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खंडशिक्षा अधिकारियों को 2001 से उच्चतर वेतनमान देने का आदेश
Updated Sun, 11 Feb 2018 01:32 AM IST
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एबीएसए को 2001 से उच्चतर वेतनमान देने का आदेश
रिटायर्ड कर्मचारी से नहीं वसूला जा सकता अधिक भुगतान
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत खंड शिक्षा अधिकारियों को 2001 से उच्चतर वेतनमान देने का आदेश दिया है। इसी क्रम में कोर्ट ने याची के सेवानिवृत्ति परिलाभों से अधिक भुगतान किए गए वेतन की कटौती का आदेश भी रद्द कर दिया है। वीरेंद्र बहादुर कटारिया की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा ने दिया है।
याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे और के शाही आदि ने कोर्ट में पक्ष रखा। अधिवक्ता शाही के अनुसार बेसिक शिक्षा विभाग में 2001 तक जूनियर हाईस्कूल के प्रधानाध्यक्ष की 10 प्रतिशत कोटे के तहत खंड शिक्षा अधिकारी के पद पर प्रोन्नति होती थी। मगर इनका वेतनमान प्रधानाध्यापक से अधिक नहीं था। इसे लेकर 2002 में एक याचिका दाखिल की गई कि खंडशिक्षा अधिकारियों को प्रधानाध्यापक से उच्च वेतनमान दिया जाए। हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को एक जुलाई 2001 से उच्चतर वेतनमान देने पर निर्णय लेने का आदेश दिया। सरकार ने इस आदेश को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीमकोर्ट ने एसएलपी खारिज करते हुए कहा कि सरकार समझौते के आधार पर उच्चतर वेतनमान लागू करने पर निर्णय ले। प्रदेश सरकार ने 2008 से वेतनमान देने का निर्णय लिया मगर खंड शिक्षा अधिकारियों ने इस समझौते को स्वीकृति नहीं दी। इसके बाद सरकार ने 2010 से नया वेतनमान देने का निर्णय लेते हुए इसका शासनादेश 14 जुलाई 2011 को जारी किया।
शासनादेश को फिर से हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने 14 जुलाई के शासनादेश को रद्द करते हुए 2001 से उच्चतर वेतनमान देने का आदेश दिया है। इसी क्रम में कोर्ट ने याची वीरेंद्र बहादुर कटारिया के वेतन से अधिक भुगतान की वसूली के आदेश को भी रद्द करते हुए कहा कि याची रिटायर हो चुका है इसलिए सुप्रीमकोर्ट के निर्णय के अनुसार उससे वसूली नहीं की जा सकती है।
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रिटायर्ड कर्मचारी से नहीं वसूला जा सकता अधिक भुगतान
इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत खंड शिक्षा अधिकारियों को 2001 से उच्चतर वेतनमान देने का आदेश दिया है। इसी क्रम में कोर्ट ने याची के सेवानिवृत्ति परिलाभों से अधिक भुगतान किए गए वेतन की कटौती का आदेश भी रद्द कर दिया है। वीरेंद्र बहादुर कटारिया की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा ने दिया है।
याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे और के शाही आदि ने कोर्ट में पक्ष रखा। अधिवक्ता शाही के अनुसार बेसिक शिक्षा विभाग में 2001 तक जूनियर हाईस्कूल के प्रधानाध्यक्ष की 10 प्रतिशत कोटे के तहत खंड शिक्षा अधिकारी के पद पर प्रोन्नति होती थी। मगर इनका वेतनमान प्रधानाध्यापक से अधिक नहीं था। इसे लेकर 2002 में एक याचिका दाखिल की गई कि खंडशिक्षा अधिकारियों को प्रधानाध्यापक से उच्च वेतनमान दिया जाए। हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को एक जुलाई 2001 से उच्चतर वेतनमान देने पर निर्णय लेने का आदेश दिया। सरकार ने इस आदेश को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीमकोर्ट ने एसएलपी खारिज करते हुए कहा कि सरकार समझौते के आधार पर उच्चतर वेतनमान लागू करने पर निर्णय ले। प्रदेश सरकार ने 2008 से वेतनमान देने का निर्णय लिया मगर खंड शिक्षा अधिकारियों ने इस समझौते को स्वीकृति नहीं दी। इसके बाद सरकार ने 2010 से नया वेतनमान देने का निर्णय लेते हुए इसका शासनादेश 14 जुलाई 2011 को जारी किया।
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शासनादेश को फिर से हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने 14 जुलाई के शासनादेश को रद्द करते हुए 2001 से उच्चतर वेतनमान देने का आदेश दिया है। इसी क्रम में कोर्ट ने याची वीरेंद्र बहादुर कटारिया के वेतन से अधिक भुगतान की वसूली के आदेश को भी रद्द करते हुए कहा कि याची रिटायर हो चुका है इसलिए सुप्रीमकोर्ट के निर्णय के अनुसार उससे वसूली नहीं की जा सकती है।
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