तों की संलिप्तता न सिर्फ संदिग्ध है, बल्कि मुख्य अभियुक्तों कपिलमुनि करवरिया और उदयभान करवरिया की घटनास्थल पर मौजूदगी भी साबित नहीं हो रही है। सभी अभियुक्त जनप्रतिनिधि हैं और विधानसभा व विधान परिषद में लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
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वादी पक्ष ने अपनी आपत्ति में कहा है कि मुकदमा राजनीतिक दबाव में वापस लिया जा रहा है। अभियोजन ने अपने स्वतंत्र मस्तिष्क का प्रयोग नहीं किया है। राज्य सरकार को सीधे मुकदमा वापस लेने का आदेश देने का अधिकार नहीं है। इसके जवाब में अभियोजन ने कहा है कि पूरे केस में शुरू से ही अभियुक्तगणों की नामजदगी पर सवाल है। अभियुक्त लगातार घटना की निष्पक्ष जांच की मांग करते रहे हैं। घटना की जांच पहले सिविल लाइंस पुलिस फिर सीबीसीआईडी की प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी और फिर प्रयागराज शाखाओं ने जांच की। जांच एजेंसी का भी मानना है कि अभियुक्तगणों की मौके पर मौजूदगी का कोई साक्ष्य नहीं है।
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जनहित में लिया फैसला
अभियोजन का कहना है कि अभियुक्तगण पूर्व सांसद, विधायक और एमएलसी रहे हैं। उन्होंने लाखों लोगों का सदनों में प्रतिनिधित्व किया है। आम जनमानस में यह आशंका है कि सिर्फ राजनीतिज्ञ होने की वजह से निर्दोष लोग भी झूठे फंसाए जा सकते हैं। इसलिए केस वापसी जनहित में है।
2004 में दाखिल हुई चार्जशीट
जवाहर हत्याकांड 1996 की घटना है, मगर पुलिस ने इसमें पहली बार 2004 में चार्जशीट दाखिल की। अभियुक्तगणों की ओर से इसको हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने मुकदमे की सुनवाई पर रोक लगा दी। यह स्टे दस वर्षों तक लागू रहा। इसमें अभियुक्तों या अभियोजन की कोई गलती नहीं है। 2015 में स्टे हटने के बाद से लगातार मुकदमे में सुनवाई हो रही है। मंगलवार को मुकदमे की सुनवाई कर रहे जज के अवकाश पर होने की वजह से इस मामले में बहस नहीं हो सकी। अगली सुनवाई बुधवार को होगी।