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मछली राज्य मं9ी
Updated Tue, 01 Aug 2017 09:02 PM IST
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गंगा में छोड़े गए मछलियों के लार्वा
मत्स्य राज्य मंत्री ने दी योजनाआें की जानकारी
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय अंतर्स्थलीय मास्यिकी अनुसंधान संस्थान में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत मंगलवार को आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में मछलियों को बचाने की अपील की गई। मुख्य अतिथि मत्स्य राज्यमंत्री जय प्रकाश निषाद ने कहा कि गंगा नदी में 365 तरह की मछलियां पाई जाती हैं। नदी की सफाई में इनका महत्वपूर्ण योगदान है।
उन्होंने नमामि गंगे के अलावा मत्स्य पालकाें के लिए शुरू योजनाओं के बारे में जानकारी दी। संस्थान के निदेशक बीके दास ने बताया कि नमामि गंगे योजना के तहत नदी के किनारे तालाबों में मछलियों के लार्वा और बच्चे तैयार किए जाते हैं। फिर उन्हें गंगा नदी में छोड़ा जाता है। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में उन्हें इसके लिए जमीन नहीं मिली। इसकी वजह से निजी लोगों से तालाब लेकर मछली पालन किया गया। कार्यक्रम में शामिल विशेषज्ञों ने मछुआरों को मच्छरदानी से मछली न पकड़ने की हिदायत दी। उनका कहना था कि इससे छोटी मछलियां और लार्वा भी फंस जाते हैं। जिससे नदियों में मछलियों की संख्या कम हो रही है। यह पर्यावरण तथा मछुआरों दोनों के लिए खतरनाक है। उनका कहना था कि मछलियों के बड़ी होने तक इंतजार करना चाहिए। उसके बाद जाल फेंकना चाहिए। केेंद्र अधीक्षक डॉ.आरएस श्रीवास्तव ने जैव विविधता एवं संवर्धन के उपायों पर चर्चा की। मंत्री तथा विशेषज्ञों ने गंगा नदी में मछलियां भी छोड़ीं। इसके बाद राज्यमंत्री ने सरकिट हाउस में विभागीय अफसरों के साथ समीक्षा बैठक की। उन्होंने हिदायत दी कि योजनाओं का लाभ पात्रों तक पहुंचे।
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मत्स्य राज्य मंत्री ने दी योजनाआें की जानकारी
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय अंतर्स्थलीय मास्यिकी अनुसंधान संस्थान में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत मंगलवार को आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में मछलियों को बचाने की अपील की गई। मुख्य अतिथि मत्स्य राज्यमंत्री जय प्रकाश निषाद ने कहा कि गंगा नदी में 365 तरह की मछलियां पाई जाती हैं। नदी की सफाई में इनका महत्वपूर्ण योगदान है।
उन्होंने नमामि गंगे के अलावा मत्स्य पालकाें के लिए शुरू योजनाओं के बारे में जानकारी दी। संस्थान के निदेशक बीके दास ने बताया कि नमामि गंगे योजना के तहत नदी के किनारे तालाबों में मछलियों के लार्वा और बच्चे तैयार किए जाते हैं। फिर उन्हें गंगा नदी में छोड़ा जाता है। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में उन्हें इसके लिए जमीन नहीं मिली। इसकी वजह से निजी लोगों से तालाब लेकर मछली पालन किया गया। कार्यक्रम में शामिल विशेषज्ञों ने मछुआरों को मच्छरदानी से मछली न पकड़ने की हिदायत दी। उनका कहना था कि इससे छोटी मछलियां और लार्वा भी फंस जाते हैं। जिससे नदियों में मछलियों की संख्या कम हो रही है। यह पर्यावरण तथा मछुआरों दोनों के लिए खतरनाक है। उनका कहना था कि मछलियों के बड़ी होने तक इंतजार करना चाहिए। उसके बाद जाल फेंकना चाहिए। केेंद्र अधीक्षक डॉ.आरएस श्रीवास्तव ने जैव विविधता एवं संवर्धन के उपायों पर चर्चा की। मंत्री तथा विशेषज्ञों ने गंगा नदी में मछलियां भी छोड़ीं। इसके बाद राज्यमंत्री ने सरकिट हाउस में विभागीय अफसरों के साथ समीक्षा बैठक की। उन्होंने हिदायत दी कि योजनाओं का लाभ पात्रों तक पहुंचे।
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